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लक्ष्मीबम और इरोज नाउ जैसे प्रयासों को घुटनों पर लाइए

लक्ष्मीबम और इरोज नाउ जैसे प्रयासों को घुटनों पर लाइए
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विवेक पाठक

हिन्दुुत्व का मजाक आज कइयों के लिए नाम कमाने का खिलौना हो गया है। विरोध भी बिकता है इसी लाइन पर यह खेल जारी है। यहां दीपावली पर पूजी जाने वाली धन्य धान्य की अधिष्ठात्री देवी महालक्ष्मी के नाम पर पटाखे बनते आए हैं तो अब लक्ष्मी बम फिल्म भी बन रही है। इरोज नाम की फिल्म कंपनी ने नवरात्रि के नाम से विवादास्पद विज्ञापन बनाए और प्रचारित किए। अब उद्देश्य पूरा होते ही रस्मी माफी भी मांग ली है।

जरा सोचिए हिन्दुत्व के प्रतीकों एवं विचारों का मजाक किसलिए बनाया जा रहा है इसके पीछे क्या उद्देश्य हैं। क्यों सेकुलर गैंग के सलीम जावेद से लेकर फिल्मस्टार आमिर खान बार बार लगातार यही कर रहे हैं। क्यों जय मीम जय भीम नारे वाले भी हिन्दु देवीताओं के चित्रों एवं मूर्तियों की अवहेलना कर रहे हैं। क्यों अन्याय पर विजय के प्रतीक श्रीराम को जातियों के चश्मे से पेश किया जा रहा है। क्यों पिछले कुछ दिनों से रावण के प्रति सहानुभूति प्रकट करते पोस्ट सोशल मीडिया पर वायरल किए जा रहे हैं एवं समाज में जातीय विभाजन का मानस तैयार किया जा रहा है।

असल में इन सबके पीछे अपने छिपे कारण हैं। हजारों साल से स्थापित भारतीय संस्कृति अपनी उदारता एवं वसुधैव कुटुम्बम की भावना से देश दुनिया में पूज्यनीय है। जिस गीता रामायण एवं योग को दुनिया समझ रही है उसी के प्रति भारतीय जनमानस में सवाल खड़े किए जा रहे हैं। बौद्धिक, उदार एवं सेकुलर के नाम पर हिन्दुत्व की आलोचना करने एवं सुनने वाला वर्ग तैयार किया जा रहा है। यह बीमारी बड़े शहरों से लेकर छोटे नगरों तक तेजी से फैल रही है। राधे मां सरीखे चरित्रों के उदाहरण देकर हिन्दुत्व का मजाक बनाया जा रहा है। फिल्मों के जरिए ये नैरेटिव तेजी से आगे बढ़ाया जा रहा है।

हिन्दू प्रतीक इस प्रयोगधर्मी नैरेटिव के लिए सबसे आसानी से उपलब्ध हैं। याद कीजिए कोई फिल्म जो राजकुमार हीरानी, अनुराग कश्यप और अनुभव सिन्हा ने ऐसी बनायी हो जिसमें हिन्दुत्व से अलग दूसरे धर्मों एवं उनके प्रतीकों पर व्यंग्य हो, कॉमेडी से सराबोर कटाक्ष हो। हो सकता है कुछ लोग कहें पीके मस्जिद और चर्च में भी गया था मगर सवाल ये है कि क्या इस फिल्म में सारे व्यंग्य बराबरी से ही थे क्या। क्यों पीके फिल्म में सबसे बड़े मजाक के पात्र सड़कों पर भागते शिवशंकर बने थे। क्या आमिर खान ने ऐसा ही मजाक कुर्बानी की कुप्रथा को लेकर बनाया था। दरअसल सेकुलरों की ब्रिगेड का असल सच यही है। ये सारे दिल्ली , मुंबई और बड़े शहरों के लोग पाखंड का आरोप हिन्दू और हिन्दुत्व पर मढ़ते आए हैं। इस्लाम और ईसाई धर्म को लेकर इनका तर्क और चिंतन मौनी बाबा बन जाता है। इनकी जिव्हा को लकवा मार जाता है। ये हिन्दु प्रतीकों की आलोचना करके गर्वित होते हैं मगर बाकियों पर नहीं। देश में इनकी प्रासंगिकता का समापन इसी वजह से होता जा रहा है। इसके बाबजूद इनके प्रयासों में कमी नहीं है। ऐसे ही लेखक, वक्ता, साहित्यकार, फिल्म और रंगगर्मी कुछ न कुछ हिन्दुत्व को अपमानित करने निरंतर कर रहे हैं।

