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सच्ची घटनाओं एवं प्रत्यक्ष अनुभव पर आधारित हैं कहानियां : डॉ. आशा नैथानी दायमा

अनुच्छेद-35ए के कारण बड़ा वर्ग बुनियादी अधिकारों से था वंचित : प्रो. केजी सुरेश

सच्ची घटनाओं एवं प्रत्यक्ष अनुभव पर आधारित हैं कहानियां : डॉ. आशा नैथानी दायमा
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भोपाल। माखनलाल चतुर्वेदी राष्ट्रीय पत्रकारिता एवं संचार विश्वविद्यालय के प्रकाशन विभाग की ओर से साहित्यकार डॉ. आशा नैथानी दायमा की पुस्तक 'जम्मू-कश्मीर : सच तो यही है' पर चर्चा का आयोजन किया गया। पुस्तक में शामिल कहानियां अनुच्छेद-35ए से संबंधित सत्य घटनाओं पर केंद्रित हैं। डॉ. दायमा ने कहानी 'उजड़े हुए लोग' का पाठ किया और अन्य कहानियों पर चर्चा की। कुलपति प्रो. केजी सुरेश ने कहा कि कहानियां बताती हैं कि जम्मू-कश्मीर में अनुसूचित जाति एवं अन्य वर्ग के लोगों को अनुच्छेद-35ए के कारण किस प्रकार की कठिनाइयों का सामना करना पड़ता था। जम्मू-कश्मीर मंक रहने वाली बड़ी जनसंख्या बुनियादी अधिकारों से भी वंचित थी।


कार्यक्रम में सहायक प्राध्यापक एवं जनसंपर्क अधिकारी लोकेन्द्र सिंह से पुस्तक पर चर्चा के दौरान डॉ. आशा नैथानी दायमा ने बताया कि पुस्तक में शामिल उनकी कहानियां जम्मू-कश्मीर की सच्ची घटनाओं एवं प्रत्यक्ष अनुभव पर आधारित हैं। कहानियां लिखने से पहले उन्होंने जम्मू-कश्मीर में लोगों के साथ लंबा समय बिताया है। ये कहानियां जम्मू-कश्मीर के उस सच को दिखाती हैं, जिस पर लंबे समय तक पर्दा रहा। लोग अनुच्छेद-३७० के बारे में तो चर्चा करते थे लेकिन उन्हें अनुच्छेद-३५ए के बारे में जानकारी ही नहीं थी। अनुच्छेद-३५ए के कारण वहाँ एक बड़े वर्ग को बुनियादी अधिकारों से भी वंचित रखा गया। इस अनुच्छेद के निष्प्रभावी होने वहाँ इन लोगों के जीवन में बदलाव दिख रहा है। उनको सही मायनों में अब जाकर स्वतंत्रता मिली है। डॉ. दायमा ने अपनी दूसरी कहानियों रुखसाना मेरी जान, लहूलुहान गोरखा और हमारा हीरो है यह पर भी बातचीत की।

भ्रम का वातावरण बनाया -

अपने अध्यक्षीय वक्तव्य में कुलपति प्रो. केजी सुरेश ने कहा कि जम्मू-कश्मीर का विलय भारत में बाकी रियासतों की तरह ही हुआ था। लेकिन कुछ लोगों ने जम्मू-कश्मीर को लेकर भ्रम का वातावरण बनाया। जम्मू-कश्मीर के कुछ लोगों को भ्रमित करके उनके मन में अलगाव की भावना पैदा की गई। जबकि जम्मू-कश्मीर भी भारत के बाकी राज्यों की तरह ही है। जम्मू-कश्मीर अध्ययन केंद्र और राष्ट्रीय विचार के लेखकों एवं साहित्यकारों के कारण अलगाव की भावना समाप्त हो रही है। जम्मू-कश्मीर का वातावरण बदल रहा है।

डॉ. कंचन भाटिया ने किया आभार-

कार्यक्रम का संचालन एवं समन्वय सहायक प्राध्यापक लोकेन्द्र सिंह ने किया। आभार प्रदर्शन प्रकाशन विभाग की निदेशक डॉ. कंचन भाटिया ने किया। कार्यक्रम में कुलसचिव प्रो. अविनाश वाजपेयी एवं अन्य शिक्षक, अधिकारी, कर्मचारी एवं विद्यार्थी भी ऑनलाइन शामिल हुए।

Updated : 2021-10-12T15:44:57+05:30
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स्वदेश वेब डेस्क

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