पत्रकारिता की लज्जा बचा लो ,कौन हैं ये पत्रकार के भेष में

मध्यप्रदेश में पत्रकारिता का लबादा पहने कुछ पत्रकारों की हरकत से पत्रकारिता सदैव शर्मसार हुई है। ऐसे में उपहार के लिए मारामारी करते पत्रकार इस पेशे की पवित्रता पर किसी कलंक जैसे प्रतीत होते हैं। भोपाल के कुशाभाऊ ठाकरे कन्वेंशन सेंटर से आये दृश्य साबित कर रहे हैं कि पत्रकारिता के नाम पर कुछ लोगों के जीवन का अंतिम सत्य सिर्फ उपहार पाना है। उपहार में छोटा सा थैला प्राप्त करने के लिए जिस तरह का आचरण देखने को मिला वो पूरे मीडिया पर सवालिया निशान लगा रहा है। थैले के लिए मची लूटमार के दृश्य बताते हैं कि पत्रकार के भेष में ये कोई और लोग हैं ये कम से कम पत्रकार तो नहीं हैं।
पत्रकारिता के लिए काला अध्याय
पत्रकारिता के लिए ये काला अध्याय ही माना जाएगा कि उपहार के लिए धक्का मुक्की ,टेबलों पर चढ़ जाना और मारामारी कर उपहार प्राप्त करना ये तो पत्रकारिता नहीं है। इस मसले पर वायरल वीडियो देशभर में चर्चा का विषय बन गए हैं और भोपाल की पत्रकारिता को लेकर भद्दे से भद्दे कमेंट किये जा रहे हैं। पहले बात करते हैं इस घटनाक्रम की। मध्यप्रदेश की मोहन यादव सरकार के दो साल पूरे होने पर मंत्रियों की पत्रकार वार्ताएं चल रही हैं। सरकार चाहती है कि सरकार की सफलता की कहानी आम जनता तक पहुंचे। लेकिन लोचा यहीं से शुरू होता है कि किसके जरिये पहुंचे। सरकार के प्रबंधन की ज़रा सी चूक पत्रकार वार्ताओं को एक मेले में तब्दील कर देती हैं और पत्रकार के भेष में न जाने कौन -कौन लोग उपहार प्राप्ति की लालसा में लूटमार करते नजर आते हैं।
वन मेले में कथित पत्रकारों की भीड़
इसी महीने भोपाल में वन मेले के लिए मीडिया कॉन्फ्रेंस हुई तो पत्रकारों की भीड़ देखकर आयोजकों के हाथ पैर फूल गए। आयोजकों ने उपहार बांटने के लिए पत्रकारों की दो सौ मीटर लम्बी लाइन लगवा दी। और कथित पत्रकार सिर्फ उपहार के लिए लाइन में लग गए। ये लाइन बता रही थी कि लाइन में लगने वाले लोग पत्रकार का रूप धरकर सिर्फ उपहार बटरोने आए थे। क्योंकि असल पत्रकार तो ऐसी किसी लाइन में लगने से रहा।
इन्हें कौन बुलाता है?
मंगलवार को सरकार के चार मंत्रियों की पत्रकार वार्ताएं आयोजित कीं और तकरीबन हर जगह मीडिया के भेष में झपटमारी करते लोग नजर आए। इन्हें कौन बुलाता है ? ये कौन से पत्रकार हैं? इनका मकसद सिर्फ उपहारों की जुगाड़ है। ये कहाँ लिखते और दिखते हैं। इससे किसी को कोई लेना-देना नहीं है। भोपाल के कुशाभाऊ ठाकरे कन्वेंशन सेंटर के दृश्य असल पत्रकारों की छवि पर काले धब्बे जैसे हैं। मंत्री चैतन्य काश्यप अपने विभाग की उपलब्धियां गिना के फारिग हुए थे कि उपहार में मिल रहे थैले के लिए भयावह स्थिति निर्मित हो गई। यही हाल मंत्री विजय शाह की पत्रकार वार्ता में हुआ और मंत्री तुलसी सिलावट और दिलीप अहिरवार, प्रदीप जायसवाल की प्रेस कॉन्फ्रेंस के बाद भी यही असहज स्थिति बन गई। जहाँ पत्रकार और पत्रकारिता एक तमाशे की तरह नजर आईं। सामान्य तौर पर ऐसी पत्रकार वार्ताओं में दैनिक समाचार पत्रों ,टीवी और महत्वपूर्ण सोशल मीडिया न्यूज़ चैनल्स के प्रतिनिधियों को आमंत्रित किया जाता है। लेकिन यहाँ तो मार्केटिंग के लोग ,केबल ऑपरेटर ,केबल टांगने वाले ,ओटो ड्राइवर ,बिरियानी बेचने वाले ,आरटीआई एक्टिविस्ट ,किराना व्यापारी, अंडा बेचने वाले तक पत्रकार के रूप में नजर आये। इन पत्रकार वार्ताओं में कुछ उपहार खोर तो अपने परिवारों के साथ आये ताकि ज्यादा थैले और स्टेशनरी मिल जाए। इन पर आयोजकों का कोई अंकुश नहीं है। जबकि ऐसे आयोजन आमंत्रित पत्रकारों के लिए होते हैं।
कथित पत्रकारों की भीड़ दिखाना क्या उचित है?
पत्रकार वार्ता आयोजित करने वाले विभागों का कहना है हमें मंत्री जी को भीड़ दिखाना होती है। इसलिए कोई भी आये भीड़ दिखाना चाहिए। वहीँ जनसम्पर्क के आला अधिकारी इस मसले पर ठोस नीति बनाना चाहते हैं ताकि सिर्फ आमंत्रित संस्थान से जुड़े पत्रकार ही ऐसे आयोजनों में आएं और पत्रकार के साथ पत्रकारिता की लज्जा भी बची रह सके।
