केरल का कुम्भ मेला (माघ महोत्सव): कैसे रहा 250 वर्षों तक विमर्श से दूर?

केरल का कुम्भ मेला (माघ महोत्सव): कैसे रहा 250 वर्षों तक विमर्श से दूर?
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सोनाली मिश्रा

जब भी हम कुम्भ की बात करते हैं तो नाशिक, प्रयागराज, हरिद्वार, और उज्जैन का नाम ही आता है। परंतु इस वर्ष पूरे 250 वर्षों के उपरांत केरल में भी माघ मेला लगा, जिसे केरल का कुम्भ कहा जाता है। केरल में भी रात के अंधेरे में दीपों का प्रकाश जगमगाया, वैदिक मंत्रों का जाप हुआ और संतों का विशाल जमावड़ा दिखाई दिया। केरल में यह सब माघ महोत्सव के कारण हुआ। केरल में भी माघ महोत्सव होता है, इसकी चर्चा बहुत कम या नगण्य ही होती है। परंतु भगवान परशुराम द्वारा बसाए गए केरल में ऐसे महोत्सवों का न होना चर्चा का विषय होना चाहिए था। यह आयोजन इसलिए चर्चा से बाहर रहा क्योंकि इसे 250 वर्षों से मनाया ही नहीं गया था।

इस माघ मेले का आयोजन भरतपुझा नदी के किनारे हुआ था, जिसे लोग दक्षिण गंगा भी कहते हैं और इस नदी का नाम नीला भी है। उस दृष्य की कल्पना ही आह्लादित कर जाती है कि प्रयागराज से लेकर केरल और बंगाल तक माघ मेला अपनी धूम पर है। नदियों के तट पर आरतियों के स्वर गूंज रहे हैं और भारत को एक सूत्र में बांध रहे हैं। 18 जनवरी को केरल के राज्यपाल राजेन्द्र विश्वनाथ आलेंकर ने इस मेले का औपचारिक उद्घाटन किया था। उन्होनें अपने भाषण में इस तथ्य को रेखांकित किया था कि यह आयोजन धर्म की जीवंत परंपरा को पुनर्जीवित कर रहा है और इसे किसी भी धर्म के विरुद्ध नहीं देखा जाना चाहिए।

यह बात पूरी तरह से सत्य है कि केरल में इस वर्ष जो हुआ, वह सैकड़ों वर्षों के बाद हुआ था और यह अपनी परंपरा को जीवित करने के लिए हुआ था। भारत के पर्व और परम्पराएं किसी भी मत के विरुद्ध होते ही नहीं हैं। भरतपुझा नदी के तट पर जो विशाल जनसमूह एकत्र हुआ, जो पावन डुबकी लेने के लिए एकत्र हुआ था, वह अपनी पहचान के कारण एकत्र हुआ था। सोशल मीडिया पर ऐसे सैकड़ों लोगों के अनुभव हैं, जो यह लिख रहे हैं कि केरल में माघ मेले में पवित्र डुबकी लगाना उनके जीवन का एक दिव्य अनुभव था। यह पर्व केरल में न जाने कब से मनाया जा रहा था।

हर 12 वर्षों के अंतराल पर भरतपुझा नदी के तट पर धार्मिक जनसमूह एकत्र होता था। इसमें तमाम अनुष्ठान, नदी में पवित्र डुबकियाँ और धार्मिक संवाद, शास्त्रार्थ होते थे। पूरे भारत से लोग इस आयोजन में सम्मिलित होने के लिए आया करते थे। हाँ, कालांतर में स्थानीय शासकों एवं कालीकट के सामुद्री के मध्य सत्ता संघर्ष ने इसे हिंसक स्वरूप दे दिया था। परंतु इससे उसकी मूल भावना पर प्रश्नचिह्न नहीं लगाया जा सकता है और न ही इसके इतिहास पर।

औपनिवेशिक शासकों की कारस्तानी

अंग्रेजों ने जब मालाबार पर अपना आधिपत्य स्थापित किया, तो उन्होनें मामनकम को रोक दिया। चूंकि इस आयोजन में हिंसा का आरंभ हो गया था, तो उन्हें ऐसा लगा होगा कि यदि इतनी विशाल संख्या में जनसमूह एकत्र होगा तो हो सकता है कि कानून एवं व्यवस्था पर प्रभाव पड़े। और इस प्रकार एक जीवंत परंपरा रुक गई। और 1947 के बाद इसे आरंभ करना भी एक चुनौती रहा।

हालांकि इतने वर्षों के उपरांत जब भरतपुझा नदी के तट पर केरल का माघ मेला लगा तो केरल की दिव्यता एक बार पुन: अपने भव्य रूप में सामने आई! इस मेले ने उत्तर से लेकर दक्षिण तक उस सातत्य को परिलक्षित किया, जिसे तोड़ने के प्रयास औपनिवेशिक एवं वामपंथी ताकतों द्वारा किये गए और अभी तक किये जा रहे हैं। 3 फरवरी को अमृतस्नान के बाद यह माघ मेला सम्पन्न हो जाएगा। इसमें नीला आरती में जब काशी के पंडितों ने भाग लिया तो उत्तर और दक्षिण का भेद करने वालों को भी उत्तर प्राप्त हो गया होगा।


लेखिका - सोनाली मिश्रा

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