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विश्व प्रसिद्ध सिरोही की तलवारें

लेखक - चौहान कुल भूषण पदमश्री महाराजाधिराज महाराव रघुवीर सिंह, सिरोही

विश्व प्रसिद्ध सिरोही की तलवारें
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सिरोही, तलवार का ही पर्यायवाची शब्द है एवं यहाँ की तलवारें हजारो वर्षो से विश्व प्रसिद्ध हैं।

323 ईसा से पूर्व के मई महीने में सिकंदर महान, महाराज पर्वतेश्वर जो हिमालय के राजा थे एंव कांगड़ा उनकी राजधानी थी, पर आक्रमण करने की तैयारी कर रहा था।

विशाल सतलज नदी कांगड़ा राज्य की सीमा थी एंव महाराज पर्वतेश्वर ने नदी के किनारे ऐसे बुर्जो की श्रखला बनाई, जिसे तीन प्रयासों एंव भारी क्षति के बावजूद भी सिकंदर महान पार नही कर सका।

तब सिकंदर महान ने यह योजना बनाई की एक महीने बाद भारी वर्षा आएगी और तब वो उसका फायदा उठाकर आक्रमण कर विजय श्री प्राप्त करेगा ।

इस दरमियान सिकंदर महान ने सोचा की यदि वो वर्तमान परिस्तिथि में भेष बदलकर महाराज पर्वतेश्वर के दरबार में जाता हैं तो उससे कई चीजों का पता चलेगा, जो आक्रमण के वक्त काम आएगी।

तब उसने अपने बालो का रंग बदला, शरीर का रंग बदला एंव पूर्ण हिन्दुस्तानी परिवेश पहनकर महाराज पर्वतेश्वर के दरबार में पहुंचा।

जब महाराज पर्वतेश्वर दरबार में पहुंचे तब सिंगाहसनारुड होने से पहले उन्होंने सिहांसन के पास खड़े रहकर सम्पूर्ण दरबार पर अपनी दृष्टि डाली, तब उन्होंने देखा की दरबार में केवल एक ही व्यक्ति की आसमानी रंग की आँखे थी, सिंकंदर ने सब कुछ बदल दिया परन्तु आँखो का रंग नही बदल सका।

तब महाराज पर्वतेश्वर भरे दरबार में चलकर उस आसमानी आँखो वाले व्यक्ति के पास पहुंचे और बोले "यूनानी नरेश" आप का स्वागत हैं मेरे दरबार में और सिकंदर महान को साथ लेकर दोनों नरेश एक ही सिंगाह्सन पर बैठे।

सिकंदर महान समझ गया था की वो अब खुले में आ गया हैं अत: उसने महाराज पर्वतेश्वर से निवेदन किया की मैं अपनी यूनानी तलवार की शक्ति का प्रदर्शन करना चाहता हूँ, इसलिए आप से निवेदन हैं की आप कृपया एक लकड़ी का तख्ता एंव एक मोटे लोहे का सरिया मंगवाए, जिसको मैं एक झटके में अपनी तलवार से दो टुकड़े कर दूंगा।

तब महाराज पर्वेतेश्वर के आदेशो से लकड़ी का तख्ता व लोहे का सरिया मंगवाया गया एंव सिकंदर महान ने उस मोटे लोहे के सरिये को लकड़ी के तख्ते पर रखकर एक झटके में अपनी तलवार से दो टुकड़े कर दिए एंव सारा दरबार उसे देखता ही रह गया।

तब महाराज पर्वतेश्वर ने आदेश दिया की सिरोही की "असिल" की तलवार एंव एक रेशमी रुमाल उनके समक्ष पेश किया जावे एंव उन्होंने एक हाथ में तो सिरोही की असिल की तलवार नंगी पकड़ी व दुसरे हाथ से उन्होंने उस रेशम के रुमाल को जोर से हवा में फेंका और जैसे ही वो रेशमी रुमाल हवा में डोलते- डोलते तलवार की नोक पर स्पर्श हुआ, उसी वक्त उसके दो टुकड़े हो गये एंव समस्त दरबार में सिरोही की तलवार की तेज धार की प्रसन्नसा हुई।

सिरोही की तलवारे इतनी विशेष थी की उन्ही के फलस्वरूप सिरोही राज्य अपनी स्वतंत्रता हमेशा कायम रख सका।

