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भारत में जन्मे व्यक्ति को पुरातन से ही मिले हैं संस्कार

‘राष्ट्रीयता-आधुनिकता का विरोध नहीं’ सत्र का निष्कर्ष


भोपाल। लोक-मंथन में राष्ट्र सर्वोपरि थीम पर चल रहे वैचारिक सत्रों की श्रंखला में ‘राष्ट्रीयता- आधुनिकता का विरोध नहीं’ विषय पर चर्चा आरंभ करते हुए श्री हिन्दोल सोन गुप्ता ने कहा कि भारत में जन्में व्यक्ति को पुरातन से ही संस्कार और संस्कृति मिलती है। वह जीवन पर्यन्त उसी संस्कृति का निर्वहन करता है। हमारा संस्कार आधुनिक है और उसे हम निरंतर अपने जीवन में आत्मसात् कर रहे हैं। हमारा भारत अखंड है जिसमें अलग-अलग जाति, धर्म, रंग, वेश-भूषा, बोली, संगीत दिखाई देते हैं। फिर भी वह एक अखंड मंडलाकार आकृति में समाहित है। यह सच है कि पश्चिमी संस्कृति में विविधता न होकर एक मत, एक चमड़ी, एक वेश-भूषा, एक बोली को बढ़ावा मिलता है। यह हम पर भी थोपने के प्रयास हुए हैं जो अभी तक असफ ल ही कहे जा सकते हैं। चर्चा में भाग लेते हुए श्री बलदेवभाई शर्मा ने आधुनिकता को लेकर ग्वालियर का कंघा प्रसंग सुनाया। उन्होंने कहा कि हम छोटी-छोटी बातों से हीन भावना से ग्रसित हो जाते हैं। जबकि आधुनिकता रहन-सहन का विचार नहीं हो सकती। पहनावा और अन्य रहन-सहन के तरीके बदलते रहते हैं जबकि आधुनिकता एक विचार दृष्टि है। वह जीवन का मूल तत्व है, जो जीवन का निर्धारण करती है।
भारत का राष्ट्रवाद गौरवशाली रहा है। हमें राष्ट्रीयता और राष्ट्रवाद में से राष्ट्रीयता का चयन करना चाहिए और आधुनिकता को लेकर किसी भी तरह की ग्रंथी (हीन भावना) से बाहर निकलना होगा, तभी हमारा समाज सुदृढ़ हो सकेगा। सत्र में डॉ. श्यामसुन्दर दुबे ने गाँव की वैभवशाली परंपराओं, संस्कृतियों, गीत-संगीत को सार्वभौमिक बताते हुए कहा कि पहले गाँव के आँगन में बैठकर लोकगीत गाए जाते थे जिन्हें नई पीढ़ी भी सुनती थी। आज रेडियो, टेलीविजन और नए मीडिया ने लोगों की दूरियाँ बड़ा दी हैं। इस कारण हमारी जो मूल संस्कृति थी, वह पीछे छूट गई है। खेती को हम सबसे श्रेष्ठ मानते थे, आज कोई खेती करना नहीं चाहता। किसानों के बच्चों में भी हीन भावना बैठ गई है। वह भी किसी अधिकारी, उद्योगपति और राजनेता की तरह बाजार में रहना पसंद कर रहे हैं, गाँव से पलायन हो रहा है, जबकि हमारी संस्कृति और आधुनिकता गाँव में बसती है।
सत्र की अध्यक्षता करते हुए प्रो. गिरीशचंद्र त्रिपाठी ने कहा कि हमें पश्चिम की नकल को छोडऩा होगा। भारत की मिट्टी लोक की मिट्टी है। हमारे यहाँ गीत-संगीत, खेती-किसानी और अनेक उद्यम वर्षों से आधुनिकता को बढ़ावा दे रहे हैं। हमारे यहाँ राष्ट्रीयता में संकीर्णता को कोई स्थान नहीं है। हमारा राष्ट्रवाद आधुनिकता का विरोधी नहीं है। परंतु हमे नकल और हीन भावना से बचना होगा। पश्चिमी दृष्टि ने हमें आधुनिकता का जो मॉडल दिया है, वह हमारे किसी काम का नहीं है।

