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दायरा नहीं, दरों से बढ़ा सम्पत्तिकर

दायरा नहीं, दरों से बढ़ा सम्पत्तिकर
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निगम के वसूली आंकड़ों में कई पेंच

ग्वालियर, वरिष्ठ संवाददाता। वित्त वर्ष 2015-16 समाप्त होते ही यह बहस भी छिड़ गई है कि नगर निगम की आय का सबसे बड़े माध्यम सम्पत्तिकर के आंकड़े में पिछले वर्ष की अपेक्षा कितनी बढ़ोतरी हुई है। दो दिन पूर्व इसे लेकर निगमायुक्त अनय द्विवेदी ने पत्रकारों को विशेष रूप से आमंत्रित कर यह जानकारी दी थी कि वसूली का आंकड़ा लगभग 23 करोड़ से बढ़कर 42 करोड़ के करीब पहुंच गया है।

हालांकि जानकारों की मानें तो आंकड़े में वृद्धि को लेकर कई पेंच हैं जिनके अनुसार आसानी से यह समझना मुश्किल है कि यह बढ़ोतरी सम्पत्तियों का दायरा बढऩे से हुई है अथवा इसका कारण दरें और परिक्षेत्रों में परिवर्तन है। उल्लेखनीय है कि नगर निगम ने वर्ष 2015-16 के लिए सम्पत्तिकर वसूली का लक्ष्य 75 करोड़ तय किया था। लेकिन वित्त वर्ष समाप्त होते-होते यह केवल 42 करोड़ तक ही पहुंच सका। नगर निगम आयुक्त के अनुसार आंकड़े में बढ़ोतरी सम्पत्तियों का दायरा बढऩे से हुई है।

पिछले वर्ष जहां 70 प्रतिशत सम्पत्तियों से वसूली हुई थी जो इस बार बढ़कर 80 प्रतिशत हो गई। निगमायुक्त ने इन आंकड़ों के हिसाब से भले ही अपनी पीठ थपथपा ली हो लेकिन यदि आंकड़ों की वास्तविकता देखें तो इसमें बहुत बड़ा भाग सम्पत्तिकर की दरें बढऩे और परिक्षेत्रों में परिवर्तन होने से आया है।

25 से 30 प्रतिशत बढ़ा कर
पिछले वर्ष के प्रांरभ में ही सम्पत्तिकर और परिक्षेत्रों में परिर्वतन किए जाने से करों में लगभग 25 से 30 फीसदी की वृद्धि हो गई थी। इस स्थिति में जहां परिक्षेत्रों के बदलने से कई ऐसी सम्पत्तियां मुख्य सड़क पर आ गईं जो कि गलियों में थीं और इसके साथ उन सम्पत्तियों पर कर भी बढ़ गया। इसका सीधा प्रभाव सम्पत्तिकर के आंकड़ों पर पड़ा जो वर्ष के अंत में कुल आंकड़े में बढ़ोतरी के रूप में दर्शाया जा रहा है।
ऑन लाइन होने से भी आया अंतर
एक वर्ष पहले तक जहां सम्पत्तिकर रसीद कट्टों क माध्यम से वसूला जाता था, वहीं अब उसमें परिवर्तन कर ऑनलाइन व्यवस्था कर दी गई है। इसके चलते कर संग्राहकों तथा वसूली से जुड़े अन्य कर्मचारियों द्वारा की गई हेराफेरी बंद हो गई और पूरा राजस्व निगम को मिलने लगा। इसका प्रभाव भी सम्पत्तिकर वसूली के आंकड़ों पर पड़ा है। इसके साथ ही निगमायुक्त द्वारा की गई सख्ती भी इसमें काफी सहयोगी रही है। वहीं अतिंम तीन माह में ही पांच करोड़ से अधिक वसूली हुई है। इसके साथ ही बड़े बकायादारों को भी निशाने पर लिया गया। यही कारण है कि इस वर्ष उन्होंने 100 करोड़ वसूली का लक्ष्य तय किया है। अब देखना यह है कि इस आंकड़े के कितने करीब नगर निगम पहुंचती है।

सामंजस्य की कमी
यदि विपक्ष की मानें तो महापौर और निगमायुक्त में सामंजस्य की कमी के कारण आंकड़ा इस बार भी अधिक नहीं बढ़ सका। स्थिति यह हुई कि कहीं पार्षदों का दबाव तो कहीं अन्य किसी कारण से सम्पत्तिकर वसूली नहीं हो सकी। उधर जब निगमायुक्त ने पत्रकारों को सम्पत्तिकर की जानकारी देते हुए वसूली में बढ़ोतरी के लिए अपनी पीठ थपथपाई तो उन्होंने इस दौरान ना तो महापौर विवेक शेजवलकर को अपने साथ रखना उचित समझा और ना ही राजस्व प्रभारी खुशबू गुप्ता को। उन्होंने यह तो बताया कि सम्पत्तिकर वसूली में बढ़ोतरी हुई है लेकिन यह पूरी तरह स्पष्ट नहीं किया कि वास्तव में इस वृद्धि में दायरा बढऩा कारगर हुआ या दरों में बढ़ोतरी और परिक्षेत्रों में परिवर्तन। लेकिन यह तय है कि यदि सामंजस्य से काम किया जाए तो वसूली का आंकड़ा और भी बढ़ सकता है।


इनका कहना है

सम्पत्तिकर वसूली के आंकड़े में इस वर्ष बढ़ोतरी हुई है। वसूली का दायरा बढ़ा है। निगमायुक्त इसकी जानकारी देने के लिए अधिकृत हैं। उस दौरान महापौर या राजस्व प्रभारी की उपस्थिति आवश्यक नहीं है।

विवेक शेजवलकर , महापौर

मैं पिछले पांच दिन से शहर से बाहर हूं। इस कारण मुझे नहीं मालूम कि निगमायुक्त ने प्रेसवार्ता में सम्पत्तिकर वसूली सम्बन्धी कोई जानकारी दी है। जहां तक वसूली में बढ़ोतरी का सवाल है तो इस बार दायरा बढ़ा है और वसूली भी अधिक हुई है। सही आंकड़ा हम वापस आने के बाद ही बता सकेंगे।

खुशबू गुप्ता, राजस्व प्रभारी

महापौर और निगमायुक्त में खींचतान के कारण सम्पत्तिकर वसूली नहीं बढ़ पा रही है। वैसे इस बार निगमायुक्त ने काफी मेहनत की है और वसूली का आंकड़ा बढ़ा भी है। लेकिन फिर भी 66 प्रतिशत से वसूली नहीं हुई। जहां तक इस बार वसूली में वृद्धि की बात है तो इसमें सम्पत्तिकर की दरें और परिक्षेत्रों में परिवर्तन का भी काफी प्रभाव रहा है। लेकिन यदि मेहनत, ईमानदारी और बिना दबाव के काम किया जाए तो वसूली का आंकड़ा काफी बढ़ सकता है।

कृष्णराव दीक्षित, नेता प्रतिपक्ष, नगर निगम

सम्पत्तिकर वसूली का दायरा बढऩा चाहिए। इस बार कुछ बढ़ा है, लेकिन वह ना के बरावर है। इसे बढ़ाने की जरूरत है।

देवेन्द्र तोमर, पूर्व नेता प्रतिपक्ष,
नगर निगम

Updated : 2016-04-03T05:30:00+05:30
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