घड़ी असीम धैर्य की है

हम विजय की ओर बढ़ते जा रहे.... राष्टÑगीत की यह पंक्तियां आज उद्धृत करना कहीं कहीं अति आशावादिता का भाव जगा सकती है, पर यह सच है, यथार्थ है। सम्पूर्ण हिन्दू समाज करवट ले रहा है और अपने विराट रूप के प्रगटीकरण के लिए उद्यत है, यह स्पष्ट दिखाई दे रहा है। घनघोर युद्ध की इस घड़ी में इसीलिए कोरेगांव की मायावी घटना भी होगी और वंचित समाज को बरगलाने के लिए आसुरी शक्तियां उपद्रव भी करेंगी। आवश्यकता असीम धैर्य की है, आवश्यकता संगठन की शक्ति को और सामूहिक करने की है। आवश्यकता और समरस होने की है। विश्वास स्वयं पर कीजिए, नैराश्य मन में लाने की कहीं आवश्यकता है ही नहीं देश और समाज ठीक-ठीक दिशा में तेजी से अग्रसर है स्वाभाविक है, आसुरी शक्तियां विध्वंस का षड्यंत्र करेंगी। सजगता यही रखने की है हम उनकी माया का शिकार न होकर आपस में ही एक-दूसरे के खिलाफ सज्ज दिखाई न दें, क्योंकि यह उनके षड्यंत्र की सफलता होगी।
सच मानिए, दिमाग पर ज्यादा जोर देने की आवश्यकता नहीं है, आज का देश के कुछ हिस्सों में हिंसक प्रदर्शन सर्वोच्च न्यायालय के निर्णय का परिणाम नहीं है। महाराष्टÑ में कोरेगांव की घटना के समय तो न्यायालय का कोई निर्णय नहीं आया था न। अभी इस घटना को ज्यादा दिन भी नहीं बीते हैं। तात्पर्य न्यायालय अगर इस बीच मौन भी रहता तो कोई और वजह देश को दंगों में झोंकने की ढूंढ ली जाती। सच्चाई यह है कि वंचित समाज के नाम पर, तथाकथित अस्पृश्य समाज के नाम पर दशकों से कुत्सित राजनीति करने वालों की जमीन खिसकना शुरू हो चुकी है। बेशक गठांने पीढ़ियों की हैं शताब्दियों की है अत: अभी समय लग सकता है, पर परिवर्तन की शुरूआत हो चुकी है।
देश यह समझ रहा है समावेशकता हिन्दू विचार की एक अनन्य लाक्षणिकता है। उसे स्वामी विवेकानंद की यह बात ध्यान में आ रही है कि संस्कृत में बहिष्कार शब्द ही नहीं है और भाषा समाज के व्यवहार का प्रतिबिंब है। कथित अस्पृश्य समाज को यह बात याद आ रही है कि महाराष्टÑ के सामाजिक कार्यकर्ता स्व. पांडुरंग सदाशिव साने (1819-1950) ने अपनी पुस्तक भारतीय संस्कृति में लिखा है कि मोक्ष का सिद्धांत मात्र व्यक्ति ही नहीं समाज पर भी लागू होता है। समाज सेवा के लिए रक्त की अंतिम बंूद भी समाज को अर्पित करना ही मोक्ष है और यही हिन्दू धर्म है। समाज को यह ध्यान में आ रहा है कि प्रसिद्ध मराठी संत तुकाराम (1609-1650) का दर्शन समस्त विश्व में विष्णु ही व्याप्त है। अत: किसी भी प्रकार की विषमता धिक्कार के योग्य है। और हां स्वयं डॉ. भीमराव अम्बेडकर ने संविधान सभा को सम्बोधित करते हुए कहा था कि स्वातंत्र्य, मातृभाव एवं समानता का सिद्धांत उन्होंने फ्रेंच राज्य क्रांति या अन्य किसी आन्दोलन से नहीं परन्तु भारतीय चिंतन से, बुद्ध के तत्वज्ञान से लिया है।
आज भीम सेना के नाम पर देश को अराजकता के चौराहे पर खड़ा करने वाले चंद उपद्रवी यह समझ गए हैं कि दशकों से वे जिस समाज को बरगला रहे थे,अब जाग रहा है। अत: वे अब तक के अपने सबसे वीभत्स रूप में है। मध्यप्रदेश हो या छत्तीसगढ़, पंजाब हो या उत्तरप्रदेश, आज के हिंसक, अराजक आंदोलन के उपद्रवी एक-दूसरे को जानते नहीं हैं वे आपस में कभी मिले भी नहीं है पर सबके तौर तरीके एक थे और इनको दिग्भ्रमित करने वाली ताकतें भी एक ही हैं आवश्यकता इन्हें पहचानने की है।
यह आन्दोलन संभव है प्रशासन की सख्ती से अगले कुछ घण्टों में शांत हो जाए। जीवन पटरी पर लौटता दिखाई दे। पर यह षड्यंत्र गहरा है। यह षड्यंत्र समाज के ताने-बाने को क्षत-विक्षत करने का है। यह षड्यंत्र देश को एक आंतरिक गृह युद्ध में ढकेलने का है। त्रेता युग में राम ने दण्डकारण्य को राक्षस विहीन करने के लिए वंचित समाज से संवाद स्थापित ही नहीं किया, वे उनमें रम गए, खप गए और उन्हीं की शक्ति को जागृत कर राम राज्य स्थापित किया। योगेश्वर कृष्ण ने द्वापर में गोवर्धन को एक सूत्र में बांधा। यह प्रतीक है इन्हें आज नए परिवेश में हमें समझना होगा। हमें भारतीय संस्कृति के यह सूत्र समाज में उतारने होंगे कि विश्वामित्र जन्म से क्षत्रिय थे, वाल्मीकि जन्म से कथित रूप से अस्पृश्य थे, नारद शूद्र थे पर अपने कर्म से वे ब्राह्मण कहलाए, वहीं रावण जन्म से ब्राह्मण था पर कर्म से असुर की श्रेणी में गिना गया।
तात्पर्य भारतीय चिंतन में अस्पृश्यता कही हैं ही नहीं। निकट भूतकाल में ही देखें तो बुद्ध से लेकर शंकराचार्य तक सबने समाज को ‘आत्मवत सर्वभूतेषू या एकोहम् बहुष्यामि’ का संदेश समय पर दिया। आज यही संदेश, आज यही ज्ञान गंगा, गांव-गांव अवतरित होने का प्रयास चल रहा है। समाज में नए-नए भागीरथ स्वयं को गला रहे हैं और समरसता की पवित्र क्षिप्रा कल कल कर रही है। स्वभाविक है षड्यंत्रों के टीले अवरोध बनेंगे हमें रास्ता इनको पार करके ही निकालना होगा, निकलेगा क्योंकि यह ईश्वरीय इच्छा है। समय अवश्य असीम धैर्य का है, संयम का है।
