उनकी राख से सैकड़ो दीनदयाल पैदा होंगे

उनकी राख से सैकड़ो दीनदयाल पैदा होंगे
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डॉ. हरिशंकर सिंह कंसाना

11 फरवरी 1968 को एक ऐसा दुखद समाचार प्राप्त होता है जिससे लाखों लोगों की आंखें नम हो गईं और हजारों कार्यकर्ताओं के हृदय पर गहरा आघात हुआ। भूल से भी दूसरों के बारे में अहित की बात न सोच पाने वाले राजनीति के अजातशत्रु की इतनी षडयंत्र पूर्वक हत्या हो सकती है यह स्वीकार कर पाना हर किसी के लिए बहुत कठिन था।

वह हत्या साधारण थी या राजनीतिक इसके बारे में न तो कोई निर्णय लिया जा सका न हीं कोई निष्कर्ष प्राप्त हुआ किंतु ऐसे व्यक्ति से झगड़ा या शत्रुता की बात तो सोच से भी परेह है। इतिहास भी साक्षी है कि षडयंत्रों के पीछे कई बार व्यक्तिगत कारण न होकर कोई सामाजिक विद्रूपता और राजनीतिक स्पर्धा आदि कारण भी बन जाते हैं। जिस व्यक्ति के मन में पद सम्मान आदि की बात नगण्य हो और जिसने अपने व्यक्तित्व में नेतापन न लाकर कार्यकर्ता के भाव से इस प्रकार कार्य किया कि उनके सामान ध्येयवादी और भी कार्यकर्ता खड़े हो सकें। जिस व्यक्ति ने चाणक्य के समान या विद्यारण्य के समान अपने राष्ट्र समर्पित चरित्र को राजनीतिक स्पर्धा और ईर्ष्या के दलदल में नहीं मिलने दिया हो। जिसने व्यक्तिगत मोह माया से दूर रहकर शरीर निर्वाह के लिए जितना आवश्यक मात्र हो उतने से संतुष्टि प्राप्त की। जिस व्यक्ति ने व्यक्तिगत और सार्वजनिक जीवन दोनों में परमोच्च जीवनादर्श प्रस्तुत किए हों ऐसे व्यक्ति को खोना बहुत दुखद होता है।

जिस निर्ममता से उस हत्यारे ने लाखों करोड़ों की आंख के तारे को छीन लिया हो उसकी सारी पसलियां चूर-चूर कर डाली हों और हाथ भी मरोड़ दिए उनके शव को मुगलसराय रेलवे यार्ड में मध्य रात्रि में लावारिस फेककर चला गया।ऐसे हत्यारे ने संभवतः बड़ी चैन की सांस ली होगी कि उसने महान आत्मा के जीवन कार्य को समाप्त कर दिया किंतु लाखों हृदयों में उनकी राष्ट्र निष्ठा की ज्वाला अब और तेजी से धधकने लगी है। जब राष्ट्र और समाज के लिए कोई बलिदान होता है तो वह हजारों हजारों को भयमुक्त करके चला जाता है। उनके फटे हुए सिर की एक-एक बूंद से कई कई दीनदयाल पैदा हुए हैं। उनकी तपस्या व्यर्थ नहीं गई बल्कि हजारों हृदय में त्याग और तपस्या की ज्योति उद्दीप्त करके चली गई। अपने कुचले हुए दिमाग के एवज में वे हजारों दिमागों में बुद्धि- प्रतिभा को बिठाकर चले गए। जिसकी लाश मिली वह व्यक्ति लावारिस नहीं था कुछ घंटे बाद ही उसके लाखों लाख वारिसों ने देश भर में रुदन मचा दिया। 11 फरवरी की उस घटना ने सबको दुखी कर दिया था। देश ने एक आदर्श समाज के निर्माणकर्ता और विचारवान नेता को खो दिया था।

देश के सामने जब विचाररिक्तता और दिशाहीनता की स्थिति आई और ऐसा लगा कि 700 वर्षों तक मुगल और 100 वर्षों तक अंग्रेजों की गुलामी के बाद जब 1947 में देश स्वतंत्र हुआ है तो देश को किस दिशा में ले जाया जाए। उनके अविराम जीवन में निरंतर प्रवास और संगठन कार्यों के साथ ही कई पुस्तक जैसे सम्राट चंद्रगुप्त, जगद्गुरु शंकराचार्य, राष्ट्रचिंतन, राष्ट्र जीवन की दिशा, भारतीय अर्थनीति विकास की एक दिशा, द टू प्लानंस, इंटीग्रल ह्यूमैनिज्म, हमारा कश्मीर, पांचजन्य, दैनिक स्वदेश आदि पत्रों का भी संपादन कार्य किया तो इतना कुछ लिख पाना स्वयं में एक अद्भुत आश्चर्य है। 1951 से 67 तक जनसंख्या के आठ अध्यक्ष बदले गए किंतु वे स्वयं महामंत्री के दायित्व में स्थिर रहे तो भारत के बड़े राजनीतिज्ञ यह जान ही गए थे कि जनसंघ के वास्तविक विचार केंद्र पंडित दीनदयाल ही हैं। तेजी से बढ़ते जनसंघ और उसकी उपलब्धियां को देखकर पंडित जी की हत्या राजनीतिक उद्देश्य से की गई हो इससे इनकार नहीं किया जा सकता।

