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गलवान में चीन की पैंतरेबाजी जमीन के लिए नहीं है

अरुण आनंद

गलवान में चीन की पैंतरेबाजी जमीन के लिए नहीं है
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चीन के साथ चल रहे विवाद को लेकर पिछले सप्ताह हमने इस कॉलम में चर्चा आरंभ की थी। उसके बाद घटनाक्रम में और भी तेजी आई है। इस घटनाक्रम के बारे में चर्चा करने से पहले कुछ महत्वपूर्ण बातों की ओर ध्यान दिलाना आवश्यक है। पहली बात तो यह कि भारत और चीन के बीच चल रहा संघर्ष वास्तविक नियंत्रण रेखा पर है। यह अधिकृत सीमा नहीं है, भारत की अधिकृत सीमा तो हजारों मील आगे उस क्षेत्र में है जिस पर चीन ने कब्जा कर रखा है और उसका हिसाब होना अभी बाकी है। लेकिन बार—बार इसे सीमा विवाद कहकर हम अपने प्रतिकूल परिस्थितियां पैदा कर रहे हैं। इसलिए मीडिया व संचार के सभी माध्यमों व सोशल मीडिया में बार—बार इस तथ्य को दोहरा कर विमर्श को तथ्यात्मक बनाना होगा कि गलवान में चल रहा विवाद वास्तविक नियंत्रण रेखा पर है।

दूसरी महत्वपूर्ण बात यह है कि चीन की ओर से आरंभ किया गया यह विवाद केवल जमीन के किसी छोटे टुकड़े के लिए नहीं है। इस संघर्ष के मूल में चीन की असुरक्षा छिपी है। पिछले छ: सालों में भारत ने जिस प्रकार विश्व के शक्ति संतुलन में स्वयं को पुन: सथापित करने की प्रक्रिया आरंभ की है, चीन उससे घबराया हुआ है। भारत आर्थिक रूप से भी चीन का विकल्प बन कर उभर रहा है। आम जन की भाषा में कहें तो चीन नहीं चाहता कि भारत शीत युद्ध समाप्त होने के बाद उभर रही विश्व व्यवस्था में एक ध्रुव बने। 1962 की जंग भी इसी कारण से लड़ी गई थी। उस समय समय भारत तीसरी दुनिया के देशों की आवज बन कर उभर रहा था। 1962 के युद्ध के बाद भारत ने सोवियत संघ का पल्ला पकड़ लिया और अपनी मजबूत स्थिति खोकर सोवियत खेमे का एक सदस्य बन कर रह गया।

हम सब देख रहे हैं कि 1989 में सोवियत संघ के विघटन के बाद समाजवाद का पतन हुआ और 1990 के दशक से पूंजीवाद का पतन भी आरंभ हो गया जब एक के बाद एक आर्थिक संकट पश्चिमी देशों को अपनी चपेट में लेने लगे। यूरोपीय संघ का सपना अब मात्र कागजों पर है। अमेरिका का पतन हम सबकी आंखें के सामने हो रहा है। समाज और सरकार दोनों बुरी तरहं से विभाजित हैं। अफ्रीका अभी मूलभूत मुद्दों—रोटी, कपड़ा, मकान— से जूझ रहा है।

ऐसे में भारत का नेतृत्व की भूमिका में विश्व पटल पर उभरना एक स्वाभाविक प्रक्रिया के तहत होना ही था। 1998 से 2013 तक अटल सरकार ने इसकी जमीन तैयार की। लेकिन दुर्भाग्यवश उसके बाद के 10 सालों के यूपीए के कार्यकाल में मनमोहन—सोनिया सरकार ने इसे गंवा दिया। शर्म—अल—शेख में डा. मनमोहन सिंह ने पाकिसतान के सामने जो घुटने टेके, उस स्थिति को बहाल करने के लिए हमें सालों लग गए और अंतत: मोदी सरकार के शासन काल में सर्जिकल स्ट्राइक से व बालाकोट में आतंकी कैंपों को नष्ट करके उन पापों का प्रायश्चित भी हुआ और भारत ने शौर्य व पराक्रम के उस चरण में विधिवत प्रवश किया। इस शौर्य की अभिव्यक्ति धारा 370 में संशोधन के रूप में 13 महीने पहले सामने आई। इधर भारत का तेजी से बढ़ता बाजार, स्थायी व जवाबदेह सरकार और समाज में समरसता व दक्ष हाथों की पर्याप्त उपलब्धता के कारण भारत तेजी से चीन के आर्थिक विकल्प के रूप में उभरने लगा था। चीन का इस स्थिति में हड़बड़ाना स्वाभाविक था। विश्व में भारत नेतृत्व की भूमिका न निभा पाए इसलिए चीन ने गलवान के बहाने विवाद खड़ा किया है।

1962 में क्यूबा में मिसाइल संकट के दौरान चीन ने भारत पर हमला किया था। सोवियत संघ और अमेरिका उस संकट में एक परमाणु युद्ध में टकराने के कगार पर थे। पूरी दुनिया का ध्यान उस तरफ था, इसी मौके का लाभ उठाकर चीन ने भारत पर हमला किया क्योंकि विश्व समुदाय उस समय प्रभावी हस्तक्षेप की स्थिति में नहीं था। इस समय भी दुनिया के सारे प्रमुख देश कोरोना वायरस की मार से जूझ रहे हैं जो मूलत: चीन की देन है। सो इस वैश्विक संकट का लाभ उठाकर चीन फिर एक बार भारत से भिड़ने का प्रयास कर रहा है। लेकिन इस बार हालात बदले हुए हैं। मोदी सरकार करूणा और दया की नहीं बल्कि शौर्य और पराक्रम की भाषा में बात कर रही है। चीन की कमजोर नब्ज पर हाथ रखते हुए पहले 59 चीनी एप्स पर प्रतिबंध लगाया, चीनी कंपनियों के बड़े—छोटे सब सरकारी ठेके बंद कर दिए, जो ठेके चालू थे उनसे भी उन्हें बाहर निकलने के लिए कह दिया। भारतीय समाज ने चीनी वस्तुओं का बहिष्कार स्वत: ही आरंभ कर दिया है। समाज में 'स्वदेशी' का भाव कितना प्रबल है इसका पता इस बात से चलता है कि टिक टॉक नामक ऐप पर प्रतिबंध लगा तो लाखों फॉलोअर्स रखने वाली कई सोशल मीडिया हस्तियों ने इस प्लेटफार्म को खुशी से छोड़ने में कोई हिचक नहीं दिखाई। इनमें से कईयों के लिए इस ऐप पर की जाने वाली सोशल मीडिया मार्किटिंग उनकी आजीवका का साधन भी थी पर चीनी ऐप के प्रतिबंध का उन्होंने खुलकर समर्थन किया। इस ऐप की निर्माता चीनी कंपनी ने दिल्ली में कई वरिष्ठ अधिवक्ताओं से संपर्क किया जिससे सरकार के फैसले को अदालत में चुनौती दी जा सके। सभी प्रमुख अधिवक्ताओं ने उनका केस लड़ने से मना कर दिया।

कुल मिलाकर हो सकता है कि गलवान का विवाद कुछ दिनों में सुलझ जाए। पर हमें यह नहीं भूलना चाहिए कि गलवान पर चीनी रूख उसकी पैंतरेबाजी है। विवाद जमीन के टुकड़े का नहीं है, मसला तो यह है कि भारत को किसी भी तरहं विश्व शक्ति बनने से रोका जाए।

समाप्त

Updated : 2020-07-03T15:59:35+05:30
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Arun Anand

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