भारत की प्रकृति नौकरी की नहीं, रोजगार की है
स्वदेशी अर्थ-व्यवस्था, औद्योगीकरण तथा धारणक्षम विकास
भारत के ज्ञानी ऋषि-मुनि जीवन के हर पहलू से संबन्धित क्षेत्र के विषय में अनेक ज्ञान सूत्र दे चुके हैं ज़रूरत इस बात की है कि हम उन सूत्रों को समझे और उन पर काम करें। हमारी अर्थ-व्यवस्था, तंत्र-व्यवस्था, धारण-क्षमता आदि अंग्रेज़ों के शासन के बाद गड़बड़ा गई क्योंकि उन्होंने ज्ञान को डिग्री में बाँध दिया और हर काम को नौकरी की तरह देखा। यह बात अटल बिहारी वाजपेयी हिन्दी विश्वविद्यालय के कुलपति डॉ. मोहनलाल छीपा ने ‘स्वदेशी अर्थ-व्यवस्था, औद्योगीकरण तथा धारणक्षम विकास’ पर केन्द्रित सत्र की अध्यक्षता करते हुए कही। लोक-मंथन के दूसरे दिन केवल ज्ञान कक्ष में इस विषय पर पहला समानान्तर सत्र हुआ। मुख्य वक्ता के रूप में आईआईटी मुंबई के प्रो. वरद बापट, तमिलनाडु से मैनेजमेंट के प्रो. पी कनगसभापति और बिरला इंस्टीट्यूट ऑफ सोशल साइंस से प्रो. एन.एन. शर्मा उपस्थित थे। सत्र की शुरुआत में प्रो. बापट ने अर्थ-व्यवस्था की दो मुख्य धाराओं - पूँजीवाद और समाजवाद के बारे में अपनी बात रखी। उन्होंने कहा कि शोषण मुक्त समाज बनाते-बनाते दरअसल मानवीय मूल्य और धर्म मुक्त समाज बनाया जाने लगा, जो आखिरकार घातक सिद्ध हुआ। उन्होंने अपनी प्रस्तुति में साझा किया कि भारतीय संस्कृति में पारिवारिक स्तर पर जिस तरह से अर्थ-व्यवस्था संतुलित की जाती रही है, उस पर पूँजीवादी और समझवादी अर्थ-व्यवस्था का गहरा प्रभाव पड़ा है। भारत में बचत की दर आज भी 30 प्रतिशत है, जो किसी भी अन्य देश से अधिक है। उन्होंने कहा कि भारत के सांस्कृतिक मूल्यों में अर्थ-व्यवस्था हमेशा मजबूत रही और रहेगी क्योंकि ये हमारी जीवन शैली से जुड़ी हुई है।
प्रो. पी. कनग सभापति ने कहा कि हिंदुस्थान की अर्थ-व्यवस्था को मजबूत बनाए रखने का एक बड़ा श्रेय महिलाओं को जाता है। इस देश में हर घर में सोने पर निवेश से लेकर बचत करने तक की परंपरा महिलाओं में विरासत के रूप में रही है। प्रो. कनगसभापति ने अर्थ-व्यवस्था के साथ-साथ औद्योगीकरण और धारणक्षम विकास के अनेक उदाहरण प्रस्तुत किए और इन सभी में गाँवों में कार्य कर रहे छोटे-छोटे समुदायों का भी जि़क्र किया। उन्होंने अपने वक्तव्य में हिंदुस्तान के कई लघु औद्योगिक समूहों के उदाहरण प्रस्तुत किए।

अंतिम वक्ता प्रो. एन.एन. शर्मा ने धारणक्षम विकास और औद्योगीकरण को पूर्ण रूप से स्वदेशी बताया। उन्होंने कहा कि पूँजीवादी या समाजवादी तंत्र पूरे विश्व की अर्थ-व्यवस्था का मॉडल नहीं हो सकता। हर देश की अपनी संस्कृति होती है जो उस देश की हर व्यवस्था के साथ तालमेल बनाती हैद्य भारत की संस्कृति अपने आप में इतनी मजबूत है जिसके आधार पर सभी तंत्र बेहतर काम कर सकते हैं। यदि इस संस्कृति के साथ अन्य तंत्र को लागू किया जाएगा तो वह काम नहीं करेगा। सभी समस्याओं के समाधान के लिए उन्होंने एक उपाय बताते हुए कहा कि भारत में अर्थ-व्यवस्था का सबसे बेहतर मॉडल होगा जब धर्म की दृष्टि से अर्थ का उपयोग किया जाएगा, यानी अर्थ का न अभाव हो और न ही प्रभाव हो।

Updated : 2016-11-14T05:30:00+05:30
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