भारत भवन विवाद: पूर्व न्यासी सचिव रामेश्वर मिश्र ने भी प्रबन्धन पर उठाए सवाल

भारत भवन विवाद: पूर्व न्यासी सचिव रामेश्वर मिश्र ने भी प्रबन्धन पर उठाए सवाल
X
भारत भवन विवाद में नया मोड़, पूर्व न्यासी सचिव रामेश्वर मिश्र ने प्रबंधन और भोपाल लिट फेस्ट पर उठाए सवाल।

भोपाल। भारत भवन के पूर्व न्यासी सचिव प्रो रामेश्वर मिश्र पंकज ने भवन के वर्तमान प्रबन्धन और तानाशाही पर गंभीर सवाल खड़े किए हैं।उन्होंने माखन लाल चतुर्वेदी विवि के कुलगुरु विजय मनोहर तिवारी की चिंताओं से सहमति जताते हुए सरकार से तत्काल इस मामले में हस्तक्षेप का आग्रह भी किया है।उन्होंने कहा कि यह मध्यप्रदेश की एक श्रेष्ठ संस्था है। लेकिन इन दिनों यह संस्था अपने मूल स्वरूप को खोती जा रही है।

प्रो मिश्र के अनुसार भारत भवन, मध्यप्रदेश शासन द्वारा स्थापित है और इसे केन्द्रीय अनुदान भी मिलता है तथा इसके न्यासियों में केन्द्र के प्रतिनिधि अवश्य होते है। समकालीन विमर्श ही यहाँ की विशेषता रही है। क्योंकि यह इतिहास या दर्शन का केन्द्र नहीं है। यह साहित्य, संगीत, नाट्य, नृत्य और चित्रकला सहित सभी रूपंकर कलाओं का केन्द्र है। इन विषयों पर समकालीन राष्ट्र जीवन के प्रमुख विमर्श यहाँ होते रहने की परम्परा है।


इन दिनों भारत का समकालीन विमर्श क्या है? श्रीराम जन्मभूमि में भव्य मंदिर का निर्माण और उससे उभरी विराट जनचेतना भारत का सर्वोपरि विमर्श है। ऑपरेशन सिन्दूर के बाद भारत के शौर्य को जाग्रत करने वाले नाट्य एवं साहित्य सर्वोपरि विमर्श है। सोमनाथ स्वाभिमान पर्व समकालीन विमर्श है। स्वामी विवेकानंद के चिंतन से युवा वर्ग को मिलने वाली प्रेरणा समकालीन विमर्श है। जहीरुद्दीन बाबर भारत भवन के लिए कोई विमर्श का विषय नहीं है। आप जहीरुद्दीन के भक्त हो या उस पर आसक्त हो या उसके निंदक हो, इस पर किसी इतिहास शोध संस्था में जाकर आप अपना परचा पढ़ सकते है। उस पर बहस कर सकते हैं। भारत भवन उसकी जगह नहीं।

भारत भवन की स्थापना के उद्देश्ये और यहां के अब तक के विमर्श की गौरवशाली परम्परा में जहीरुद्दीन पर केन्द्रित किसी नई किताब पर चर्चा का कोई भी औचित्य नहीं है। जलालुद्दीन या सलीम पर भी चर्चा की जगह भारत भवन नहीं हो सकता। कोई और ठांव खोजनी चाहिए। प्रो मिश्र ने कहा कि निजी संस्थाओं को यह भवन समानता के आधार पर दिया जाना चाहिए न कि अफसरों की विशेष कृपा इसके आबंटन का आधार बने।उन्होंने भोपाल लिट् फेस्ट के विवाद पर कहा कि सरकारी सहयोग से होने वाले आयोजन सरकार की सांस्कृतिक नीतियों के अनुरूप ही होना चाहिये न कि एक खास मकसद के लिए।

Tags

Next Story