स्वामी विवेकानंद की भविष्यवाणी और 2047 के विकसित भारत का संकल्प

युवा दिवस पर विशेष
स्वामी विवेकानन्द यह नाम सुनकर ही मन राष्ट्रभक्ति और हिन्दुत्व से औतप्रोत हो जाता है । वे संत थे लैकिन 'राष्ट्रसंत' । वे पूजा करते थे, किन्तु भारत माता ही उनकी आराध्य थी । 1893 के उनके शिकागो भाषण ने विश्व की भारत के प्रति देखने की दृष्टि बदल दी । 1897 में उन्होंने देशवासियों से आव्हान किया कि "अगले पचास बरस तक भूल जाओ कि तुम्हारा कोई देवी-देवता है ! एकमात्र अगर कोई आराध्य है तो वह है अपनी भारत माता" ! कैसा संयोग था कि ठीक पचास वर्ष बाद भारत गोरे अंग्रेजों के चंगुल से मुक्त हुआ ।
एक योद्धा सन्यासी के रूप में उन्होंने परिव्राजक बन परतंत्रता के काल में भारत की सुप्त तरुणाई को जगाया । "गर्व से कहो हम हिंदू है" यह उदघोष हिन्दू संगठनों ने नहीं गढा, यह स्वामी विवेकानन्द का दिया गया नारा है । वे जिए तो चालीस वर्ष भी नहीं लैकिन हजार वर्ष की परतंत्रता झेल रहे भारत में स्वतंत्रता की तडफ़ पैदा कर गये वे भारत के पहले हिंदू सन्यासी थे, जिन्होंने हिंदू धर्म और सनातन धर्म का संदेश विश्व भर में फैलाया। उन्होंने विश्व में सनातन मूल्यों, हिन्दू धर्म और भारतीय संस्कृति की सर्वाेच्चता स्थापित की।
स्वामी विवेकानंद का जीवन दर्शन आध्यात्मिकता, मानवता और राष्ट्रवाद की त्रिवेणी है, जो वेदांत और योग के सिद्धांतों पर आधारित है । उनका मानना था कि 'दरिद्र नारायण की सेवा' ही ईश्वर सेवा है और शिक्षा का उद्देश्य चरित्र निर्माण व आत्म-ज्ञान है, जिसके लिए युवाओं को शारीरिक व मानसिक रूप से सशक्त बनाना आवश्यक है, ताकि वे भारत को विश्वगुरु बना सकें। उन्होंने रामकृष्ण मिशन की स्थापना कर, वेदांत और योग का वैश्विक प्रचार किया, और अपने विचारों से युवाओं को सशक्त बनाकर, भारत को विश्व गुरु बनाने का स्वप्न जगाया, जिसका सार था "उठो, जागो और तब तक मत रुको जब तक लक्ष्य न प्राप्त हो जाए" । वे देश की आर्थिक, सामाजिक, आध्यात्मिक स्थिति को सुधारने व सुदृढ़ करने हेतु तथा वैश्विक ज्ञान के साथ भारत के पारम्परिक ज्ञान को युगानुकूल बनाने का माध्यम शिक्षा ही मानते थे ।
वे कहते थे "शिक्षा वह है जो मनुष्य को दैनन्दिन समस्याओं में से रास्ता दिखा दे, किन्तु वर्तमान शिक्षा तो उन समस्याओं को ओर अधिक बढ़ाने वाली है । वे शिक्षा के भारतीयकरण के प्रबल पक्षधर थे । उन्होंने अनेक बार कहा कि "शिक्षा वह है जो मनुष्य को चरित्रवान, परोपकारी और साहसी बनाती हो" उनके शब्दों में शिक्षा मनुष्य को जीवन में संघर्ष के लिए तैयार करने में मदद करती है। शिक्षा चरित्रवान, परोपकार और साहसी बनाती है।
