बसन्त पञ्चमी पर विशेष: अपने बच्चों को दें जीवन का सबसे बड़ा उपहार, विद्यारम्भ संस्कार

बसन्त पञ्चमी पर विशेष: अपने बच्चों को दें जीवन का सबसे बड़ा उपहार, विद्यारम्भ संस्कार
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मोहन नागर

आज ऋतु परिवर्तन का पावन पर्व विद्या और ज्ञान की देवी माँ सरस्वती का प्राकट्य दिवस बसन्त पञ्चमी है । सनातन संस्कृति में ऋतु अथवा मौसम परिवर्तन के कालखण्ड में उत्सवों की योजना हमारे पूर्वजों ने की है । विज्ञान की परंपरा को किसी उत्सव या धार्मिक आयोजन से जोड़ देने पर भारत का धार्मिक व उत्सव प्रेमी समाज उसे सहजता से आत्मसात कर लेता है । हमारा प्रत्येक पर्व और धार्मिक उत्सव विज्ञान की कसौटी पर आज भी खरे हैं ।

बसन्त पञ्चमी का पर्व भारत के हर गाँव और घर में नई फसल की उम्मीदों के साथ खुशियों और ज्ञान की नई बासन्ती बहार लेकर आता है। इस समय प्रकृति अपना नया श्रृंगार करती है । सरसों फूलती है, आम बौराने लगते हैं । पतझड़ प्रारम्भ होकर नई कोंपले आने के संकेत मिलते हैं । हमारे शास्त्रों के अनुसार बसन्त पञ्चमी के दिन ज्ञान, कला और संगीत की देवी माँ सरस्वती का प्राकट्य हुआ था। इसीलिए इसे उनका जन्मोत्सव मानकर माँ सरस्वती की पूजा की जाती है । माँ सरस्वती पूजा विधि व मन्त्रोच्चारण में एक अद्भुत सकारात्मक ऊर्जा पैदा होती है जो एकाग्रता और बुद्धि को तेज करती है । इसीलिए आज के दिन बच्चों का हिन्दू धर्म के सोलह संस्कारों में से प्रमुख संस्कार "विद्यारम्भ संस्कार" किया जाता है । बसन्त पञ्चमी एक 'अबूझ मुहूर्त' है, जिसमें ब्रह्मांड की शक्तियां स्वयं नए कार्यों को आशीर्वाद देती हैं । इसलिए इसे विद्यारम्भ हेतु सबसे श्रेष्ठ समय माना गया है । विद्यारंभ केवल एक धार्मिक अनुष्ठान नहीं, बल्कि यह नई पीढ़ी को संस्कारित बनाने की प्रक्रिया है। माँ सरस्वती के प्राकट्य दिवस पर किया गया यह अनुष्ठान भविष्य में एक सभ्य, विद्वान और अनुशासित नागरिक के निर्माण की नींव है ।

तीस वर्ष शिक्षा के क्षेत्र में प्रत्यक्ष कार्य करने के अपने अनुभव से मैं कह सकता हूँ कि बसन्त पञ्चमी के दिन जिन नौनिहालों का विद्यारम्भ संस्कार हुआ है वे अन्य बच्चों की अपेक्षा अधिक विनम्र, आज्ञाकारी, कर्त्तव्यनिष्ठ, बुद्धिमान और ज्ञानवान है । क्योंकि बसन्त पञ्चमी पर विद्यारम्भ संस्कार के कारण माँ सरस्वती की कृपा से विद्यार्थी का मन शांत होता है और एकाग्रता बढ़ती है । एकाग्रता से बुद्धि तेज होती है और कठिन विषयों को समझने की शक्ति मिलती है । माँ सरस्वती 'विवेक' की देवी हैं । उनकी पूजा से व्यक्ति में सही और गलत के निर्णय करने की क्षमता आती है। माँ सरस्वती को वाणी की देवी कहा जाता है। उनकी आरती और मंत्रों के जाप से वाणी में स्पष्टता और मधुरता आती है। जो लोग गायन, वादन या सार्वजनिक बोलने के क्षेत्र में हैं, उन्हें विशेष सफलता मिलती है।कलाकारों, लेखकों और संगीतकारों के लिए यह दिन अपनी कला को निखारने और नई प्रेरणा पाने का होता है।

