ऑटिज़्म के नाम पर प्रयोग नहीं: स्टेम सेल थेरेपी पर सुप्रीम कोर्ट की रोक, क्यों है अहम फैसला?

ऑटिज़्म के नाम पर प्रयोग नहीं: स्टेम सेल थेरेपी पर सुप्रीम कोर्ट की रोक, क्यों है अहम फैसला?
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सुप्रीम कोर्ट ने ऑटिज़्म के इलाज में स्टेम सेल थेरेपी को अनैतिक बताया। जानिए मरीजों, डॉक्टरों और मेडिकल सिस्टम पर इसके असर

नई दिल्ली। ऑटिज़्म स्पेक्ट्रम डिसऑर्डर के इलाज को लेकर देश में चल रहे एक संवेदनशील और विवादित मुद्दे पर सुप्रीम कोर्ट ने साफ और कड़ा रुख अपनाया है। अदालत ने कहा है कि ऑटिज़्म के इलाज के नाम पर स्टेम सेल थेरेपी देना न सिर्फ गलत है, बल्कि यह चिकित्सा कदाचार की श्रेणी में आता है, अगर यह अनुमोदित नैदानिक परीक्षणों के बाहर किया जा रहा हो यह फैसला सिर्फ एक इलाज पर रोक नहीं है, बल्कि उन हजारों परिवारों, डॉक्टरों और संस्थानों के लिए एक स्पष्ट संदेश है, जो उम्मीद और हताशा के बीच झूल रहे मरीजों को प्रयोग का माध्यम बना रहे थे।

क्या कहा सुप्रीम कोर्ट ने?

सुप्रीम कोर्ट ने अपने फैसले में साफ किया कि स्टेम सेल थेरेपी को ऑटिज़्म स्पेक्ट्रम डिसऑर्डर (ASD) का वैध इलाज बताकर पेश नहीं किया जा सकता। न्यायालय के अनुसार, इसके प्रभावी और सुरक्षित होने का कोई ठोस वैज्ञानिक प्रमाण मौजूद नहीं है न्यायमूर्ति परदीवाला ने कहा कि अनुमोदित और निगरानी वाले क्लिनिकल ट्रायल के बाहर स्टेम सेल का कोई भी उपयोग अनैतिक है और इसे चिकित्सा लापरवाही माना जाना चाहिए। अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि सिर्फ इसलिए कि स्टेम सेल को औषधि एवं प्रसाधन अधिनियम के तहत दवा माना गया है, इसका मतलब यह नहीं कि उसका इस्तेमाल नियमित इलाज के तौर पर किया जा सकता है।

सहमति है, फिर भी इलाज क्यों गलत?

इस फैसले का सबसे अहम पहलू सूचित सहमति (Informed Consent) से जुड़ा है। कोर्ट ने कहा कि अगर मरीज या उसके परिजन को इलाज से जुड़े जोखिम और सच्चाई पूरी तरह नहीं बताई गई, तो उनकी सहमति कानूनी रूप से मान्य नहीं मानी जा सकती। ऑटिज़्म के मामले में अक्सर परिवार भावनात्मक रूप से बेहद कमजोर स्थिति में होते हैं। ऐसे में जब उन्हें यह उम्मीद दिखाई जाती है कि स्टेम सेल से “सुधार” हो सकता है, तो यह उम्मीद ही शोषण का जरिया बन जाती है।

जो इलाज करा रहे हैं, उनका क्या होगा?

यहां कोर्ट ने मानवीय दृष्टिकोण भी अपनाया। सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि जो मरीज पहले से स्टेम सेल थेरेपी ले रहे हैं, उन्हें अचानक छोड़ नहीं दिया जाएगा लेकिन उनका इलाज नियमित चिकित्सा सेवा की तरह जारी नहीं रह सकता। कोर्ट ने राष्ट्रीय चिकित्सा आयोग (NMC), एम्स और स्वास्थ्य मंत्रालय को निर्देश दिया है कि ऐसे मरीजों को केवल अनुमोदित क्लिनिकल ट्रायल्स में ही शिफ्ट किया जाए, जब तक विधिवत शोध प्रोटोकॉल तैयार न हो जाए।

चिकित्सा नैतिकता की बड़ी जीत

यह फैसला मेडिकल एथिक्स के लिहाज से बेहद महत्वपूर्ण माना जा रहा है. सुप्रीम कोर्ट ने दो टूक कहा कि अगर कोई डॉक्टर बिना वैज्ञानिक प्रमाण के इलाज करता है, या तब करता है जब मेडिकल संस्थाएं पहले ही चेतावनी दे चुकी हों, तो वह देखभाल के मानक का उल्लंघन है। यानि अब नया है, ट्रायल है, नुकसान नहीं होगा जैसे तर्क अदालत में नहीं चलेंगे।

विज्ञान क्या कहता है स्टेम सेल और ऑटिज़्म पर?

भारतीय चिकित्सा अनुसंधान परिषद (ICMR) पहले ही स्पष्ट कर चुकी है कि ऑटिज़्म के लिए स्टेम सेल थेरेपी अभी पूरी तरह प्रायोगिक चरण में है विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) और इंटरनेशनल सोसाइटी फॉर स्टेम सेल रिसर्च (ISSCR) भी बिना ठोस प्रमाण इसके क्लिनिकल उपयोग के खिलाफ चेतावनी देते रहे हैं। संभावित जोखिमों में इम्यून रिएक्शन, संक्रमण और लंबे समय की जटिलताएं शामिल हैं, जिन पर अभी पर्याप्त डेटा नहीं है।

क्यों है यह फैसला इतना जरूरी

यह फैसला उस धुंध को साफ करता है, जहां विज्ञान, उम्मीद और व्यवसाय आपस में घुल-मिल गए थे। सुप्रीम कोर्ट ने साफ लकीर खींच दी है कि नवाचार के नाम पर मरीजों को प्रयोगशाला नहीं बनाया जा सकता ऑटिज़्म से जूझ रहे परिवारों के लिए यह फैसला याद दिलाता है कि फिलहाल सबसे भरोसेमंद रास्ता साक्ष्य-आधारित देखभाल, व्यवहार थेरेपी और दीर्घकालिक समर्थन ही है, मेडिकल सिस्टम के लिए, यह चेतावनी है अनुमान, प्रचार और मुनाफा, नैतिक चिकित्सा का विकल्प नहीं हो सकते।

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