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चेहरे वही हैं, लेकिन दल बदले

चेहरे वही हैं, लेकिन दल बदले
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मुरैना। मुरैना जिला विधानसभा उपचुनाव का केन्द्र बिंदु बना हुआ है। इसका कारण जिले में पांच विधानसभा क्षेत्रों पर चुनाव होना है। भाजपा व कांगे्रस सहित बसपा के प्रत्याशी घोषित हो चुके हैं। इन चुनावों में सबसे खास बात यह है कि पांच में से चार सीटों पर दल बदलने वाले प्रत्याशी चुनाव लड़ रहे हैं। तीन विधानसभाओं में तो ऐसे प्रत्याशी चुनाव लड़ रहे हैं, जो पहले भी एक-दूसरे के खिलाफ चुनाव में ताल ठोक चुके हैं। यानी चेहरे वही हैं, लेकिन दल बदल गए हैं।

भाजपा, कांगेस व बसपा के प्रत्याशी तय होने के बाद जो तस्वीर सामने आई है, वह रौचक है। यहां मुरैना, दिमनी, अंबाह, सुमावली व जौरा सीट पर चुनाव हो रहा है। इनमें से अंबाह, मुरैना एवं सुमावली के भाजपा व कांगे्रस के प्रत्याशी दल बदल करके आए हैं। इसके अलावा दिमनी विधानसभा में भी कमोवेश यही स्थिति है। यहां कांगे्रस उम्मीदवार कुछ साल पहले ही भाजपा को छोडक़र कांगे्रस में शामिल हुए थे। सिर्फ जौरा विधानसभा ही ऐसी है, जहां चुनाव लड़ रहे तीनों दलों के प्रत्याशी अपने मूल दल से ही हैं।

अंबाह विधानसभा की बात करें तो यहां भाजपा से कमलेश जाटव, कांगे्रस से सत्यप्रकाश सखबार एवं बसपा से भानुप्रताप सखबार मैदान में हैं। कमलेश जाटव सात माह पहले तक कांगे्रस के विधायक थे, लेकिन उन्होंने विधायकी से त्यागपत्र देकर भाजपा का दामन थाम लिया। इसी प्रकार सत्यप्रकाश सखबार कुछ समय पूर्व तक बसपा में थे। वह अंबाह से बसपा से विधायक रहने के साथ-साथ इस दल के प्रदेश अध्यक्ष रह चुके हैं। वर्ष 2018 में कमलेश जाटव कांग्रेस से तो सत्यप्रकाश सखवार बसपा से एक-दूसरे के खिलाफ मैदान में थे। उधर भानुप्रताप सखबार नया चेहरा हैं। भानुप्रताप का राजनैतिक सफर बसपा से टिकट के साथ ही प्रारंभ हुआ है।

मुरैना विधानसभा में भाजपा से रघुराज कंषाना, कांगे्रस से राकेश मावई व बसपा से रामप्रकाश राजौरिया चुनाव मैदान में हैं। भाजपा प्रत्याशी रघुराज कंषाना भी उन विधायकों में शामिल थे, जिन्होंने कमलनाथ सरकार गिराने में अपनी भूमिका निभाई थी। बसपा प्रत्याशी रामप्रकाश राजौरिया भाजपा को छोडक़र आए हैं। हालांकि वर्ष 2018 विधानसभा चुनाव से पहले तक वह बसपा में ही थे, लेकिन ऐन वक्त पर उनका विधानसभा का टिकट कट गया, इसलिए वह आम आदमी पार्टी से चुनाव लड़े। लोकसभा चुनाव के दौरान श्री राजौरिया ने भाजपा का दामन थाम लिया था। कांगे्रस प्रत्याशी राकेश मावई जन्मजात कांगे्रसी हैं। हालांकि जब ज्योतिरादित्य सिंधिया ने कांगे्रस से बगावत की थी, तब श्री मावई ने भी सिंधिया के प्रति अपनी आस्था जताते हुए पार्टी छोडऩे का ऐलान कर दिया था, लेकिन दूसरे दिन ही उन्हें अपनी भूल का अहसास हुआ और उन्होंने कमलनाथ का गुणगान करते हुए कांगे्रस में ही रहने की बात की, जिसका इनाम उन्हें कमलनाथ ने विधानसभा का टिकट देकर दिया है।

सुमावली विधानसभा की बात करें तो यहां भाजपा से पीएचई मंत्री ऐंदल सिंह कंषाना, कांगे्रस से अजब सिंह कुशवाह एवं भाजपा से राहुल डण्डौतिया चुनाव लड़ रहे हैं। ऐंदल सिंह कंषाना भी इस साल मार्च महीने में अपनी विधायकी से इस्तीफा देकर भाजपा में शामिल हुए थे। इसी प्रकार अजब सिंह कुशवाह कुछ दिन पहले तक भाजपा में थे, लेेकिन टिकट का लालच उन्हें कांगे्रस में ले गया। वह अभी तक सुमावली से तीन बार चुनाव हार चुके हैं। दो बार उन्हें ऐंदल सिंह कंषाना ने तो एक बार सत्यपाल सिंह सिकरवार (भाजपा) ने हराया था। अजब सिंह का कंषाना से चौथी बार सामना हो रहा है। उधर बसपा प्रत्याशी डण्डौतिया युवा चेहरा हैं और उनकी राजनीति की शुरुआत टिकट के साथ ही हुई है।

दिमनी विधानसभा में भाजपा से प्रदेश के कृषि राज्य मंत्री गिर्राज डण्डौतिया, कांगे्रस से रविन्द्र सिंह तोमर एवं बसपा से राजेन्द्र सिंह कंषाना मैदान में हैं। गिर्राज डण्डौतिया अपनी विधायकी से इस्तीफा देकर भाजपा में शामिल हुए हैं। रविन्द्र सिंह तोमर की बात करें तो उन्होंने दिमनी में अपने राजनैतिक जीवन की शुरुआत 2008 में की थी। उस समय वह यहां से बसपा से चुनाव लडक़र दूसरे स्थान पर रहे थे। चुनाव हारने के बाद रविन्द्र सिंह भाजपा में शामिल हो गए, लेकिन वर्ष 2013 में जब भाजपा ने टिकट नहीं दिया तो वह कांगे्रस में चले गए और विधानसभा का चुनाव लड़ा, लेकिन इस बार भी हार का सामना करना पड़ा। अब वह तीसरी बार फिर चुनाव मैदान में हैं।

Updated : 2020-10-10T22:05:36+05:30
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स्वदेश वेब डेस्क

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