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पार्षद बने तो पांच साल में सिर्फ साढ़े तीन लाख रुपए ही मिलेगा वेतन

परिषद की होने लगी रंगाई-पुताई, परिषद में लगा सभापति का फोटो

पार्षद बने तो पांच साल में सिर्फ साढ़े तीन लाख रुपए ही मिलेगा वेतन
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ग्वालियर,न.सं.। नगर निगम चुनाव में पार्षद बनने के लिए उम्मीदवार पानी की तरह पैसा बहा रहे हैं। कम से कम 20 लाख रुपए प्रमुख दल के प्रत्याशी खर्च कर रहे हैं, लेकिन पार्षद बने तो पांच साल में सिर्फ साढ़े तीन लाख रुपए ही पगार ले पाएंगे और करीब 49 हजार रुपए भत्ते और बैठकों के रूप में मिलता है।

प्रमुख दलों के 358 उम्मीदवार चुनाव लड़ रहे हैं। जनसंपर्क, चुनाव कार्यालय, होर्डिंग, बैनर, प्रचार वाहन पर लाखों रुपए खर्च किए जा रहे हैं। मतदाताओं को भी अलग-अलग तरीकों से लुभाया जा रहा है। यह सब मेहनत इसलिए की जा रही है कि पार्षद बनकर पांच साल तक नगर निगम में जमे रहें। मानदेय, भत्ते के रूप में जितनी राशि पांच साल में पार्षद कमाते हैं, उससे चार से पांच गुना तक राशि पार्षद चुनाव में ही खर्च हो रही है। ऐसे में ये सवाल भी मौजूद है कि आखिर पार्षद बनने के बाद वे नुकसान में रहते हैं या फायदे में ?

किसे कितने मिलते हैं -

- पार्षद का प्रतिमाह मानदेय छह हजार रुपए है।

- 250 रुपए प्रति माह टेलीफोन भत्ता मिलता है।

- 225 रुपए बैठक भत्ता मिलता है। इसमें परिषद बैठक, समिति बैठक, वार्षिक साधारण शामिल है। एक माह में चार से ज्यादा बैठक होने पर पांचवी बैठक के लिए राशि की पात्रता नहीं होती।

महापौर बनने पर 11 हजार

- महापौर बनने पर 11 हजार रुपए मानदेय मिलता है, जबकि ढाई हजार रुपए सत्कार भत्ता मिलता है।

- सभापति को 9 हजार रुपए मानदेय मिलता है, जबकि सत्कार भत्ते के रूप में 1400 रुपए मिलते हैं। टेलीफोन भत्ते की पात्रता सभापति को नहीं मिलती।

- महापौर परिषद सदस्य बनने पर पार्षदों को वाहन सुविधा मिलती है। प्रतिदिन पांच लीटर डीजल और 1500 रुपए टेलीफोन भत्ता मिलता है।

पांच साल में इतनी कमाई

- पार्षद पांच साल में 3.60 लाख रुपए पगार के रूप में कमाता है।

- टेलीफोन भत्ते के रूप में 15 हजार रुपए मिलते हैं।

- पांच साल डेढ़ सौ बैठकों में शामिल होने पर 33 हजार 750 रुपए मिलते हैं।

- महापौर को पांच साल में 6,60000 रुपए पगार और डेढ़ लाख रुपए भत्ता मिलता है।

- सभापति को पांच साल में 5,40000 का मानदेय और 84 हजार रुपए भत्ते के रूप में मिलते हैं।

ये कर सकते हैं...

- महपौर अपनी कैबिनेट यानी मेयर इन काउंसिल (एमआईसी) का गठन करते हैं।

- निगम अध्यक्ष कार्य करने में असमर्थ हो तो महापौर कभी भी विशेष सम्मेलन बुला सकते हैं।

- अपने कार्यालय के अमले पर प्रशासकीय नियंत्रण।

- महामारी या आपदा की स्थिति में ऐसे काम के लिए निर्देश दे सकते हैं जो तत्काल जरूरी हो।

- कई मामलों में महापौर को मेयर इन कौंसिल अपने अधिकार भी सौंप सकती है।

इस तरह करवाते हैं काम

- महापौर, एमआईसी या निगम परिषद् द्वारा लिए जाने वाले निर्णयों के क्रियान्वयन की जिम्मेदारी नगर निगम आयुक्त की रहती है।

- महापौर अपने अधिकार क्षेत्र में आने वाले कार्य का प्रस्ताव बनाकर नगर निगम आयुक्त को भेजते हैं। आयुक्त द्वारा प्रस्ताव के मुताबिक उस पर अमल प्रक्रिया शुरू की जाती है।

नेताप्रतिपक्ष के साथ सभी कार्यालयों में हो रही सफाई

निगम चुनाव नजदीक आते ही जलविहार स्थित परिषद में महापौर कार्यालय के साथ-साथ नेताप्रतिपक्ष के कार्यालयों में साफ-सफाई शुरु कर दी गई है। वहीं पूरे परिसर पर रंग रोगन किया जा रहा है। परिषद के अंदर भी बिजली के सभी उपकरणों को दुरुस्त किया जा रहा है।

Updated : 24 Jun 2022 8:36 AM GMT
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स्वदेश वेब डेस्क

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