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प्रतिभाओं को बढ़ाकर क्षमताओं को निखारने वाला परिवर्तन

शिरोमणि दुबे

प्रतिभाओं को बढ़ाकर क्षमताओं को निखारने वाला परिवर्तन
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स्वदेश वेबडेस्क। जब भारत के अनंत आकाश में राफेल की गूंज-गडग़ड़ाहट से चीन, पाकिस्तान सहित दुश्मन देशों की सांसें उखड़ रही थी उसी समय देश के भीतर शिक्षा क्षेत्र में बड़े बदलाव के साथ प्रस्तुत की नई शिक्षा नीति 2020 के आगाज से हर राष्ट्रीय विमर्श में विधवा विलाप करने वाले वामपंथियों की चीखें ही निकल गई। अतीत के आईने में भारत के भविष्य को तलाशती-तरासती नई शिक्षा नीति के प्रारूप के पन्ने परत दर परत बाहर आने लगे वैसे ही लेफ्ट, लिबरल्स रुदाली कैंप शोर में डूबता चला गया। नई शिक्षा नीति का अभी तो केवल मसौदा ही तैयार हुआ है लेकिन साम्यवादियों के चेहरे इसे देखते ही लाल हो गए हैं। असल में आजादी के बाद से ही पाठ्यक्रम तय करने और विशेष रूप से इतिहास लेखन की जिम्मेदारी कांग्रेसियों ने इन्हीं वाममार्गियों को दे रखी थी। सरकार ने उन्हें इतनी छूट दे रखी थी कि वह कुछ भी करें उस पर सवाल नहीं उठाए जाते थे। अब 34 साल बाद बदली गई इस नई शिक्षा नीति में वामपंथियों को बाहर का रास्ता दिखा दिया गया है। बोर्ड परीक्षा और नंबरों की होड़-दौड़ में पिसने वाले छात्रों के लिए जो शिक्षा नीति बनाई गई है वह उनकी प्रतिभा को निखारने, क्षमताओं को बढ़ाने और कमियों को सुधारने वाली लग रही है। नई शिक्षा नीति में 3 वर्ष से 18 वर्ष के बच्चों के समग्र विकास को ध्यान में रखकर बनाई गई है। इस नीति का लक्ष्य ही भारत को वैश्विक ज्ञान महाशक्ति बनाना है और एक बेहतर शिक्षा पद्धति के बिना कोई भी देश बौद्धिक और आर्थिक दृष्टि से समृद्ध नहीं हो सकता है।





शिक्षा नीति में ऐसे बदलाव किए गए हैं जो आधुनिक भारत को आत्मनिर्भर बनाने के लिए भावी नागरिकों को उनकी प्रतिभा-क्षमता के अनुसार तैयार करती है। आइए कुछ बड़े बदलावों की चर्चा करते हैं। मित्रों, अभी तक कई शिक्षा नीतियां आई, बनी और चली भी। डॉक्टर और इंजीनियर बड़े पैमाने पर इस देश में बनते रहे। पहली बार देश में ऐसी नई शिक्षा नीति आई है जो डॉक्टर व इंजीनियर बनाने के साथ-साथ बेहतर इंसान बनाने का खाका खींचती है। नीति एक ऐसे मनुष्य के निर्माण की बात करती है जो स्वावलंबी, स्वाभिमानी और शक्तिशाली भारत का न केवल सपना देखता है बल्कि उसे साकार करके दिखाता है। इस नीति में एक बड़ा बदलाव देखने को मिला है कि अब आरटीई के दायरे को बढ़ाया गया है। अब इसके दायरे में स्कूली शिक्षा के लायक शत प्रतिशत बच्चों को अर्थात 3 से 18 वर्ष तक के छात्रों को शामिल किया गया है, जो भारत जैसे विशाल देश में एक क्रांतिकारी कदम माना जा रहा है। अभी तक स्कूलों में मध्यान्ह भोजन का प्रावधान है। अब भोजन के साथ साथ पौष्टिक नाश्ता भी विद्यार्थियों को उपलब्ध कराया जाएगा। वास्तव में इस नीति मे करोड़ों बच्चों के भूख की चिंता की गई है। बड़ा महत्वकांक्षी लक्ष्य नई शिक्षा नीति में तय किया गया है अब अगले 10 वर्षों में हायरसेकंडरी स्तर तक 100त्न बच्चों का ठहराव सुनिश्चित किया जाएगा। अब कोई भी छात्र किसी भी परिस्थिति में शाला त्याग नहीं करेगा। ड्रॉपआउट रेट शून्य करने की योजना पर शिक्षा नीति में विशेष प्रावधान किया जाएगा। नई शिक्षा नीति में जो प्रावधान किए गए हैं उसमें अब 3 साल से ही बच्चे को औपचारिक शिक्षा का हिस्सा मान लिया गया है। विज्ञान भी मानता है कि 8 वर्ष तक बच्चे के मस्तिष्क का लगभग पूर्ण विकास हो जाता है। इसलिए नई शिक्षा नीति में पहले 5 वर्ष में बच्चों की मजबूत नींव तैयार करने के लिए बाल्यावस्था देखभाल और शिक्षा ( ईसीसीई) नामक नया पाठ्यक्रम तैयार किया जा रहा है, जिसमें बच्चे खेल-खेल में अन्य गतिविधियों के माध्यम से सीखेंगे। पहले इसी आयु के बच्चों को बस्ते के भारी बोझ से पीठ और कमर में दर्द की शिकायत होती थी लेकिन अब बस्ते का बोझ हल्का किया जा रहा है।

