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'CBI' से नहीं अब 'ED' से क्यों लगता है 'साहेब' को डर...

CBI से नहीं अब ED से क्यों लगता है साहेब को डर...
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वेबडेस्क। आजकल देश में एक नाम बहुत ही चर्चा का विषय बना हुआ है वह है 'ईडी' यानि प्रवर्तन निदेशालय। इसे लेकर खूब राजनीति हो रही है। देश का एक भी राजनीतिक दल इस समय ऐसा नहीं है जिसके बड़े-बड़े नेता ईडी से परेशान नजर ना आ रहे हों। मामला शीर्ष न्यायालय तक भी पहुंचा है और वहां पिछले दिनों जो फैसला सुनाया गया है उसे देखते हुए आसानी से कहा जा सकता है कि भारत की राजनीति में आने वाला समय ईडी की धमक को और भी मजबूत करने जा रहा है।

भारत की स्वाभाविक शासक पार्टी कहे जाने वाली कांग्रेस की अध्यक्ष श्रीमती सोनिया गांधी से लेकर राहुल गांधी राकांपा के चाणक्य कहे जाने वाले शरद पवार, पूर्व गृहमंत्री पी चिदंबरम, झारखंड के मुयमंत्री हेमंत सोरेन, लालू प्रसाद यादव, ममता के भतीजे अभिषेक बनर्जी, आम आदमी पार्टी के सत्येंद्र जैन, मनीष सिसौदिया,फारूख अदुल्ला, महबूबा ,जगनमोहन रेड्डी, अखिलेश यादव, मायावती से लेकर विपक्ष के अनेक नेता इस समय किसी न किसी मामले में प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप से 'प्रवर्तन निदेशालयÓ यानी ईडी के राडार पर हंै। एक दौर था जब भ्रष्ट नेताओं और अधिकारियों को सीबीआई से डर लगता था, लेकिन आजकल देश के भ्रष्ट तंत्र को ईडी का नाम सुनते ही कंपकपी छूटने लगती है।आखिर क्या है ईडी और कयों शीर्ष न्यायालय के ताजा निर्णय के बाद देश में ईडी और भ्रष्टाचार को लेकर नई बहस खड़ी हो गई है। आज हम इसी मामले को समझने का प्रयास करते हैं।

पीएमएलए प्रिवेंशन ऑफ मनी लांड्रिंग एक्ट -

पीएमएलए प्रिवेंशन ऑफ मनी लांड्रिंग एक्ट यानी पीएमएलए के मौजू दा प्रावधानों को चुनौती देने वाली 242 याचिकाओं को निराकृत करते हुए शीर्ष न्यायालय की तीन सदस्यीय खंडपीठ ने खारिज करते हुए ईडी द्वारा की जाने वाली गिरतारी और जमानत के प्रावधानों को कायम रखा है। धन शोधन के खिलाफ बने पीएमएल का मतलब है दो नंबर के पैसे को हेरफेर से ठिकाने लगाने वालों के खिलाफ कानून। इस कानून को अटल जी की सरकार ने 2002 में बनाया था, लेकिन इसे और अधिक मारक बनाया 2005 में मनमोहन सरकार के वित्तमंत्री पी चिदंबरम ने। अब यही कानून कांग्रेसी और विपक्षी नेताओं के लिए गले का फंदा बना गया है। इस संशोधित कानून के तहत ईडी को किसी को भी गिरतार करने किसी भी अवैध संपति को जब्त करने के लिए किसी सक्षम प्राधिकारी की अनुमति की जरूरत नहीं होती है। शीर्ष न्यायालय ने इन्हीं प्रावधानों को खारिज करने वाली याचिकाओं को खारिज किया है।

क्या होती है मनी लॉन्ड्रिंग -

धन शोधन मामला (मनी लॉन्ड्रिंग)बड़ी मात्रा में अवैध धन को वैध बनाने की प्रक्रिया है। सीधे शब्दों में कहें तो काली कमाई को एक नबर में करने का हथकंडा मनी लॉन्ड्रिंग कहलाता है। काला धन वो धन है, जिसकी कमाई का कोई स्रोत नहीं होता, यानी उस पर कोई टैस नहीं दिया गया है। आय का स्रोत स्पष्ट होना चाहिए। यानी कोई अधिकारी है और उसे जो वेतन मिलता है उसके अनुरूप उसकी संपति या जमा धन ही उसके पास होना चाहिए। मनी लॉन्ड्रिंग में धन किसी वैध स्रोत से आया हुआ दिखाया जाता है, लेकिन हकीकत में ऐसा नहीं होता है मसलन नेशनल हेराल्ड का मामला इसका उदाहरण है। धोखेबाजी कर अवैध रूप से कमाया धन एक नबर में दिखाना या उसका हिसाब नहीं बता पाना वस्तुत: मनी लांड्रिंग ही है। बोलचाल के शब्दों में कहें तो मनी लॉन्ड्रिंग धन के स्रोत को छुपाने की चालाकी ही है, जो असर अवैध गतिविधियों जैसे ड्रग्स की तस्करी, भ्रष्टाचार, गबन, राजनीतिक प्रभाव से कमाया अवैध धन या जुए से मिलता है। यानी अवैध तरीके से मिले पैसे को एक वैध स्रोत में परिवर्तित करने की प्रक्रिया को ही मनी लॉन्ड्रिंग कहते हैं। मनी लॉन्ड्रिंग के जरिए ड्रग डीलर से लेकर बड़े व्यापारी,उद्योगपति, भ्रष्ट अधिकारी, माफिया, नेता करोड़ों से लेकर अरबों रुपए तक के फ्रॉड करते हैं।

