शी जिनपिंग का नया रूप राजशाही या व्यक्तिवाद

Update: 2018-03-07 00:00 GMT

भरतचन्द्र नायक

चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग के बाद कौन? इस प्रश्न को पूर्ण विराम देने के लिए कम्युनिस्ट पार्टी ने एक प्रस्ताव पेश कर दिया है। चीन में परंपरा रही है कि राष्ट्रपति को दोबारा अवसर दिए जाते समय ही उनके अगले उत्तराधिकारी का नाम प्रस्तुत किया जाता है लेकिन इस बार ऐसा नहीं हुआ जिससे संकेत मिल गया कि शी जिनपिंग के वर्चस्व को चुनौती देने का फिलहाल कोई साहस नहीं कर सका है। इसी के साथ आगामी सम्मेलन में शी जिनपिंग को बेमियादी कार्यकाल दिए जाने के निर्णय पर मोहर लग जाना तय हो गया है।
माना जाता है कि इस निर्णय के पीछे चीन में स्थिरता और अति महत्वाकांक्षा प्रबल है और चीन दुनिया का सर्वशक्तिमान सुपर पावर बनने की चाहत में आत्ममुग्ध है। शी जिनपिंग की भ्रष्टाचार विरोधी नायक के रूप में पहचान बनी है। यह भले वास्तविकता से मेल न हो लेकिन असहमति के स्वर मंद हैं। अलबत्ता चीन की एक कारोबारी विचारक महिला ने सांसदों, जनप्रतिनिधियों को खत लिखकर आगाह किया है कि शी जिनपिंग को परंपरागत तयशुदा कार्यकाल के विरूद्ध असीमित कार्यकाल त्रासद सिद्ध होगा। जहां सहमति की आवाज अघोषित रूप से असहज मानी जाती है वहां उस कारोबारी महिला के स्वर दुनिया के लिए खबर बन चुके हैं। टिप्पणीकार कारोबारी महिला ली दातोंग ने कहा है कि कार्यकाल का असीमित विस्तार राजशाही की प्रवृत्ति को जन्म देगा। उसने कहा है कि माओ का युग भी उसने देखा है। लेकिन समय बदल चुका है। कम्युनिस्ट पार्टी ने जो कार्यकाल का प्रस्ताव रखा है वह धोखा है।

आज चीन के शासक शी जिनपिंग वर्चस्व की चाह में समुद्री सीमाओं, थल द्वारों पर वर्चस्व कर यदि चीन से कमजोर देशों के साथ छेड़छाड़ करते हैं तो यह संभव होते हुए भी लोक स्वीकृति हासिल कर सकेगा इसमें संदेह है। चीन ने पिछले दिनों डोकलाम पर दबिश देकर भारत के तेवरों को आजमाया। तभी चीन ने कहा कि हिमालय को हिलाया जा सकता है लेकिन लाल सेना को डोकलाम से नहीं हिलाया जा सकता। इसी तरह बेल्ट एंड रोड कारोबार के निर्माण पर भारी पूंजी लगाकर पाक अधिकृत कश्मीर पर अतिक्रमण कर भारत की सार्वभौम सत्ता को चुनौती दी।

साउथ चीन सागर पर अपने जहाजी बेड़ा के साथ अधिकार जताने की चेष्टा चीन कर चुका है जिसका सर्वत्र विरोध हो रहा है। एशिया पेसिफिक क्षेत्र में बिना ताज के सरदार बनने की महत्वाकांक्षा चीन उजागर कर चुका है। विस्तारवाद के जनक के रूप में चीन की हरकतों से देश चिन्तित है। साथ ही पाकिस्तान मालद्वीव, श्रीलंका, बांग्लादेश जैसे देश चीन की चुपड़ी बातों और चीनी मुद्रा के एवज में चीन के पास अपनी सार्वभौम सत्ता बंधक बनाते जा रहे हैं। परोक्ष में ऐसा करके चीन का इरादा विकासशील भारत के बढ़ते पगों को रोकना अवरोध उत्पन्न करना है। 1962 में चीन ने भारत पर हमला करके जिस तरह विश्वासघात किया था और भारत बेखबर बनकर अवसाद में चला गया था। आज 43 वर्ष बाद भारत पूर्ण चेतना और सजग सज्जित स्थिति में है और भारत को डोकलाम के मामले में चीन को कड़वा स्वाद चखा दिया है। जब इतने वर्षों में घड़ी के कांटे थमे हुए हैं तो शी जिनपिंग को बेमियादी कार्यकाल की जितनी चिंता भारत को करना है उससे अधिक स्वयं चीन की जनता को करना है जहां भ्रष्टाचार विरोध के नायक शी जिनपिंग के कड़े तेवरों के बावजूद भ्रष्टाचार निचले स्तर तक केंसर की शक्ल ले चुका है। असहमति और असंतोष की ज्वाला कब भड़केगी और ज्वालामुखी बन जायेगी यह समय के गर्भ में है।

