शिकार रोकने में फेल वन विभाग, अब गांवों में ‘सामाजिक सजा’ का प्रयोग

शिकार रोकने में फेल वन विभाग, अब गांवों में ‘सामाजिक सजा’ का प्रयोग
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कानून छोड़ सामाजिक बहिष्कार की राह पर वाइल्ड लाइफ कंजर्वेशन

दिनेश यदु

राज्य में वन्यजीवों के शिकार पर प्रभावी रोक लगाने में नाकाम रहा वन विभाग अब एक नए, लेकिन बेहद विवादित रास्ते पर चलता दिख रहा है। वाइल्ड लाइफ कंजर्वेशन के नाम पर विभाग अब कानून, अदालत और न्यायिक प्रक्रिया को दरकिनार कर ग्रामीणों के जरिए कथित शिकारियों का सामाजिक बहिष्कार कराने की योजना पर काम कर रहा है। यह फैसला जहां एक ओर विभाग की विफलता को उजागर करता है, वहीं दूसरी ओर गांवों में तनाव, टकराव और अराजकता बढ़ने की आशंका भी पैदा कर रहा है।

12 दिसंबर 2024 की बैठक ने खोली पोल

इस पूरी रणनीति की पुष्टि 12 दिसंबर 2024 को हुई एक आंतरिक समीक्षा बैठक से होती है। बैठक में 15 भारतीय वन सेवा (IFS) और 4 राज्य वन सेवा के वरिष्ठ अधिकारी शामिल थे। चर्चा के दौरान यह स्वीकार किया गया कि राज्य बनने के बाद अब तक हजारों की संख्या में विलुप्त, संरक्षित और अन्य प्रजातियों के वन्यजीवों का शिकार हुआ, लेकिन एक भी मामले में शिकारी को अदालत से सजा नहीं दिलाई जा सकी।

सजा किसी को नहीं, गलती सिस्टम की

बैठक में माना गया कि कई मामलों में आरोपी रंगे हाथों पकड़े गए, हथियार और फंदे भी जब्त हुए, लेकिन विभागीय विवेचना कमजोर रही। पीओआर (प्रारंभिक अपराध रिपोर्ट) ढंग से नहीं बनी, और अदालत में तथ्यों को मजबूती से पेश नहीं किया जा सका। नतीजा, अपराधी बचते चले गए और शिकार का सिलसिला जारी रहा।

कवर्धा और उदंती-सीतानदी बनेंगे प्रयोग क्षेत्र

नई रणनीति को सबसे पहले कवर्धा वनमंडल और उदंती-सीतानदी टाइगर रिजर्व में लागू करने की तैयारी है। इसके तहत सभी वन अधिकारियों को अपने-अपने क्षेत्र में शिकार से जुड़े अपराधियों और संदिग्धों की सूची तैयार करने के निर्देश दिए गए हैं.समीक्षा बैठक के फैसले के मुताबिक अब शिकारियों को कोर्ट में सजा दिलाने के बजाय उनके गांवों में सामाजिक दबाव बनाया जाएगा। इसके लिए सरपंच, गांव के मुखिया, धर्मगुरु और प्रभावशाली लोगों की बैठकें कराई जाएंगी। गांवों में कैंप लगाकर शिकार की घटनाओं की तस्वीरें दिखाई जाएंगी और ग्रामीणों से कथित अपराधी का सामाजिक बहिष्कार करने की अपील की जाएगी।

टोनही प्रताड़ना जैसी सामाजिक सजा

विशेषज्ञों का मानना है कि यह व्यवस्था टोनही प्रताड़ना से अलग नहीं है। पहले गांवों में रसूखदार लोग किसी महिला या परिवार को टोनही बताकर सामाजिक रूप से बहिष्कृत कर देते थे। अब उसी तर्ज पर शिकारी बताए गए व्यक्ति के साथ-साथ उसके पूरे परिवार को सामाजिक, आर्थिक और शैक्षणिक रूप से अलग-थलग करने का खतरा है।

गांवों में तनाव और झूठे मामलों का खतरा

जानकारों का कहना है कि इस तरह की व्यवस्था से गांवों में आपसी दुश्मनी और तनाव बढ़ना तय है। व्यक्तिगत रंजिश के चलते लोग एक-दूसरे को फंसाने के लिए झूठे शिकार के आरोप लगा सकते हैं। इससे कानून-व्यवस्था बिगड़ने और निर्दोष परिवारों के उत्पीड़न की आशंका भी बनी हुई है।

विशेषज्ञों की दो टूक चेतावनी

अंध श्रद्धा निर्मूलन समिति के अध्यक्ष डॉ. दिनेश मिश्रा ने इस फैसले को पूरी तरह गलत बताया है। उनका कहना है कि सामाजिक बहिष्कार मानसिक और सामाजिक हिंसा का एक रूप है। इससे केवल आरोपी नहीं, बल्कि पूरा परिवार टूट जाता है। कानून की जगह समाज को सजा देने का अधिकार देना बेहद खतरनाक परंपरा की शुरुआत हो सकती है।

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