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भूख से निपटने की चुनौती

ग्लोबल हंगर इंडेक्स (जीएचआई) की ताजी रिपोर्ट चौंकाने वाली है। दुनिया के देशों के बीच भारत की छवि एक ऐसे देश की है जिसकी अर्थव्यवस्था तेजी से बढ़ रही है। लेकिन तेजी से बढ़ती अर्थव्यवस्था वाले इस देश की एक सच्चाई यह है कि यहां के बच्चे भुखमरी के शिकार हैं। रिपोर्ट के अनुसार, दुनिया में भुखमरी से प्रभावित देशों की संख्या 118 है और भारत का नाम इसमें 97वें नंबर पर है। रिपोर्ट इसलिए भी चिंताजनक ह क्योंकि इसमें भारत को गंभीर श्रेणी में रखा गया है। इसका अर्थ यह हुआ कि देश में भुखमरी के बदतर हालात हैं। इस रिपोर्ट से यह आशय नहीं निकाला जाना चाहिए कि देश में कुपोषण रोकने के लिए कोई कदम नहीं उठाए जा रहे हैं। दरअसल जीआईसी अपनी रिपोर्ट तैयार करने के लिए कई पैमानों पर सूचनाओं को एकत्र करता है और गहन विश्लेषण के बाद इसे जारी करता है। भुखमरी और कुपोषण से केवल भारत ही पीडि़त नहीं है, बल्कि हमारे पड़ोसी देश पाकिस्तान के हालात तो हमसे भी बदतर हैं। पाकिस्तान को इस सूची में 107वां स्थान मिला है। सबसे ज्यादा आबादी वाला देश चीन भी इस सूची से स्वयं को बचा नहीं पाया है। चीन को ग्लोबल हंगर सूचकांक की सूची में 20वें स्थान पर रखा गया है। ग्लोबल सूचकांंक स्कोर ज्यादा होने का मतलब है उस देश में भूख की समस्या अधिक है। उसी तरह किसी देश का स्कोर अगर कम होता है तो उसका मतलब है कि वहाँ स्थिति बेहतर है। इसे नापने के चार मुख्य पैमाने हैं - कुपोषण, शिशुओं में भयंकर कुपोषण, बच्चों के विकास में रुकावट और बाल मृत्यु दर। इस तरह के सर्वेक्षण की शुरुआत इंटरनेशनल फूड पॉलिसी रिसर्च इंस्टीट्यूट ने की थी और वेल्ट हंगरलाइफ नामक एक जर्मन स्वयंसेवी संस्थान ने इसे सबसे पहले वर्ष 2006 में जारी किया था। वर्ष 2007 से इस अभियान में आयरलैंड का भी एक स्वयंसेवी संगठन शामिल हो गया।

ग्लोबल हंगर सूचकांक हर साल ताजा आंकड़ों के साथ जारी किया जाता है। इसमें विश्व भर में भूख के खिलाफ चल रहे अभियान की उपलब्धियों और नाकामियों को दर्शाया जाता है। रिपोर्ट में कहा गया है कि भारत में 39 प्रतिशत बच्चे अविकसित हैं जबकि आबादी का 15.2 प्रतिशत हिस्सा कुपोषण का शिकार है। इस सूचकांक में भारत का स्कोर 28.5 है। जो विकासशील देशों की तुलना में काफी अधिक है। सूचकांक में विकासशील देशों का औसत स्कोर 21.3 है। देश में कुपोषण, बाल मृत्युदर और भ्रूण हत्या की रोकथाम के लिए बड़े पैमाने पर अभियान चलाया जा रहा है, ऐसे में ग्लोबल हंगर सूचकांक में सामने आए आंकड़े को एक सबक के तौर पर लेना होगा और यह देखना होगा कि इस अभियान में चूक कहां हो रही है। बेहतर होगा हम इस तरह के अभियान को पेशेवर अंदाज में चलाएं क्योंकि जिस तरह से सरकारी ढर्रे पर ये अभियान चलाया जा रहा है वह लक्ष्य को हासिल करने के लिए पर्याप्त नहीं है। भूख के खिलाफ लडऩे के लिए हमें अपने तौर -तरीकों को बदलना होगा बल्कि इस चुनौती से निपटने के लिए जन सहयोग से जमीनी स्तर पर कदम बढ़ाने होंंगे।

Updated : 2016-10-15T05:30:00+05:30
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