1570 ई.सन् में मुग़ल सम्राट अकबर ने सिरोही राज्य पर भयंकर आक्रमण किया, तब सिरोही नरेश महाराव मान द्वितीय के आदेशो से नांदिया के बारह वर्षीय कुंवर सुरत्राण को सुरक्षा के घेरे में आगे बढाया और जैसे ही अकबर के निकट पहुंचे तो कुंवर सुरत्राण ने ऐसा कस के तीर मारा की सम्राट अकबर हाथी से निचे गिर पड़ा और मरते-मरते बचा, फलस्वरूप सम्राट अकबर ने कसम खाई की वो जिन्दाजी कभी सिरोही की धरती पर पैर नही रखेगा।

इस घटना में कुंवर सुरत्राण के साथ-साथ सिरोही के लौहारो की भी तारीफ हैं जिन्होंने ऐसा तेज धार वाला तीर बनाया की अकबर मरते- मरते बचा।

1605 ई. सन् में गुरुनानक जी की सिखों की गद्दी पर 5 वें गुरु तेग बहादुर आये एंव उन्होंने यह निर्णय लिया की सिखों पर चारो ओर से मुसलमानों के बहुत आक्रमण हो रहे हैं इसलिए यह अति आवश्यक हैं की यदि सिरोही की तलवार इनके हाथो में हो तो विजयश्री इन्ही को प्राप्त होगी।

इस दृष्टिकोण से गुरु तेग बहादुर ने गद्दी पर बैठने से पहले, एक विशेष प्रतिनिधि मंडल सिरोही के महाराव सुरत्राण के पास भेजा एंव निवेदन किया की जब तक आप सिरोही की तलवार मुझे प्रदान नही करेंगे तब तलक में गद्दी आसीन नही होऊंगा।

तब महाराव सुरत्राण ने प्रसन्न होकर उस प्रतिनिधि मंडल के साथ सिरोही की विशेष तलवार भेजी, जिसे कमर को बांधकर गुरु तेग बहादुर गद्दी आसिन हुए, यह परम्परा अंतिम गुरु गोविन्द सिंह तक चली।

सिरोही की गद्दी पर 1705 ई. सन् में सिरोही राज्य के महाराव मान तृतीय आये और उन्होंने इस कार्य में इतनी रूचि दिखाई की सम्पूर्ण लौहारवाडे को यह आदेश दिए की सिरोही के लौहारवाडे में जितने शस्त्र बने वे सभी राजमहल सिरोही के Quality Control अधिकारी के समक्ष पेश हो और वो एक-एक की जाँच कर के उस हथियार पर राज्य की मौहर लगाएगे जिससे यह प्रतीत हो की यह तलवार सिरोही में बनी हुई हैं।

महाराव मान तृतीय के इस कदम से सिरोही की तलवार एंव हथियारों की प्रसन्नसा ओर बढ़ी और वे विश्व विख्यात हुए और तदुपरांत हर खरीदार उस राज्य की मौहर को देखकर ही सिरोही के शस्त्र खरीदता था।

सिरोही की तलवारें विभिन्न किस्म की बनती थी :-

• "सांकेला तलवार" इसकी यह तारीफ थी की यह तलवार कभी भी टूटती नही थी एंव बड़े युद्धो में विजय दिलाती थी, जो विशेषतया सेनापति व योधाओ के हाथो में रहती थी, इसलिए यह कहावत है की " जो नर बांधे संकेला, वो फिरे अकेला"

• "असिल" की तलवार इसकी धार सबसे तेज होती थी और यह वजन में बहुत हल्की होती थी जिससे औरते भी इसे इस्तेमाल कर सकती थी और कोई भी शक्तिशाली योधा इसकी नोक को पकड़कर उसे घुमाकर मुठ को स्पर्श कर सकता था। यह इतनी लचीली थी की मोड़ने के बाद भी यह उसी आकार में वापिस आ जाती थी और सिरोही की तलवारों में सबसे तेज धार वाली असिल की तलवार होती थी।

• "गजवेल" की तलवार रण में संकेला से दुसरे स्थान पर थी, इसलिए कई उपसेनापति एंव योधा इसे इस्तेमाल करते थे।