आखिर दुनिया में बम का नाम रखने के लिए नाम कम पड़ गए हैं जो लक्ष्मी बम और लक्ष्मी बंडल बाजार में बेचे जाते हैं। लक्ष्मी बम आग से फटता है तो उस पर अंकित महालक्ष्मी का चित्र भी स्वाहा हो जाता है। ये हमारी धार्मिक भावनाओं का स्वाहा होने जैसा भी है जिसे हम सामान्य मानते जाते हैं। हम अपने प्रतीकों के अपमान के प्रति सदियों से अलसाए हैं नहीं तो ऐसे प्रयोग हेाते नहीं रहते। आखिर फिल्म का नाम लक्ष्मी बम रखने की हिम्मत कैसे हो जाती है। क्या किसी फिल्मकार की हिम्मत अल्लाह के नाम पर ऐसा करने की हुई है। भारत ही नहीं देश दुनिया में ऐसा कहीं नहीं हो सकता। दिल्ली के दबंग पत्रकार आलोक तोमर ने पैगंबर मोहम्मद पर कुछ व्यंग्य चित्र क्या प्रकाशित किए थे उनके खिलाफ दिल्ली में मुकदमा दर्ज हो गया था। फ्रांस में मुहम्मद के नाम पर कार्टून बनाने वाले शिक्षक का छात्र ने क्या किया दुनिया ने देखा है। ये सारे हिंसक उदाहरण हिन्दुओं के लिए कोई अनुकरण का विषय नहीं हैं। हम उदार, अहिंसक और सहिष्णुता के पैरोकार हैं और हमेशा रहना चाहते हैं लेकिन हमें हिन्दुत्व एवं हिन्दू प्रतीकों के मान सम्मान की चिंता भी बराबरी से करनी होगी। हमारी क्षमाशीलता के कारण हमारा मजाक बने ये हमें रोकना होगा। हिन्दु देवी देवीताओं, हमारे प्रतीकोंं, संस्कारों एवं प्रथाओं के प्रति अपमान करती हर प्रतिक्रिया का हमें कड़ा विरोध करना होगा। नहीं तो कभी तनिष्क एकत्वम लेकर हमें उदारता अपनाने का उलाहना देगा तो कभी आश्रम नाम की वेबसीरीज हमारे धर्म का मजाक बनाएगी। ये सिलसिला रुकने वाला नहीं है। तनिष्क ने हिन्दुओं के कड़े विरोध के बाद माफी मांग ली है तो नवरात्रि के नाम पर अश्लील पोस्ट जारी करने वाली इरोज नाद कंपनी ने भी माफी मांग ली है मगर सवाल तो ये है कि गलतियां करने का ये सिलसिला हिन्दु प्रतीकों को लेकर ही क्यों हो रहा है। देखिए समझिए और सतर्क होइए। तनिष्क की तरह हर गलती करने वाले को घुटनों पर लाइए। कारोबार के लिए हिन्दुओं के उड़ाए मजाक के मंसूबे ध्वस्त कीजिए। अगर आपका प्रतिरोध प्रखर रहा तो न लक्ष्मीबम बनेगा और उसके नाम पर फिल्म।

Updated : 25 Oct 2020 1:34 PM GMT
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Swadesh Digital

स्वदेश वेब डेस्क www.swadeshnews.in


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