अमेरिका का वैश्विक विज्ञान से पीछे हटना मानव सभ्यता के लिए सबसे बड़ी चुनौती

ट्रम्प के आदेश से जलवायु, ऊर्जा और शोध संस्थानों से सामूहिक विदाई
अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प द्वारा दर्जनों अंतरराष्ट्रीय वैज्ञानिक, पर्यावरणीय और तकनीकी संस्थाओं से अमेरिका को बाहर निकालने का निर्णय केवल एक प्रशासनिक कदम नहीं है, बल्कि यह वैश्विक विज्ञान व्यवस्था की धुरी को हिला देने वाला घटनाक्रम बन गया है। यह फैसला ऐसे समय पर आया है जब जलवायु परिवर्तन, ऊर्जा संक्रमण, महामारी जोखिम और जैव विविधता संकट मानव सभ्यता के सामने सबसे बड़ी चुनौतियाँ बन चुके हैं।
अमेरिका दशकों से दुनिया की वैज्ञानिक महाशक्ति रहा है। अकेला अमेरिका वैश्विक वैज्ञानिक शोध पर होने वाले कुल खर्च का लगभग 28 से 30 प्रतिशत वहन करता है। विश्व बैंक और यूनेस्को के आँकड़ों के अनुसार, अमेरिका हर वर्ष लगभग 700 अरब डॉलर से अधिक शोध और विकास पर खर्च करता है। इसके बावजूद अब वह उन मंचों से पीछे हट रहा है, जहाँ पूरी दुनिया का वैज्ञानिक ज्ञान एकत्रित होता है और नीति में बदला जाता है।
जैव विविधता और पर्यावरणीय संकट
अंतरराष्ट्रीय संरक्षण संघ और जैव विविधता मंच जैसे संस्थानों की रिपोर्ट बताती हैं कि पृथ्वी पर लगभग दस लाख प्रजातियाँ विलुप्ति के कगार पर हैं। हर वर्ष करीब एक करोड़ हेक्टेयर वन क्षेत्र नष्ट हो रहा है। अमेरिका जैसे बड़े देश की भागीदारी इन प्रयासों के लिए वित्त, वैज्ञानिक डेटा और नीति समर्थन प्रदान करती थी। अब उसके हटने से इन वैश्विक संरक्षण प्रयासों की राजनीतिक और संस्थागत ताकत कमजोर पड़ेगी।
जलवायु परिवर्तन पर अंतरसरकारी पैनल (आईपीसीसी) को दुनिया का सबसे प्रामाणिक वैज्ञानिक निकाय माना जाता है। इसकी रिपोर्टें दुनिया भर की सरकारों की जलवायु नीतियों की नींव होती हैं। आईपीसीसी की छठी आकलन रिपोर्ट में बताया गया था कि औद्योगिक युग से अब तक पृथ्वी का औसत तापमान लगभग 1.1 डिग्री सेल्सियस बढ़ चुका है और यदि यही रफ्तार बनी रही तो 2035 तक यह 1.5 डिग्री की सीमा को पार कर सकता है। इस सीमा को पार करना मानव सभ्यता के लिए गंभीर जोखिम पैदा करेगा।
अमेरिका आईपीसीसी के सबसे बड़े वैज्ञानिक योगदानकर्ताओं में से एक रहा है। लगभग 20 प्रतिशत से अधिक प्रमुख लेखक और समीक्षक अमेरिकी संस्थानों से आते रहे हैं। ऐसे में अमेरिका का पीछे हटना जलवायु विज्ञान के लिए एक बड़ा झटका है।
वैश्विक सुरक्षा और कूटनीति
संयुक्त राष्ट्र विश्वविद्यालय और अंतर-अमेरिकी वैश्विक परिवर्तन संस्थान जैसी संस्थाएँ केवल शोध नहीं करतीं, बल्कि देशों के बीच वैज्ञानिक विश्वास भी बनाती हैं। कोविड-19 महामारी के दौरान वैश्विक डेटा साझा किए जाने से ही टीकों का विकास तेज हो सका। अमेरिका का इन मंचों से हटना भविष्य की महामारी, जैविक खतरों और जलवायु आपदाओं से निपटने की सामूहिक क्षमता को कमजोर करेगा। इसके साथ ही अमेरिका के बाहर जाने से वैश्विक अप्रसार व्यवस्था पर भी प्रतिकूल असर पड़ सकता है।
नवीकरणीय ऊर्जा और आर्थिक जोखिम
अंतरराष्ट्रीय नवीकरणीय ऊर्जा एजेंसी के अनुसार, 2023 में दुनिया भर में नवीकरणीय ऊर्जा में 1.7 ट्रिलियन डॉलर से अधिक का निवेश हुआ, जिसमें चीन, यूरोप और भारत तेजी से आगे बढ़ रहे हैं। सौर ऊर्जा की लागत पिछले वर्षों में लगभग 85 प्रतिशत तक घट चुकी है और पवन ऊर्जा 60 प्रतिशत से अधिक सस्ती हुई है।
अंतरराष्ट्रीय सौर गठबंधन का लक्ष्य 2030 तक एक ट्रिलियन डॉलर का निवेश जुटाकर विकासशील देशों में सौर ऊर्जा का विस्तार करना है। अमेरिका का इस गठबंधन से बाहर जाना न केवल तकनीकी सहयोग को कमजोर करेगा, बल्कि अमेरिकी कंपनियों को इस तेजी से बढ़ते वैश्विक बाजार से भी दूर कर देगा।
वैश्विक शक्ति संतुलन पर प्रभाव
आज विश्व दो हिस्सों में बँटता हुआ दिख रहा है। एक ओर यूरोप और एशिया हरित तकनीक, स्वच्छ ऊर्जा और डिजिटल नवाचार में आगे बढ़ रहे हैं, वहीं दूसरी ओर अमेरिका तेल और गैस आधारित ऊर्जा प्रभुत्व पर टिके रहने की कोशिश कर रहा है। अंतरराष्ट्रीय ऊर्जा एजेंसी के अनुसार, 2030 तक दुनिया की 90 प्रतिशत नई बिजली क्षमता नवीकरणीय स्रोतों से आएगी।
ऐसे में अमेरिका का इस वैश्विक बदलाव से दूर होना उसकी भविष्य की प्रतिस्पर्धात्मक क्षमता को भी कमजोर करेगा। ट्रम्प प्रशासन का यह फैसला इतिहास में उस मोड़ के रूप में दर्ज हो सकता है, जब अमेरिका ने वैश्विक विज्ञान नेतृत्व से कदम पीछे खींच लिए।जलवायु संकट, ऊर्जा परिवर्तन और जैविक खतरों के इस युग में दुनिया को सहयोग और साझा ज्ञान की सबसे अधिक आवश्यकता है। अमेरिका का इन मंचों से हटना न केवल वैश्विक विज्ञान को कमजोर करेगा, बल्कि स्वयं अमेरिका को भी भविष्य की अर्थव्यवस्था और सुरक्षा से दूर कर देगा।