• "नालदार" यह तलवार चन्द्र आकार की होती थी, यह फौलाद से बनाई जाती थी, जिसके धार के बिच में नाल होती थी ।

• "मोतीलहर" यह तलवार फौलाद से बनी हुई होती थी, जिसके बीच में जगह-जगह खांचे बनाकर छर्रे डाले जाते हैं और यह तलवार जब युद्ध में चलती थी तो छर्रे आगे पीछे होने से उस से आवाज आती है।

• "लहरिया" इस तलवार की धार फौलाद के अलग-अलग रंग के टुकड़ो से बनाई जाती थी और तलवार की धार लहरिया एंव बहुत खुबसुरत दिखाती थी, इस तलवार को सम्मानित व्यक्तिओं और राजाओ को ही रखने की प्रथा थी।

• "रोटी" यह तलवार विशेषतया सैनिको के हाथ में रहती थी, इसकी धार बहुत तेज होती थी और वजन में भी हल्की होती थी।

इसी कारण अनादीकाल से सिरोही का लौहारवाडा मशहूर हैं और यहाँ के लगभग 500 लौहार परिवार प्राचीन व मध्यकालीन युग में विभिन्न तरह के शस्त्र :- भाला, तलवार, धनुष, तीर, कटार, जम्बिया, छुरा एंव कुल्हाड़ी इत्यादि बनाते थे।

1749 ई.सन् में महाराव मान तृतीय की मृत्यु के पश्चात उसके जेष्ठ पुत्र महाराव पृथ्वीराज गद्दी पर आये, जिन्होंने 1772 ई.सन् तक राज किया।

महाराव पृथ्वीराज ने भी उसी परम्परा को निभाया, उनके शासनकाल में एक बार एक बुजुर्ग राजपूत नीलकंठ महादेव की वाव में गया और उसके पानी पीते समय गलती से उसके हाथ का लठ वाव में गिर गया और तैरता हुआ दूर चला गया।

अब उसकी हिम्मत नही हुई की उसको वापसी लावे, अत: वो व्यक्ति अपनी लठ को पानी में छोड़कर चला गया।

कुछ समय बाद लौहारो की लड़कियां पानी भरने वहां आई, सारे घड़े भरने के बाद वहां से चली और आगे चलकर देखा की लौहारवाड़े की पतली गली में दो भैसें आपस में लड़ रहे थी और किसी की हिम्मत नही हुई की उनको दूर करे।

कुछ देर तक तो लड़कियों ने इंतजार किया एंव इन्हें चिंता हुई की अब वे ज्यादा देर नही रुक सकती क्योंकि घर पर मेहमान आये हुए थे। इधर भैसें इतने बड़े और शक्तिशाली थे की किसी की हिम्मत नही हुई उन्हें दूर करने की।

लौहारो की एक जेष्ठ लड़की को याद आया की नीलकंठ महादेव की वाव में एक लठ तैरता देखा था और वो लड़की भागकर उस वाव पर गयी और उस लठ को ले आई।

उसने अपने दोनों हाथो से कस के जोर से भैसों पर मारा की वो अलग हो जाये और रास्ता साफ हो जाये, परन्तु उस लठ ने तो सिरोही की जोरदार तलवार का काम किया और दोनों भैसों के दो टुकड़े हो गये।

तब वो तो लड़कियां अचम्भे में अपने घर चली गयी परन्तु कुछ समय बाद उन भैसों का मालिक आया, वह बहुत दुःखी हुआ उसे यह सब देखकर और उसने जाकर राजा से विनती की, तब महाराव पृथ्वीराज ने पूर्ण जाँच के आदेश दिए एंव परिणाम यह निकला की नीलकंठ महादेव की वाव के पानी के चमत्कार से उस लठ ने तलवार का काम किया।

तब महाराव पृथ्वीराज ने जनहित में 100 ताम्बे के घड़े उस पानी से भरवा के अपने राजमहल में रखे एंव उस वाव को बंद करवाकर उस पर नीलकंठ महादेव का मंदिर बनवा दिया, ताकि भविष्य में यह वाव कोई खोले नही और यह समस्या वापिस नही हो।

लेखक:- चौहान कूल भूषण पदमश्री महाराजाधिराज महाराव रघुवीर सिंह जी, सिरोही

Updated : 1 Aug 2021 4:37 PM GMT
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