भारत भवन पर उठे सवाल, न्यासी की चिट्ठी से संस्कृति विभाग में हलचल

भारत भवन पर उठे सवाल, न्यासी की चिट्ठी से संस्कृति विभाग में हलचल
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भारत भवन पर सवाल, न्यासी विजय मनोहर तिवारी की चिट्ठी से BLF और संस्कृति विभाग में मचा हड़कंप।

भोपाल का भारत भवन जहां कला, साहित्य और संस्कृति की सांसें बसती हैं एक बार फिर सवालों के घेरे में है. भारत भवन के न्यासी और माखनलाल चतुर्वेदी राष्ट्रीय पत्रकारिता एवं संचार विश्वविद्यालय के कुलगुरु विजय मनोहर तिवारी ने संस्कृति मंत्री धर्मेंद्र लोधी को चिट्ठी लिखी है। यह पत्र अब भोपाल लिटरेचर फेस्टिवल (BLF) और भारत भवन के रिश्ते पर नई बहस की वजह बन गया है ।

विजय मनोहर तिवारी पत्र में लिखते हैं कि उनका मुद्दा किसी वैचारिक टकराव का नहीं बल्कि भारत भवन की गरिमा नीति और उसकी सार्वजनिक छवि का है. आखिर क्यों भारत भवन बार-बार ऐसे आयोजनों का केंद्र बनता है जिनसे विवाद खड़े होते हैं ?

BLF को विशेष छूट?

पत्र में सबसे गंभीर आरोप नीतिगत असमानता को लेकर है. पिछले आठ वर्षों से भोपाल लिटरेचर फेस्टिवल को लगातार भारत भवन में आयोजन की अनुमति दी जा रही है जबकि राज्य की अन्य साहित्यिक और सांस्कृतिक संस्थाओं को यह अवसर नहीं मिलता ।

न्यास मंडल में भी उठा मुद्दा

BLF को शासन से आर्थिक सहायता, भारत भवन जैसे प्रतिष्ठित परिसर का नियमित उपयोग और अन्य संस्थाओं को समान अवसर नहीं, यह सवाल न्यास मंडल की बैठकों में भी उठा लेकिन आपत्तियों के बावजूद आयोजन जारी रहा. इसे भारत भवन की “एक समान नीति” के सिद्धांत के खिलाफ बताया है।



विवाद जानबूझकर?

विजय मनोहर तिवारी का आरोप केवल प्रशासनिक पक्षपात तक सीमित नहीं है. BLF में ऐसे विषयों का चयन जानबूझकर किया जाता है, जो विवाद पैदा करें और मीडिया में सुर्खियां बनें. उनका तर्क है जब किसी आयोजन का जनता से स्वाभाविक जुड़ाव नहीं बन पाता तब चर्चा बटोरने के लिए विवाद को हथियार बनाया जाता है । लेकिन इस प्रक्रिया में नुकसान भारत भवन की छवि को होता है और लाभ आयोजकों को मिलता है ।

इंदौर लिटरेचर फेस्टिवल का उदाहरण

तिवारी ने अपने पत्र में इंदौर लिटरेचर फेस्टिवल का हवाला देकर पूछा है। इंदौर में वर्षों से आयोजन हो रहा है देश-विदेश के चर्चित लेखक आते हैं शालीन और संतुलित विमर्श होता है वह भी बिना किसी अनावश्यक विवाद के। फिर भोपाल में में बार बार विवाद क्यों?

बाबर जैसे विषयों पर आपत्ति

तिवारी बाबर जैसे आक्रांता को विमर्श का केंद्र बनाने पर आपत्ति जताते हैं. उनका कहना है कि आज जब देश सांस्कृतिक पुनर्जागरण के दौर से गुजर रहा है. तब शासन की सहायता से होने वाले आयोजनों में ऐसे विषय न केवल अनुपयुक्त हैं. बल्कि भारत की वर्तमान सांस्कृतिक चेतना के विपरीत भी हैं । मध्यप्रदेश की धरती खुद समृद्ध विरासत से भरी है राजा भोज, विक्रमादित्य, रानी कमलापति, भीमबैठका, उदयपुर जैसे विषय विमर्श के लिए पर्याप्त हैं. फिर बार-बार विवादास्पद इतिहास को केंद्र में लाने की ज़िद क्यों?

भारत भवन को अलग रखा जाए

विजय मनोहर तिवारी ने सुझाव दिया है कि अगर शासन BLF को सहायता देना चाहता है, तो वह किसी अन्य स्थान पर आयोजन करे, लेकिन भारत भवन जैसी सांस्कृतिक धरोहर को विवादों से दूर रखा जाए. उनका मानना है कि भारत भवन को बार-बार बदनामी के घेरे में लाना न तो संस्था के हित में है, न ही प्रदेश की सांस्कृतिक छवि के।

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