ईडी और अन्य एजेंसियों में अंतर -

सीबीआई -

दिल्ली पुलिस स्पेशल स्थापना अधीनियम 1946 के तहत सीबीआई का गठन हुआ है। लेकिन सीबीआई को किसी भी राज्य में जांच के लिए उस राज्य सरकार की अनुमति/सिफारिश लेनी होती है। अगर जांच किसी अदालत के आदेश पर हो रही है तब सीबीआई कहीं भी जा सकती है। पूछताछ और गिरतारी भी कर सकती है। भ्रष्टाचार से जुड़े किसी मामले में अधिकारियों पर मुकदमा चलाने के लिए भी उसे उनके विभागीय मुखिया से भी अनुमति लेनी होती है।

एनआईए -

नेशनल इंवेस्टिगेटिंग एजेंसी यानी एनआईए को बनाया गया है एनआईए एक्ट 2008 के तहत। इसका कार्यक्षेत्र पूरा देश लेकिन उसका दायरा केवल आतंक से जुड़े मामलों तक ही है। मनी लॉन्ड्रिंग एक्ट यानी की ताकत का प्रयोग करने वाली ईडी केंद्र सरकार की अकेली जांच एजेंसी है, जिसे मनी लॉन्ड्रिंग के मामलों में नेताओं और अफसरों को बुलाने औऱ उन पर मुकदमा चलाने के लिए सरकार की अनुमति की जरूरत नहीं होती है। वह कहीं भी छापा मार सकती है और संपत्ति को अटैच औऱ जब्त कर सकती है।

एक लाख करोड़ की संपत्ति जब्त -

पिछले कुछ वर्षों से पैसों की धोखाधड़ी करने वालों पर जमकर कार्रवाई की जा रही है। सालाना दर्ज होने वाले मामलों की संख्या पिछले चार वर्षों में छह गुना हो गई है। धन शोधन रोकथाम कानून के तहत ईडी एक लाख करोड़ रुपये की भारी-भरकम संपत्ति जब्त कर चुकी है। साल 2018-19 में केवल 195 मामले दर्ज किये गए थे। यह आंकड़ा 2021-22 में 1180 पर पहुंच गया। एजेंसी ने साल 2019-20 में सबसे अधिक 28,800 करोड़ रुपये की संपत्तियों की कुर्की की थी। शीर्ष न्यायालय ने धन शोधन रोकथाम कानून के तहत संपत्तियों को जब्त करने के ईडी के अधिकारों को बरकरार रखने का फैसला दिया है। इसका मतलब है कि ईडी द्वारा जब्त किया गया एक लाख करोड़ रुपया एजेंसी की कस्टडी में ही रहेगा। ईडी द्वारा जब्त संपत्ति की कीमत 31 मार्च 2022 को एक लाख करोड़ रुपये से ऊपर पहुंच गई थी। पीएमएलए के तहत न्यायिक प्राधिकरण ने ईडी की 60 हजार करोड़ रुपए की कुर्की को बरकरार रखा है। जिसका कजा एजेंसी को हस्तांतरित कर दिया जाएगा, जबकि अन्य मामलों में कार्यवाही लंबित है।

अधिकांश पैसा बैंक फ्रॉड और पोंजी स्कीम मामलों से -

जब्त की गई राशि में से करीब 57,000 करोड़ रुपये बैंक फ्रॉड और पोंजी स्कीम मामलों से है। ईडी ने हाल ही में जब्त की गई कुछ संपत्तियों की बिक्री भी शुरू की थी। ईडी द्वारा की गई इस नीलामी में 15,000 करोड़ रुपये की बिक्री हुई थी। यह पैसा उन बैकों को वापिस कर दिया गया, जो इन घोटालों के मामलों में पीडि़त था।

5422 मामलों में महज 313 गिरफ्तारी -

इन दिनों शोर इस बात का है कि ईडी किसी को भी राजनीतिक इशारों पर गिरतार कर रही है लेकिन न्यायालय में सॉलिसिटर जनरल ने जो जानकारी दी है उसके अनुसार पीएमएलए के तहत जांच किए गए 5422 मामलों में से केवल 313 गिरतारियां की गई हैं और 388 तलाशी की गई हैं। जो कि अन्य देशों के न्यायालय जैसे-यूके, यूएसए, चीन, ऑस्ट्रेलिया, हांगकांग, बेल्जियम और रूस की तुलना में काफी कम है। दर्ज किए गए 33 लाख विधेय अपराधों में से ईडी ने पिछले पांच वर्षों में केवल 2186 मामलों को जांच के लिए लेने का फैसला किया है।

ईडी अधिकारी पुलिस अधिकारी नहीं

न्यायालय ने यह भी माना कि ईडी अधिकारी 'पुलिस अधिकारी' नहीं हैं और इसलिए अधिनियम की धारा 50 के तहत उनके द्वारा दर्ज किए गए बयान संविधान के अनुच्छेद 20 (3) से प्रभावित नहीं हैं, जो आत्म-अपराध के खिलाफ मौलिक अधिकार की गारंटी देता है। न्यायालय ने आगे कहा कि प्रवर्तन मामले की सूचना रिपोर्ट (ईसीआईआर) को प्राथमिकी के साथ नहीं जोड़ा जा सकता है और यह केवल ईडी का एक आंतरिक दस्तावेज है। इसलिए प्राथमिकी से संबंधित सीआरपीसी प्रावधान ईसीआईआर पर लागू नहीं होंगे। यह निर्णय न्यायाधीश एएम खानविलकर, न्यायाधीश दिनेश माहेश्वरी और न्यायाधीश सीटी रविकुमार ने सुनाया है।

Updated : 2022-08-06T00:19:10+05:30
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स्वदेश वेब डेस्क

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