नई शिक्षा नीति के अंतर्गत स्कूल कॉम्प्लेक्स बनेंगे। आजकल यह ध्यान में आ रहा है स्कूल छात्र संख्या के मान से बहुत छोटे हो रहे हैं। ऐसी स्थिति में हर स्कूल के लिए संगीत, शारीरिक आदि के शिक्षक देना संभव नहीं होता है इसलिए इस नीति में यह व्यवस्था की गई है अब सेकेंडरी स्कूल के साथ छोटे-छोटे स्कूलों का पूल बना कर सुविधाएं मुहैया कराई जाएंगी ताकि हर स्कूल को मदद मिल सकेगी। इससे संसाधनों और शिक्षकों का बेहतर उपयोग सुनिश्चित हो सकेगा।

अब संविदा शिक्षक, शिक्षाकर्मी, शिक्षामित्र जैसे पैरा शिक्षक की भर्ती नहीं होगी। पूर्ण व नियमित शिक्षकों की भर्ती का प्रावधान नीति नियामकों की दूरदर्शिता और संवेदनशीलता को दिखाता है। शिक्षा नीति में एक बहुप्रतीक्षित बदलाव देखने को मिला है पांचवी कक्षा तक की पढ़ाई मातृभाषा या स्थानीय भाषा अथवा राष्ट्रभाषा में ही होगी। अब आप पांचवी कक्षा तक अपने बच्चों को मराठी, गुजराती , संस्कृत और तमिल आदि भाषाओं में पढ़ा सकेंगे। अब प्राथमिक स्तर तक की पढ़ाई में अंग्रेजी की अनिवार्यता नहीं होगी। स्कूलों का अंग्रेजीकरण का दौर अब समाप्त होगा। अब इंग्लिश मीडियम स्कूल चलाने वालों की ठेकेदारी को शक्ति के साथ खत्म किया जाएगा। मिसाइल मैन एपीजे अब्दुल कलाम, गॉड पार्टिकल की खोज करने वाले सत्येंद्र नाथ बोस और भारत की कंप्यूटर क्रांति के जनक नारायण मूर्ति इन तीनों महापुरुषों की प्रारंभिक शिक्षा अपनी मातृभाषा में हुई है न कि इंग्लिश में। जर्मनी, जापान और कोरिया जैसे देश इंजीनियरिंग टेक्नोलॉजी में दुनिया के अग्रणी देशों में शामिल हैं। इन देशों के छात्र अपनी पढ़ाई मातृभाषा में करते हैं इसीलिए जर्मनी जर्मन में पढ़कर कार का इंजन बना लेता है, जापान बुलेट ट्रेन और कोरिया सैमसंग के मोबाइल और बाकी सब चीन बना लेता है और हम ट्विंकल ट्विंकल में ही उलझे रहते हैं। हमारे माता-पिता खुश होते रहते हैं अब हमारा बेटा आइंस्टीन जरूर बनेगा। अब सरकार ने एक रास्ता खोल दिया है कि जिन परिवारों में अंग्रेजी का माहौल नहीं है उन परिवारों के बच्चे अब स्पर्धा में टिके रहेंगे।

