‘आप शब्दों पर जा सकते हैं, दिल में नहीं झांक सकते’

इंदौर में पानी की आपदा पर विशेष बातचीत में बोले मंत्री कैलाश विजयवर्गीय
स्वच्छतम इंदौर में गंदे पानी से हुई मौतों को लेकर बवाल मचा हुआ है। यह बवाल इसलिए भी वाजिब है, क्योंकि इंदौर का भागीरथपुरा क्षेत्र नगरीय प्रशासन मंत्री कैलाश विजयवर्गीय के विधानसभा क्षेत्र में आता है। ऐसे में विजयवर्गीय के कुछ शब्दों ने इस पूरे मामले में घमासान खड़ा कर दिया। पूरे घटनाक्रम से मंत्री कैलाश विजयवर्गीय चिंतित हैं। वे कहते हैं, “यह आपदा मेरे घर में है। जिनका निधन हुआ, वे मेरे अपने हैं। ऐसे में आप मेरे शब्दों पर जा सकते हैं, लेकिन मेरे दिल में नहीं झाँक सकते। मैं सो तक नहीं पा रहा हूँ। हमारे लोग ठीक हों, हम सिस्टम ठीक कर रहे हैं। मुख्यमंत्री इस मामले से चिंतित हैं और सख्त फैसले ले रहे हैं।”
नगरीय प्रशासन मंत्री कैलाश विजयवर्गीय कहते हैं, “भागीरथपुरा ही नहीं, पूरा इंदौर मेरा इलाका है। बल्कि हर घर मेरा है और उनका दर्द मेरा अपना दर्द है। मैं उन घरों का, उनके विलाप का हिस्सा हूँ। इन्हीं लोगों ने मुझे जनसेवा सिखाई, मुझे जिताया, अपना बनाया है। इसलिए मौत किसी एक मोहल्ले में नहीं हुई है, मेरे यहाँ हुई है। इस घटना के बाद से मैं सो नहीं पाया हूँ, मुझे नींद नहीं आ रही। मैं मंत्री हूँ, इसलिए इसकी जिम्मेदारी भी मेरी है।”
16 लोगों की मौत, 25 लोग आईसीयू में क्या सिस्टम काम नहीं कर रहा था? जिम्मेदारी किसकी है?
इस सवाल पर उन्होंने कहा, “मेरी भी जिम्मेदारी है। हमारा सिस्टम भी जिम्मेदारी से बच नहीं सकता। मुख्यमंत्री के निर्देश पर जांच बैठाई गई है। जो लोग इसके लिए सीधे तौर पर जिम्मेदार हैं, उन पर कार्रवाई की गई है।”
इंदौर दूषित पानी का दंश झेल रहा है। कई शहरों से ऐसी शिकायतें हैं। आगे क्या?
इस पर मंत्री कैलाश विजयवर्गीय का कहना है कि भविष्य में ऐसी विषम परिस्थितियाँ न बनें, इसके लिए हर शिकायत को विभाग गंभीरता से लेगा। “ऐसी शिकायतों के लिए प्रदेश स्तर पर नई हेल्पलाइन बनाई जा रही है। अब प्रदेश भर में पानी से जुड़ी हर छोटी शिकायत का प्राथमिकता से निराकरण किया जाएगा।”
अधिकारियों और स्थानीय नेताओं के बीच तालमेल की कमी?
अधिकारियों और स्थानीय नेताओं के बीच विवाद की बातें सामने आने पर विजयवर्गीय कहते हैं, “क्षेत्रीय पार्षद ने मुझे शिकायत की थी। उसी समय हमने निगम आयुक्त सहित अन्य अधिकारियों को चेता दिया था कि पानी का मामला तत्काल ठीक किया जाए, लेकिन उनकी चेतना जागृत नहीं हुई। अधिकारियों की लापरवाही से यह हादसा हुआ। यह बात जब मैंने सार्वजनिक रूप से कही, तो इसका मजाक उड़ाया गया। इस बारे में महापौर पुष्यमित्र भार्गव भी मुख्यमंत्री को अवगत करा चुके थे।”
विजयवर्गीय ने कहा, “लोकतंत्र में जनता अपने प्रतिनिधि को चुनती है, लेकिन जब जनप्रतिनिधि और अधिकारियों का तालमेल टूटता है, तो ऐसी परिस्थितियाँ बनती हैं। अधिकारियों का जनप्रतिनिधियों से तालमेल बहुत जरूरी है। जनता समस्याएँ लेकर अपने प्रतिनिधि के पास आती है और जनप्रतिनिधि अधिकारियों को चेताता है। अधिकारी कमरों में रहते हैं और शिकायतें सुनने-समझने की संवेदनशीलता नहीं दिखाते। ऐसे में हमें ऐसे दिन देखने पड़ते हैं।”
क्या महापौर की भी अधिकारी नहीं सुनते?
इस प्रश्न पर उन्होंने कहा, “जो भी अधिकारी हैं, उन्हें जनप्रतिनिधियों की सुनना पड़ेगी। इस घटना को लेकर जो कार्रवाई हुई है, उससे स्पष्ट है कि जनप्रतिनिधियों की अवहेलना करके कोई भी इंदौर में पदस्थ नहीं रह सकता।”
यदि भागीरथपुरा की शिकायत समय पर सुन ली जाती, तो हादसा नहीं होता?
विजयवर्गीय कहते हैं, “आपकी बात सही है। समय रहते शिकायत सुन ली जाती, तो यह हादसा नहीं होता। मामले में गड़बड़ी हुई है। जिन लोगों ने शिकायतों की अनदेखी की, उन पर मुख्यमंत्री के निर्देश पर कार्रवाई की गई है।”
आपके शब्दों से भी हंगामा मचा क्या कहना है?
इस पर विजयवर्गीय ने कहा, “एक वरिष्ठ पत्रकार का पहला सवाल था कि पीड़ितों को मुआवजा क्यों नहीं बंट पाया। उस समय मेरे मन में प्राथमिकता अस्पताल में भर्ती लोगों के इलाज की थी और हादसे पर नियंत्रण की थी। इसलिए बिना मुख्यमंत्री से पूछे हमने सरकारी ही नहीं, निजी अस्पतालों को भी संदेश दे दिया था कि वे बिना पैसे लिए इलाज करें, पैसे हम देंगे। ऐसे में मुआवजे का सवाल मुझे बेजा लगा। दूसरे सवाल में पत्रकार ने कहा कि वे अस्पतालों में जाकर आए हैं। उसी समय जो शब्द निकल गए, उसके लिए मैंने खेद प्रकट किया है। आप मेरे शब्दों पर जा सकते हैं, लेकिन मेरे दिल में नहीं झांक सकते।”
विजयवर्गीय कहते हैं, “कोरोना काल में न मैं विधायक था, न मंत्री, तब भी घर के बाहर रहता था। लोगों के लिए अस्पताल-अस्पताल घूमता था। इंदौर मेरे दिल, दिमाग और शरीर में बसता है। इन परिस्थितियों को बदलकर हम फिर इंदौर को श्रेष्ठतम बनाएंगे।”