महाकवि सूर्यकान्त त्रिपाठी निराला जी ने माँ की आराधना करते हुए लिखा है ।

नव गति, नव लय, ताल-छंद नव,

नवल कंठ, नव जलद-मंद्ररव,

नव नभ के नव विहग-वृंद को

नव पर, नव स्वर दे ।

काट अन्ध-उर के बन्धन-स्तर

बहा जननि, ज्योतिर्मय निर्झर,

कलुष-भेद तम-हर, प्रकाश भर

जगमग जग कर दे ।

वीणावादिनी वर दे ।।


वैसे भी बसंत आने पर अंधकार कम होकर उजाला बढ़ने लगता है । प्रकृति का आलस्य दूर हो जाता है, वैसे ही माँ की पूजा आरती से मन का प्रमाद, डर और अज्ञान मिट जाता है। मंत्रोच्चार से वातावरण शुद्ध होता है और नकारात्मक शक्तियाँ दूर होकर सकारात्मकता आ जाती है । सत्कार्यों में मन रमने लगता है ।


अतः बसन्त पञ्चमी के इस पावन पर्व पर अपने बच्चों का विद्यारम्भ संस्कार अवश्य करवाएँ । इसके लिए आप विद्या भारती के किसी भी निक ट के विद्यालय "सरस्वती शिशु मन्दिर" में हो रहे अनुष्ठान में सम्मिलित हो सकते हैं । अथवा फिर अपने घर पर भी यह कार्य कर सकते हैं । इस हेतु शारीरिक शुद्धता के पश्चात सर्वप्रथम बच्चे को पीले वस्त्र पहनाएं। पीला रंग ऊर्जा, उत्साह और शुद्धता का प्रतीक है । एक चौकी पर पीला कपड़ा बिछाकर माँ सरस्वती की प्रतिमा स्थापित करें। साथ में गणेश जी की मूर्ति भी रखें । इसके बाद माँ सरस्वती के सामने घी का दीपक जलाएं और उनकी प्रिय वस्तुएं जैसे श्वेत अथवा पीले पुष्प और पीली मिठाई अर्पित करें।

सबसे पहले गंगाजल छिड़क कर स्वयं को और पूजा स्थान को पवित्र करें। हाथ जोड़कर माँ का ध्यान करें और उन्हें आसन ग्रहण करने की प्रार्थना करें । माँ को पीले चंदन का तिलक लगाएं। पीले वस्त्र या चुनरी अर्पित करें और पीले फूलों की माला चढ़ाएं। अपनी कलम और पुस्तकों पर भी तिलक लगाएं और उन्हें माँ के चरणों में रखकर प्रार्थना करें कि वे आपके भीतर अज्ञान मिटा दे । इस दिन बच्चे की केवल स्लेट ही नहीं, बल्कि उसकी पहली कलम और किताब की भी पूजा की जाती है। इसके बाद बच्चे की उंगली पकड़कर केसर की स्याही से या सूखे चावलों पर 'ॐ' या 'श्री' लिखवाएं। यह उसके जीवन के बौद्धिक यात्रा औपचारिक प्रारम्भ है ।

माँ की वन्दना करें

या कुन्देन्दुतुषारहारधवला या शुभ्रवस्त्रावृता, या वीणावरदण्डमण्डितकरा या श्वेतपद्मासना...

अन्त में माँ से क्षमा माँगते हुए सभी को प्रसाद बाँटे ।

जिस तरह बसंत में प्रकृति खिलती है, उसी तरह ज्ञान की देवी माँ सरस्वती की पूजा से अपने भीतर के अज्ञान के अंधेरे को मिटाकर ज्ञान का प्रकाश करना है ।

ॐ ऐं ह्रीं क्लीं महासरस्वत्यै नमः


(लेखक मोहन नागर मध्यप्रदेश जन अभियान परिषद के उपाध्यक्ष हैं)

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