कॉलेज के विद्यार्थियों के लिए नई शिक्षा नीति में अब किसी भी विद्यालय में प्रवेश आसान हो जाएगा इसके लिए कॉमन एप्टिट्यूट टेस्ट की व्यवस्था की गई है यानी आपके नंबर 12वीं कक्षा में इतने नहीं हैं कि आप किसी भी कॉलेज में प्रवेश ले सके तो आप कैट दे सकेंगे और 12वीं के नंबर को जोड़ कर आपको आसानी से प्रवेश मिल सकेगा। कॉलेज का डिग्री कोर्स नई शिक्षा नीति में अब 3 और 4 वर्षों का होगा अब आप यदि कॉलेज में पढ़ाई नहीं करते हैं और कॉलेज बीच में छोड़ देते हैं तो आपकी पढ़ाई बेकार नहीं जाएगी। एक वर्षीय पढ़ाई करने पर आपको सर्टिफिकेट, 2 वर्ष में डिप्लोमा और 3 वर्ष में डिग्री मिलेगी, जो आपके एकेडमिक बैंक ऑफ क्रेडिट में जमा होगा। आज देश मैं एकल विषयक पाठ्यक्रम वाले विश्वविद्यालय खड़े हो रहे हैं। किसी के पास पैसा आ गया वह डेंटल कॉलेज, मेडिकल कॉलेज, इंजीनियरिंग कॉलेज और मैनेजमेंट चारों को मिलाकर निजी विश्वविद्यालय खड़ा कर लेता है। नई शिक्षा नीति कहती है अब सिंगल नहीं बहु विषयक पाठ्यक्रम वाले विश्वविद्यालय बनेंगे। नई शिक्षा नीति में लिबरल एजुकेशन का कांसेप्ट रहेगा। जो बच्चे आईआईटी में पढ़ रहे हैं उन्हें भी समाजशास्त्र और इतिहास पढ़ाया जाएगा, ऐसा दुनिया में हर जगह होता है। परंतु अपने यहां बड़ी विचित्र बात है कि इंजीनियर इंजीनियरिंग के सिवा कुछ नहीं पढ़ता लेकिन अब ऐसा नहीं होगा। यूजीसी को लेकर भी बड़ा बदलाव किया गया है अभी तक यूजीसी ग्रांट जारी करता है वही आपकी एकेडमिक गतिविधियों को भी देखता है। यूजीसी ही क्वालिटी भी सेट करता है वहीं पाठ्यक्रम क्या होगा इसका निर्धारण भी करता है। अब यह सभी काम अलग-अलग संस्थाओं को दिए जाने की बात शिक्षा नीति में कहीं गई है। राष्ट्रीय शिक्षा आयोग का गठन भी प्रस्तावित किया गया है इसमें देश भर के शिक्षाविदों को शामिल करने की योजना है।