पंडित दीनदयाल मानते थे कि भारत की वर्तमान दुरवस्था का कारण यही है कि राष्ट्र जीवन के ऊपर विदेशी और विजातीय विचारधाराओं एवं जीवन मूल्यों को थोपने का प्रयास किया जा रहा है। इससे अंधानुकरण करने और 'स्व के तिरस्कार' की प्रवृत्ति पैदा हुई है जो कि राष्ट्र मानस को कुंठाग्रस्त करेगी। उन्होंने निरंकुश और अधिनायक वादी प्रवृत्तियों को रोकने तथा लोकतंत्र को स्वच्छंदता में विकृत होने से बचाने के लिए धर्मराज्य की विस्तृत व्याख्या की। राष्ट्र की आत्मचिति के अनुसार राष्ट्र को खड़ा करने की बात कही और भारतीय संस्कृति के शाश्वत, प्रवाहमान, दैवीय एवं समन्वयकारी तत्वों को ही एकात्म मानवदर्शन की संज्ञा थी। उनकी राजनीति मात्र सत्ता की नीति नहीं थी। उन्होंने राष्ट्र नीति के लिए राजनीति में पदार्पण किया। वे देश की सत्ता ऐसे लोगों के हाथ में चाहते थे जो राजनीति का उपयोग राष्ट्र नीति के लिए कर सकें। उनकी राजनीति की चाल भी टेढ़ी नहीं सीधी थी इसलिए कुछ भी करके सत्ता प्राप्त कर लेंगे ऐसा दुराग्रह उनके मन में भी नहीं आया। उन्होंने राष्ट्रीय संकट की घड़ी में दल के हित से अधिक राष्ट्र के हित को ही वरीयता दी।

जीवन की कठिन परिस्थितियों और प्रारब्ध ने एक ऐसे पंडित दीनदयाल का निर्माण किया जो राजनीति के क्षेत्र में अजातशत्रु बन गया। बाल्यावस्था में ही माता-पिता को और फिर भाई बहन को खोया तो नियति ने उनकी हर कदम पर परीक्षा ली। सारा जीवन अलग-अलग स्थानों पर कटा और अस्थिरता से घिर रहा। ऐसी कठिन परिस्थितियां संभवतः उनके अंदर योजना पूर्वक वैराग्य उत्पन्न करना चाहती थीं। नियति की कोई निश्चित योजना ही थी जिसने हर परिस्थिति से उन्हें लड़ना और फिर जीतना सिखाया। मैट्रिक इंटरमीडिएट, एम ए और फिर शासकीय नौकरी सबमें बे अब्बल रहे। उनकी सुनियोजित हत्या भी उनकी नियति में थी। उनकी हत्या की जांच के लिए चंद्रचूड़ आयोग गठित किया गया और कई निष्कर्ष समिति के माध्यम से निकलने के प्रयास हुए।

किसको पता था पंडित दीनदयाल जी लखनऊ से पटना की अपनी यात्रा पूर्ण नहीं कर पाएंगे। सुबह की किरणों के साथ-साथ पंडित दीनदयाल की दुखद मृत्यु का समाचार संपूर्ण भारत में पहले तो पूरा देश स्तब्ध रह गया। देश को प्रकाशित करने वाली जीवन ज्योति रात के अंधकार में इस प्रकार बुझ जाएगी इसकी कल्पना किसी ने भी नहीं की थी। पंडित दीनदयाल जी को श्रद्धांजलि अर्पित करते हुए अटल बिहारी वाजपेयी कहते हैं -"दीनदयाल जी अब नहीं रहे किंतु उनका कार्य अभी शेष है। उस चिता से निकली हुई एक-एक चिंगारी हृदय में धारण कर परिश्रम की पराकाष्ठा और प्रयत्नों की परिसीमा करें। उनके शरीर पर लगी हुई चोटें लोकतंत्र पर किए गए प्रहार हैं उनके जीवन पर किया गया आक्रमण राष्ट्रीयता पर आक्रमण है। आईए राष्ट्र विरोधियों की इस चुनौती को हम स्वीकार करें।"


(डॉ हरिशंकर सिंह कंसाना राजनीति विज्ञान के सहा. प्रोफेसर और एकात्म मानव दर्शन के जानकार हैं)

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