चीन में गांवखेड़ो का तेजी से शहरीकरण हो रहा है। लेकिन शी जिनपिंग के गृह क्षेत्र का पिछड़ा धूल धूसरित बना रहना एक अजीब रहस्य है। यह आज के उन राजनेताओं के लिए सबक भी है जो सत्ता में आते ही लोकधन अपने गृह क्षेत्र के विकास पर उड़ेल देते हैं। सबक तो छोटे से छोटे दृष्टांत से लिया जा सकता है। परंपराओं और मूल के प्रति आस्था वास्तव में स्तुत्य है। हमने देखा कि इंग्लैण्ड में अलिखित संविधान है और टेन डाउनिंग स्ट्रीट प्रधानमंत्री निवास जस का तस बना हुआ है। दूसरी ओर हमने प्रधानमंत्री के निवास को या तो स्मारक बना दिया या उसके पीछे किवदंती जोड़ने में कोई कसर नहीं छोड़ी।

बचपन में बताया जाता था कि चीन की आबादी नशीले पदार्थों की अभ्यस्त है लेकिन राजनैतिक परिवर्तन के बाद आयी वामपंथी क्रांति ने चीन को प्रगति के पथ पर अग्रसर किया। शी जिनपिंग के पूर्व राष्ट्रपति डेग ने चीन को आर्थिक क्रांति की सौगात दी। चीन का भूराजनैतिक चेहरा विश्व पटल पर पेश किया। विदेश नीति बनाई। चीन में अधोसंरचना का ताना बाना बुना। डेग ने ही राष्ट्रपति के कार्यकाल की मर्यादा निर्धारित की थी। उनके बाद आए दो राष्ट्रपति अपना कार्यकाल समाप्त कर विदा हो गए लेकिन शी जिनपिंग ने अपने कार्यकाल की सीमा समाप्त करने का ताना बाना बुना है। उन्होंने चीन में व्यक्तिवाद की पुनर्स्थापना करने का प्रयास किया है। इस परिप्रेक्ष्य में भारत निश्चिंत होकर नहीं रह सकता है। चीन का हर प्रयास भारत के पास पड़ौस में चीन की लॉबी को सशक्त बनाना है। यह प्रयास चीन इन देशों को असीमित कर्ज देकर पूरा कर रहा है और इन देशों की सार्वभौम सत्ता को निष्प्रभावी बनाकर इन्हें आगे पीछे अपना उपनिवेशवाद खड़ा करने की जुगत में है। मालद्वीव और पाकिस्तान से चीन से बढ़ते अंतरंग संबंध इसका सबूत है। औपनिवेशक अंचल में आ रहे इन मुल्कों के शासक भले ही आसन्न संकट से बेखबर रहे हमें भारत को जरूर इससे अतिरिक्त सजग, सक्रियता बढाने की जरूरत है। इतना ही नहीं चीन के साथ भी हमें संवाद में निरंतरता बनाए रखने की दूरदर्शितापूर्ण पहल अपेक्षित है।

इस संबंध में यह भी एक वास्तविकता है कि विस्तारवाद इक्कीसवी शताब्दी में भले ही त्याज्य हो लेकिन इसका शिकार भारत ही नहीं मलेशिया, इंडोनेशिया, वियतनाम, बु्रनेई, ताइवान, फिलीपींस जैसे तमाम देश है और जापान भी धमक से आतंकित है। क्रिया के साथ प्रतिक्रिया होती है। विस्तारवाद के विरोध में जहां भारत कटिबद्ध है वहीं अमेरिका, आस्ट्रेलिया, जापान, फ्रांस जैसे शक्तिशाली देश भी विस्तावाद के विरोध में झंडा उठा चुके है और भारत की सक्रियता तथा साहसिक पहल के कायल हो चुके है। शी जिनपिंग के वर्चस्व से चीन स्वयं चिंताग्रस्त होगा, अराजकता को निमंत्रण मिलेगा इस बात से भी इंकार नहीं किया जा सकता है। अपने को माओवाद का इक्कीसवी शताब्दी का प्रतीक मानने लगे शी जिनपिंग ने अपने को भ्रष्टाचार विरोधी योद्धा और रचनात्मकता का मुखौटा प्रदर्शित किया है लेकिन उनकी विस्तारवादी मानसिकता आज दुनिया के लिए चिंता का विषय बन चुकी है। भारत ने तीन मौकों पर इसका दंश को भोगा है। वर्ष 2013 में देप सांग, सिंतबर 2014 में चूमर घाटी और 2017 में डोकलाम की झड़पें स्मृति पटल पर अंकित है। तुलसीदास ने कहा है मिलत एक दारूण दुख देही बिछड़त एक प्राण हर लेही। नियति जो भी हो हमेशा सजग और सज्जित रहना पड़ेगा।

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