संत रविदास जयंती विशेष: मन के परिवर्तन से ही होगा समरसता का काम

सामाजिक समरसता भारतवर्ष में सभी युग से
प्राचीन कालखंड से ऋषि मुनियों, साधु संत द्वारा चली आ रही है। जहां समाज में अस्पृश्यता का भेद होता है, वही समाज में समरसता की आवश्यकता होती है। समरसता व्यक्ति के जीवन, आचरण, संवेदना से ही प्रकट होती है, यह कोई जबरदस्ती समरसता करने का कार्य नहीं है। आज देखने में आता है कि समाज की विभिन्न जाति बिरादरियों में ऊंचनीच, छुआछूत की होड़ चल रही है, जबकि ईश्वर ने तो केवल मनुष्य रूपी मानव को इस पृथ्वी पर एक समान भेजा है। आज हमारे हिंदू समाज में कार्य पद्धति के आधार पर जाति बिरादरियों को वर्ण व्यवस्था में देखा जाता है, उसी व्यवस्था के आधार पर मनुष्य की दिनचर्या लागू होती है। जैसे एक व्यक्ति सुबह उठकर नित्य क्रिया शौच के लिए जाता है, फिर अपने दरवाजे की साफ सफाई करता है, तो वह न स्पर्श समझे जाने वाले सफाई कार्य वाली जाति का व्यक्ति बन जाता है। स्नान करके पूजा पाठ करता है तो वह ब्राह्मण, पहलवानी करता है तो क्षत्रिय बलशाली समाज, कपड़ों की धुलाई करता है तो रजक, जूते की पोलिस करके पहनता है तो रविदास समाज का बन जाता है। वही अपनी सेविंग, दाढ़ी मूछ बनता है तो सेन सविता बन जाता है और जब कोई व्यक्ति गाय भैंस पशु का पालन करता है तो ग्वाला बन जाता है। जब व्यापार करता है तो बनिया बन जाता है। इस प्रकार से मनुष्य की संरचना में सभी जाति बिरादरी का मिश्रण है। जब समाज को कार्य के आधार पर जाती बिरादरियों के नजरिए से देखा जाता है तो इन कार्यों को तो संपूर्ण जीवित मानव समाज अपने जीवन के नित्य कर्म में करता है, फिर क्यों? हम सामाजिक भेदभाव, छुआछूत, अस्पृश्यता का कृत करते हैं। इस प्रकार की कुंठित विचारधारा से ही समाज में जातिवादी व्यवस्थाएं, अस्पृश्यता जन्म लेती है। जबकि भगवान श्रीराम ने माता शबरी के झूठे बेर खाए, निषाद राज को गले लगाया। हम ऋषियों की बात करेंगे तो भगवान महर्षि वाल्मीकि जी ने माता सीता व लवकुश को भी अपने आश्रम में आश्रय दिया। ठीक इसी प्रकार संत गुरु रविदास जी महाराज की महिमा शक्ति को देखकर क्षत्रिय वंश की चतरानी मीरा देवी ने भी अपने गुरु के रूप में संत रविदास जी का शिष्य बनना स्वीकार किया। बाबा साहब ने भी सभी जाति बिरादरी व जनमानस के कल्याण के लिए संवैधानिक अधिकार और सुरक्षा को इस संविधान में दिया है। उनके मन में भी किसी जाति बिरादरी के प्रति भेदभाव नहीं रहा।
आज वर्तमान में देखने में आ रहा है कि हमारे हिंदू समाज में जातिवादी भेदभाव, वर्ण व्यवस्था को लेकर विभिन्न बयान तर्क वितर्क चल रहा है। लेकिन वास्तविकता में जो लोग अस्पृश्यता भेदभाव जाति बिरादरी की उच्च नीच की बातें करते हैं, उन सबके लिए मेरा कहना है कि असमानता, अस्पृश्यता तो आज जाति में जाति, अस्पृश्यता में अस्पृश्यता, एक दूसरे से छोटे बड़े की भावना अनुसूचित जाति में ही विराजमान है। आज लगभग 48 से 50 के लगभग जातियां, उपजातियां अनुसूचित जाति की है, क्या वह आपस में अस्पृश्यता नहीं मानती? क्या वह एक दूसरे से रोटी बेटी का व्यवहार करती है नहीं, देखिए समाज में हर प्रकार के लोग हैं, कुछ भाई बंधु अनुसूचित जाति के एक दूसरे के घर सहज भाव से बैठना उठाना भोजन करता है, लेकिन कुछ आज भी अनुसूचित जाति की जाति बिरादरी एक दूसरे के यहां भोजन, बैठाना उठाना नहीं करती। ठीक इसी प्रकार से जिन्हें हम व्यवस्था के अनुसार ऊंची जाति के लोग कहते हैं। आज वह भी हमारे यहां भोजन, बैठना उठाना ग्रहण करते हैं, लेकिन उनमें से कुछ लोग कुंठित मानसिकता के कारण हमसे अस्पृश्यता करते हैं। इसलिए आज भी अस्पृश्यता में अस्पृश्यता है। आज भी देश में पढ़े-लिखे युवा युवती मन प्रेम से शादी विवाह, अंतरजातीय कर रहे हैं इसलिए यह देश सभी का है। सभी प्रेम सद्भाव से अपना जीवन यापन करें और कर रहे हैं। इसीलिए सामाजिक समरसता सद्भाव की आवश्यकता है। रहा सवाल अंतरजातीय विवाह का तो यह भी वर्षों से अंतरजातीय विवाह लोगों में होता आ रहा है। जब दो लोगों का मन मिल जाता है तो वह जाति बिरादरी नहीं देखते और एक दूसरे के साथ शादी कर लेते हैं, लेकिन जबरदस्ती कोई नहीं कर सकता, ना कि किसी के कहने से या बयान देने से। छोटी से छोटी जाति बिरादरी का परिवार अपने समाज को पहली प्राथमिकता देता है। क्या कभी जो चार वर्णों में समाज विभाजित है, वह आपस में शादियां करते हैं नहीं, क्योंकि यह परंपरा संस्कृति और समाज की व्यवस्था है। चंद लोग हैं, जो इन विषयों पर अनर्गल बयान, जातिवादी मानसिकता की बातों के द्वारा समाज को भ्रमित करते हैं। आज वर्तमान में सभी जाति बिरादरी को सामाजिक सौहार्द, सद्भाव और समरसता के साथ रहने की आवश्यकता है।
ऐसा चाहूं राज मैं, जहां मिले सबन को अन्न।
छोट-बड़ो सब सम बसै, रविदास रहे प्रसन्न।।
लेखिका डॉ. संगीता कटारे (वाल्मीकि) जीवाजी विश्वविद्यालय में अतिथि सहायक प्राध्यापक एवं राजीव गांधी प्रौद्योगिकी विश्वविद्यालय की कार्यपरिषद सदस्य हैं
