कथित प्रगतिशील साहित्य क्यों अभी तक बाबर का गुलाम?

भोपाल में आयोजित हुए साहित्य उत्सव में बाबर को लेकर हो रहा सत्र हालांकि निरस्त हो गया है, परंतु अपने आप में यह प्रकरण बहुत घातक रहा है। यह इसलिए घातक है क्योंकि उसमें बाबर जैसे लुटेरे का महिमामंडन किया जाता। बाबर जैसा आदमी जो केवल एक कबीलाई आदमी था, जिसका महिमामंडन अकादमिक रूप से तो न जाने कब से किया जा रहा है, परंतु जनमानस में उसकी पहचान एक कबीलाई लुटेरे की ही रही थी, उसे साहित्य के उत्सव में नायक के रूप में स्थापित करने का क्या औचित्य रहा होगा?
यह आयोजकों की मंशा पर तो प्रश्न उठाता ही है, परंतु यह इस बात को लेकर और भी प्रश्न उठाता है कि जो सरकारी संस्थाएं ऐसे आयोजनों के साथ जुड़ती हैं, तो क्या वे विषयों को न ही पढ़ती हैं और न ही देखती हैं और भारत को अपमानित करने वाले विमर्श के साथ जुड़ जाती हैं? यह संस्थाओं की विफलता है या फिर अधिकारियों की या फिर उस अकादमिक विमर्श की, जो बरसों से शैक्षणिक पाठ्यक्रम के माध्यम से हमारे लोगों के मस्तिष्क में बोया जाता रहा है। यह एक शोध का विषय हो सकता है कि आखिर ऐसे आयोजनों के विषयों की जांच क्यों नहीं होती है? क्यों सरकारी संस्थाएं देश को अपमानित करने वाले विमर्श का हिस्सा सहर्ष बन जाती हैं?
कौन हैं वे अधिकारी, जो इन सबकी अनुमति देते हैं? स्वदेश ने इस मामले को उठाया और इसकी परतों को उधेड़ा। जब हंगामा हुआ तो वह सत्र निरस्त हुआ। परंतु और भी जो सत्र थे, उनसे क्या सार्थक निकलकर आया। इसमें आदि गुरु शंकराचार्य जी के स्तोत्र के मंचन के कार्यक्रम को “दास्तान ए शंकर” का नाम दिया गया था। आखिर ऐसे नाम कौन और क्यों रखता है? उर्दू के साथ आदि गुरु शंकराचार्य को जोड़ने का औचित्य क्या है? क्या आदि गुरु शंकराचार्य के कार्यक्रम को संस्कृत नाम नहीं दिए जा सकते थे?
साहित्य के नाम पर या अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के नाम पर तमाम बातों को स्वीकार कर लिया जाता है, परंतु जो ऐतिहासिक और धार्मिक चरित्र हैं, उनके साथ ऐसा प्रयोग करने से बचना चाहिए, क्योंकि फिर इतिहास ही अलग रंग ले लेता है, पहचान अलग रंग ले लेती है। साहित्य में कथा को हटाकर दास्तानगोई जैसे शब्दों का प्रयोग आम हो गया है, परंतु यदि चरित्र हिन्दू है, उसका मूल संस्कृतनिष्ठ है तो फारसी शब्दों के माध्यम से परिचय क्यों करवाना चाहिए? साहित्य का उत्सव कराने वाले लोग जब बाबर के माध्यम से भारत की खोज करवा सकते हैं तो जाहिर है कि आदि गुरु शंकराचार्य के प्रति भी वे किस मानसिकता के रहे होंगे यह सहज समझा जा सकता है? दास्तान ए शंकर, शब्द पर आपत्ति होनी ही चाहिए।
इसके साथ ही यह एक निजी आयोजन था, तो निजी आयोजन पर सरकारी संस्थाओं की मेहरबानी भी प्रश्न उठती है, वह भी तब जब भारत को अपमानित करने वाले विषय हिस्सा हों। जब किसी निजी आयोजन में सरकारी संस्थाएं जुड़ जाती हैं तो ऐसा प्रतीत होने लगता है कि उस आयोजन में जो भी विमर्श हो रहा है, उसे सरकारी मान्यता प्राप्त है, जबकि कई बार ऐसा होता नहीं है। इसलिए आवश्यक है कि किसी भी कथित साहित्य उत्सव में विषयों की जांच हो और उसके बाद ही आयोजन हो, क्योंकि यह अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का नहीं अपितु देश की अस्मिता और इतिहास का विषय है।
लेखिका- सोनाली मिश्रा