सेकुलर जमातों को यह सुनकर भारी सदमा लगा है कि संस्कृत पढऩे की इच्छा रखने वाले विद्यार्थी अब किसी भी स्तर पर किसी भी कक्षा में और किसी भी कोर्स में देववाणी को पढ़ सकेंगे, सीख सकेंगे। इंजीनियरिंग और कॉमर्स के छात्र भी संस्कृत सीखेंगे। आजादी के बाद से आज तक वेद वाणी को कर्मकांड की भाषा मानकर उसकी गहरी उपेक्षा हुई है। देश की युवा पीढ़ी वेद-पुराणों को पढ़ सकेगी, संस्कृत के माध्यम से वह अपनी विरासत से जुड़ सकेगी। वह जान सकेगी कि इन बेदम वामपंथियों ने देश के साथ कितना झूठ बोला है। पीढिय़ों के साथ कितना प्रपंच किया है। इस शिक्षा नीति में इनके पक्के इलाज की व्यवस्था की गई है। पाठ्यक्रम को कम किया जा रहा है केवल कोर कॉन्सेप्ट ही पढ़ाया जाएगा। मुझे आज तक समझ में नहीं आया की 11वीं में जो समाकलन पढ़ाया गया था वह आज तक जीवन में कहां काम आया है और किसके काम आया है। शिक्षा नीति में जो सबसे क्रांतिकारी कदम उठाया गया है अब छठी कक्षा से छात्रों को व्यावसायिक प्रशिक्षण दिया जाएगा। वह अपने रुचि वाले विषय की व्यावहारिक ज्ञान स्कूल समय में ले सकेंगे। उन्हें इंटर्नशिप करने का मौका दिया जाएगा। बच्चे अब पेंटिंग, म्यूजिक, कारपेंटर, इलेक्ट्रीशियन और कारीगर का काम सीख सकेंगे। इस घोषणा से जेएनयू के बुजुर्ग विद्यार्थियों के पेट में दर्द शुरू हो गया है। जेएनयू छात्र संघ की अध्यक्षा आईसी घोष कह रही है कि मोदी सरकार बच्चों से बाल मजदूरी करवाने जा रही है। अरे जनता के टैक्स पर 40 साल तक पढ़ाई करने वाले पुरानी पीढ़ी के छात्र नेताओं को क्या पता है की कितने प्रतिशत बच्चे 12वीं के बाद अपनी पढ़ाई जारी रख पाते हैं। यह हाथ की कारीगरी ही रोटी का इंतजाम करती है। यह वही आईसी घोष हैं जिन पर जेएनयू में गुंडागर्दी करने के आरोप लगे है। दरअसल बेशर्म वामपंथियों के उबलने का एक कारण और भी है उन्हें अपना एजेंडा थोपने का रास्ता नहीं दिख रहा है। अब तक देश की शिक्षा नीति को दीमक की तरह चाटने वाले लाल गुलामों की इरादों पर सरकार ने पानी फेर दिया है। इससे इनकी जहरीली विचारधारा दम तोडऩे लगी है इतिहास जैसे विषय में अपनी विचारधारा घोलकर पाठ्यक्रम में शामिल करवाने के उनके मंसूबे पूरे नहीं हो पा रहे हैं। इन्होंने देश के इतिहास के नाम पर झूठ का पुलिंदा पेश कर पीढिय़ों को गुमराह किया है। भारत के इतिहास को अपनी जागीर समझ कर इसमें से भारतीय संस्कृति के कई सच गायब कर दिए हैं। इन मक्कारो ने तो यह भी साबित करने की कोशिश की है कि भगवान राम अयोध्या में पैदा ही नहीं हुए। वामपंथियों की सोच में भारतीय संस्कृति और हिंदू धर्म के प्रति बेहद नफरत भरी हुई है। इस नफरत को फैलाने का जरिया इन्होंने हमेशा स्कूली बच्चों को बनाया। मैकाले के मानस पुत्रों और उनके दुमछल्लों ने आजादी के बाद से शिक्षा के माध्यम से संस्कार शून्य, राष्ट्र की जड़ों से सर्वथा कटी हुई पीढ़ी को जन्म दिया है। इसी का परिणाम जामिया इस्लामिया से लेकर जेएनयू में भारत की बर्बादी तक जंग लडऩे की मानसिकता वाले गद्दार पैदा हुए हैं।

विश्वास करो, भारत माता अब जाग चुकी है। स्वर्णिम भारत के पुनर्निर्माण का संकल्प अब पूरा होने ही वाला है। आत्मग्लानि से आत्म गौरव की ओर बढ़ चले भारत के बीच में फासला कुछ कदमों का ही शेष है। समवेत उठे हुए कदम ही मंजिल तक पहुंचते हैं। नई शिक्षा नीति भारत के स्वर्णिम भविष्य के संकल्प को पूरा करने में मील का पत्थर बनेगी। सच्ची-अच्छी शिक्षा के विषय में कवि कि यह पंक्तियां बड़ी समीचीन लगती हैं-

निर्माणों के पावन युग में,

हम चरित्र निर्माण ना भूले।

स्वार्थ साधना की आंधी में,

बसुधा का कल्याण न भूले।

(लेखक विद्या भारती मध्य भारत के प्रांत अध्यक्ष हैं)

Updated : 9 Aug 2020 9:45 AM GMT
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स्वदेश वेब डेस्क

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