नरेन्द्र की उस बात को दूसरे नरेन्द्र ने गहनता से समझा और प्रधानमन्त्री बनने के बाद श्री नरेन्द्र मोदी जी के नेतृत्व में राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020 तैयार की गई है, जो स्वामी विवेकानन्द के भारत की ज्ञान परम्परा, नैतिक मूल्य, वैज्ञानिक दृष्टिकोण और मातृभाषा में शिक्षा के साथ व्यावसायिक शिक्षा को बढ़ावा देने वाली है । 2030 तक सम्पूर्ण शिक्षा पद्धति लागू होने के बाद इसके सकारात्मक परिवर्तन आयेंगे और 2047 के विकसित भारत के संकल्प में NEP2020 का विशेष योगदान रहेगा । स्वामी विवेकानन्द भविष्यदृष्टा भी थे । उन्होंने 1897 में कहा था भारत अगले 50 वर्षों में स्वाधीन हो जाएगा । उस समय की परिस्थिति के अनुसार लोगों ने स्वामी जी की बात पर ध्यान नहीं दिया । क्योंकि यह असम्भव लग रहा था । किन्तु बंग भंग आन्दोलन के बाद देश में ऐसी अकल्पनीय परिस्थितियों का निर्माण हुआ कि ठीक 50 वर्ष बाद 1947 में भारत स्वतन्त्र हो गया ।
स्वामी विवेकानन्द जी की प्रसिद्ध भविष्यवाणियों में एक बेलूर मठ में की गई भविष्यवाणी हैं । अपने शिष्यों को भारत के भविष्य का दर्शन कराते हुए उन्होंने कहा था "भारत विश्वगुरु बनेगा, पर यह केवल शक्ति से नहीं, बल्कि अपने उच्च आध्यात्मिक मूल्यों, समन्वय और सेवाभाव से होगा, जहाँ कोई अशिक्षित या भूखा नहीं होगा, और भारत 21वीं सदी में भौतिक व आध्यात्मिक रूप से महान बनेगा, पश्चिमी देश भौतिकवाद से हटकर आध्यात्म की ओर देखेंगे। उन्होंने कहा था भारत एक बार फिर समृद्धि तथा शक्ति की महान ऊँचाईयों पर उठेगा और अपने समस्त प्राचीन गौरव को पीछे छोड़ जाएगा। स्वामी जी ने कहा था कि भारत का विश्व गुरु बनना केवल भारत ही नहीं, अपितु विश्व के हित में हैं ।
स्वामी जी की भविष्यवाणी पर अगर हम विचार करें तो आज भारत आर्थिक, सामरिक, वैज्ञानिक, आध्यात्मिक सभी दृष्टि से परिपूर्ण हो रहा है । देश के यशस्वी प्रधानमंत्री श्री नरेन्द्र मोदी जी की 2047 में विकसित भारत की संकल्पना निश्चित ही साकार रूप लेगी । आज जिस तरह से विश्व में उहापोह मची है, किसी भी देश में विश्व का नेतृत्व करने की क्षमता नहीं हैं । सभी कथित शक्तिशाली देश एक-दूसरे के संसाधनों पर कब्जा जमाना चाहते हैं । ऐसे में भारत अपनी युवा शक्ति, स्वावलम्बन और सम्पन्नता और आध्यात्मिकता के आधार पर विश्व का मार्गदर्शन करने की ओर अग्रसर हो रहा है । स्वामी जी ने कहा था "तुम मुझे 100 ऊर्जावान युवा दो, मैं पूरे विश्व को बदल दूँगा" । इस कथन का अर्थ है कि यदि उन्हें ऐसे युवा मिल जाएँ जिनमें आत्मविश्वास, दृढ़ इच्छाशक्ति और देश-प्रेम की भावना हो, तो वे भारत को विश्व में एक अग्रणी राष्ट्र बना सकते हैं, क्योंकि युवा ही देश के भविष्य और परिवर्तन के अग्रदूत होते हैं ।
आज राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ सहित अनेक समविचारी संगठनों में ऐसे हजारों युवा काम कर रहे हैं जो अपना सर्वस्व त्यागकर अहर्निश राष्ट्रकार्य में जुटे हैं । आज का उभरता भारत हमें स्वामी जी के कथन और उनकी भविष्यवाणियाँ को साकार रूप देने के लिए आश्वस्त करता है । इसके लिए हम सभी भारतवासियों को पूरी शक्ति के साथ अपने-अपने ज्ञान कौशल के आधार पर जुटना होगा । भारत को हर क्षेत्र में उत्कृष्ट बनाने हेतु प्रत्येक नागरिक का योगदान चाहिए । आइये ! स्वामी विवेकानन्द के सपनों का भारत बनाने हेतु हम नरेन्द्र मोदी जी के 2047 के विकसित भारत के संकल्प में अपना योगदान सुनिश्चित करें ।
(लेखक मोहन नागर मध्यप्रदेश जन अभियान परिषद के उपाध्यक्ष है)
