सवाल यह है कि एक विदेशी नेता की, जिसे उसके अपने देश ने भुला दिया है। उसकी मूर्ति भारत में लगी ही क्यों? भारत का लेनिन से क्या नाता है? मजदूरों का भावनात्मक शोषण कर स्वयं के व्यक्तिगत प्रतिशोध को क्रांति की शक्ल देकर एक अधिनायकवादी भारत का आदर्श कैसे हो सकता है? बेशक लेनिन की मूर्ति खड़ी रहे या बिछी रहे, इससे कोई खास फर्क नहीं पड़ता। अचानक उपद्रव कर मूर्ति को ढहाना अनावश्यक रूप से एक विदेशी आक्रांता को बेवजह चर्चा में ला रहा है, जिसे रशिया खुद याद करना नहीं चाहता। अक्टूबर 2017 को ज्यादा दिन नहीं बीते हैं। इतिहास में यह तारीख रुस की अक्टूबर क्रांति के 100 वर्ष पूर्ण हुए यह बताती है। पर दुनिया का नक्शा बदलने का दावा करने वाली क्रांति 100 बरस में ही अप्रासंगिक ही नहीं हो गई, सोवियत संघ के ही 15 टुकड़े हो गए। जाहिर है आज का रशिया अपने अतीत से पीछा छुड़ाना चाहता है। पर देश में आज लेनिन के प्रेमी भी हैं, बाबर के वंशज भी हैं। वे त्रिपुरा से लेकर केरल तक लाल-पीले हो रहे हैं। माहौल एकदम मोहर्रम की तरह मातमी है। ये लेनिन प्रेमी सिर्फ वापमंथी नहीं हैं, इनमें कांग्रेसी भी हैं, बसपाई भी हैं, तृणमूल भी हैं और भी राजनीति के जितने मूल हैं, सब हैं और ध्यान से देखेंगे तो पाएंगे कि ये सब देश की मिट्टी से कटे हुए हैं। एक स्वर में आज ये भाजपा और संघ को गाली दे रहे हैं। वे भूल रहे हैं लेनिन की प्रतिमा को मंगोलिया में भी ढहा दिया गया था, क्योंकि लेनिन एक अत्याचारी था। तानाशाह सद्दाम हुसैन और हिटलर के पुतलों को भी ढहते हुए इतिहास ने देखा है। त्रिपुरा में यही हुआ।
पुन: रेखांकित करना चाहूंगा यह कतई आवश्यक नहीं था, अपेक्षित भी नहीं कि लेनिन की प्रतिमा पर इस तरह बुलडोजर चले। कारण विचार रूप में लेनिन पर यंू भी एक नहीं कई बुलडोजर चल चुके हैं। वे ऐसे पुतले के रूप में इतने साल बर्दाश्त किए जाते रहे तो अभी कुछ साल और सही। इतिहास इन तानाशाहों को यूं भी याद रखने वाला नहीं हैं। यूं जन आकांक्षाएं जब ज्वार का रूप लेती है तो वे अनुशासन का दायरा तोड़ती है। त्रिपुरा की घटना इसी का परिणाम है। आज इस घटना से आने वाले कुछ दिनों तक फिर एक बार षडयंत्रकारी देश के सकारात्मक विमर्श को एक गलत दिशा देंगे अत: यह समय बेहद सजगता का है। कारण इस देश की समस्या अभी यह है कि देश का एक बड़ा वर्ग जो इस निर्णायक संघर्ष में तटस्थ है वह इतिहास से, संस्कृति से पूरी तरह बेखबर है। वह यह जानता ही नहीं लेनिन कौन है, जब वह यह जान जाएगा तो पुतले क्या लेनिन प्रेमी भी या तो अपने विचार बदलेंगे या खुद अपने लिए बिलों की तलाश करेंगे। अत: विजय के इन क्षणो में महाविजय एवं संपूर्ण परिवर्तन के लिए अपनी ऊर्जा का न केवल संचय करें अपितु उन्हें ठीक दिशा में ही निवेश करने का संकल्प लें।