ओबीसी आरक्षण: प्रदेश सरकार के रवैये से देश का सुप्रीप कोर्ट हैरान

उच्चतम न्यायालय में ओबीसी वर्ग को 27 प्रतिशत आरक्षण से संबंधित प्रकरणों पर गुरुवार को सुनवाई निर्धारित थी, लेकिन मध्य प्रदेश सरकार की ओर से कोई भी अधिवक्ता न्यायालय में उपस्थित नहीं हुआ। सरकार के इस रवैये पर उच्चतम न्यायालय ने गहरा खेद व्यक्त किया।
न्यायमूर्ति नरसिम्हा एवं न्यायमूर्ति विजय विश्नोई की खंडपीठ के समक्ष सभी मामले सीरियल क्रमांक 106 पर अंतिम बहस के लिए सूचीबद्ध थे। जब प्रकरण की सुनवाई के लिए पुकार लगाई गई, तो मध्य प्रदेश सरकार की ओर से कोई भी अधिवक्ता उपस्थित नहीं हुआ।
हालांकि मध्य प्रदेश सरकार ने इस बात का खंडन करते हुए कहा कि न्यायालय में सरकार के वकीलों की पूरी टीम मौजूद थी। न्यायालय ने इस पर तल्ख लहजे में टिप्पणी करते हुए कहा कि यदि सरकार की ओर से कोई अधिवक्ता उपस्थित नहीं है, तो ऐसी स्थिति में सुनवाई कैसे की जा सकती है।
उल्लेखनीय है कि मध्य प्रदेश सरकार ने उच्च न्यायालय से ओबीसी आरक्षण से जुड़े समस्त प्रकरण उच्चतम न्यायालय में इस आशय से स्थानांतरित कराए थे, ताकि 27 प्रतिशत आरक्षण लागू करने के दबाव से बचा जा सके। सरकार द्वारा जारी भर्ती विज्ञापनों में ओबीसी वर्ग को 27 प्रतिशत आरक्षण दर्शाया जा रहा है, लेकिन वास्तविक रूप से 13 प्रतिशत पद नियम विरुद्ध रूप से होल्ड किए जा रहे हैं।
सरकार का यह कहना रहा है कि जैसे ही उच्चतम न्यायालय में मामले का निराकरण होगा, 27 प्रतिशत आरक्षण लागू कर दिया जाएगा। गुरुवार की सुनवाई में ओबीसी वर्ग की ओर से अधिवक्ता अनूप जॉर्ज चौधरी, जून चौधरी, रामेश्वर सिंह ठाकुर एवं वरुण ठाकुर उपस्थित रहे।
न्यायालय ने सरकार के इस आचरण को अत्यंत गंभीर मानते हुए खेद व्यक्त किया। ओबीसी पक्ष के अधिवक्ताओं के निवेदन पर उच्चतम न्यायालय ने समस्त प्रकरणों की अगली सुनवाई अब 4 फरवरी 2026 के लिए नियत कर दी है।
गौरतलब है कि मध्य प्रदेश सरकार ने उच्चतम न्यायालय में पैरवी के लिए सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता सहित पांच वरिष्ठ अधिवक्ताओं को नियुक्त कर रखा है। इसके बावजूद सुनवाई के समय सरकार का कोई प्रतिनिधि न्यायालय में मौजूद नहीं रहा।
