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कंगना की हुंकार से खुल रहे सिनेमा के असल पर्दे

विवेक पाठक

कंगना की हुंकार से खुल रहे सिनेमा के असल पर्दे
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सभी का खून शामिल है इस मिट्टी में किसी के बाप का हिन्दुस्तान थोड़े ही है लाइनों पर तालियां ठोंकने वाली एक पूरी जमात इन दिनों मौनी बाबा बन गयी है। कंगना रनौत ने यह बात मुंबई को लेकर क्या कही सबके मुंह में दही जम गया है। अकेली कंगना दिलेरी के साथ महाराष्ट्र सरकार के जोर के आगे आवाज बुलंद कर रही है। बॉलीवुड में यह राष्ट्रवाद की गूंज का सुनहरा समय है।

मुंबई सिने दुनिया में ऐसा मौन पहले नहीं देखा। जो जावेद अख्तर और शबाना आजमी अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के पैरोकार रहे हैं और सरकार की आलोचना को नागरिक बताते रहे हैं वे कंगना रनौत द्वारा मुंबई पुलिस पर सवाल खड़े करने पर चुप रहे हैं। ये लोग दुनिया भर के लिए न्याय की मांग करते रहे हैं मगर मुंबई में ही जब एक युवा अभिनेता की संदिग्ध परिस्थितियों में मौत हो जाती है तो उसकी जांच के लिए कोई आवाज नहीं उठाई जाती। इसके अलावा जो गिने चुने लोग आवाज उठा भी रहे हैं उनका साथ देने के लिए कोई आगे नहीं आता। कन्हैया कुमार के साथ नई दिल्ली में सीएए आंदोलन में साथ देने वाली दीपिका पादुकोण को उस समय हम लेकर रहेंगे आजादी के बोल तो खूब पसंद आए थे मगर जब अभिव्यक्ति के लिए यही आवाज जब मुंबई में कंगना रनौत ने उठाई तो दीपिका पादुकोण ने अभी तक मुंह नहीं खोला है। ये वही दीपिका पादुकोण हैं जो मेंटल हेल्थ को लेकर अभियान चलाती हैं मगर खुद के आंगन में जब एक साथी अभिनेता की मौत मानसिक बीमारी को लेकर होने की बात कही जाती है तो उस पर दो लाइनें भी बोलने से बचती हैं। बॉलीवुड में इस समय अव्वल दर्जे का मौन वाकई अचरज डालने वाला है।

कंगना रनौत ने अगर सुशांत सिंह मामले में मुंबई पुलिस द्वारा रिस्पांस न देने पर आपत्ति जताई एवं मुंबई पुलिस की आलोचना की तो उस पर सार्थक बहस की जाने की जरुरत थी। इस देश में क्या अब तक किसी कलाकार ने पहली पर इस तरह की असहमति जताइ थी। हिन्दी सिनेमा में फरहान अख्तर, अनुराग कश्यप, तापसी पन्नू जैसे कलाकार तो देश में घट रही घटनाओं पर हमेशा प्रतिक्रिया देते रहे हैं। प्रियंका चोपड़ा ने तो अमेरिका में रहकर रोहिंग्या कैंप में रहने वाले मुसलमानों की चिंता कर ली थी मगर जब मुंबई को लेकर कंगना ने सवाल उठाया तो उस पर सब क्यों चुप हैं।

महाराष्ट्र सरकार के मंत्री संजय राउत ने कंगना के सवाल उठाने पर उन्हें हरामखोर तक कह डाला। बेशक कंगना ने अगर मुंबई की पीओके से तुलना की है तो उस पर सार्थक बहस होनी चाहिए थी। कंगना की बात का शालीन जवाब भी दिया जा सकता था लेकिन कंगना के मुंह खोलने पर उनकी मेहनत का बनाया ऑफिस तोड़ा जाना कहां तक सही है। सवाल ये भी उठता है कि कंगना ने तो केवल मुंबई को पीओके के समान बताया था मगर आमिर खान ने तो भारत को ही नकार दिया था। आमिर खान को तो भारत रहने लायक भी नहीं लगा था तब आमिर खान का देश में कितने लोगों ने विरोध किया था। क्या कंगना की तरह शिवशैनिकों ने आमिर खान का विरोध किया था। आमिर खान पर बॉलीवुड से कहीं आलोचना का वार हुआ था क्या । नहीं बिल्कुल नहीं। बस यही अंतर है और कंगना के सवाल उठाए जाने पर इन्हीं दोहरे रवैए वालों के अहम पर चोट हो रही है। इसमें दो राय नहीं कि मुंबई सिने दुनिया पर लंबे समय से अंडरवल्र्ड का साया रहा है। दाउद के इशारे पर फिल्मों के हीरो तय होते रहे हैं और स्टार बनते रहे हैं। मुंबई में काफी कुछ इस तरह का काला साम्राज्य रहा है जिस पर कंगना रनौत ने उंगली उठाई है। मुंबई के अंदर फैली इस कालिमा को धोने के लिए जरुरत है कि इस पर बात कही जाए। कंगना ने बहुत दिलेरी से सवाल उठाए हैं इसलिए उनका मुंह बंद करने की कोशिशों का देश भर में विरोध हो रहा है। बॉलीवुड में राष्ट्रवाद की बात अगर वे कर रहीं है तो इस पर खुलकर बहस की जाने की जरुरत है। अब इस आवाज को दबाने वालों के समय लदने वाला है। देश सब देख रहा है।

Updated : 13 Sep 2020 12:17 PM GMT
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Swadesh Digital

स्वदेश वेब डेस्क www.swadeshnews.in


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