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बीएसएफ विधेयक पर फिर हुई सरकार की किरकिरी

बीएसएफ विधेयक पर फिर हुई सरकार की किरकिरी
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$img_titleनई दिल्ली।
संप्रग सरकार ने राज्यों में भी सीमा सुरक्षा बल [बीएसएफ] की तैनाती के लिए कानून में संशोधन के तमाम तर्क दिए, लेकिन राज्यसभा में विपक्ष के साथ घटक एवं सहयोगी दलों की एकजुटता के आगे उसकी एक नहीं चली। मजबूर होकर सरकार को अपने कदम वापस खींचने पड़े और वह चाह कर भी सीमा सुरक्षा बल [संशोधन] विधेयक पर चर्चा कराने में नाकाम रही, जिससे विधेयक को आगे के लिए टालना पड़ गया।


राज्यसभा में गुरुवार को गृह मंत्री पी. चिदंबरम की ओर से सीमा सुरक्षा बल [संशोधन] विधेयक पेश करने के पहले ही नेता विपक्ष अरुण जेटली ने इस मुद्दे को उठा दिया। उन्होंने कहा कि सरकार जब राष्ट्रीय आतंकवाद रोधी केंद्र [एनसीटीसी] समेत आंतरिक सुरक्षा के दूसरे सभी सवालों पर आगामी 18 अप्रैल को मुख्यमंत्रियों की बैठक करने जा रही है, तो फिर इस विधेयक को भी उनकी राय जानने तक के लिए टाल दिया जाना चाहिए। भाजपा के साथ माकपा, जदयू और सरकार के घटक दल तृणमूल कांग्रेस और उसे बाहर से समर्थन दे रही सपा और बसपा के सदस्यों ने भी इसी तरह की पैरवी की। सदस्यों ने प्रस्तावित एनसीटीसी का हवाला देते हुए संघीय ढांचे व केंद्र-राज्यों के संबंधों का भी सवाल उठाया। उप सभापति के रहमान खान ने इस मसले को लेकर शोर-शराबे को किसी तरह शांत कराया।

भोजनावकाश के बाद सदन की कार्यवाही शुरू होते ही गृह मंत्री ने सीमा सुरक्षा बल कानून में संशोधन की अहमियत पर रोशनी डाली। उन्होंने कहा कि कानून में प्रावधान है कि इस बल को सीमावर्ती क्षेत्रों के अलावा और कहीं तैनात नहीं किया जा सकता। ऐसा ही प्रावधान भारत-तिब्बत सीमा पुलिस एवं कुछ दूसरे अ‌र्द्धसैनिक बलों के कानून में है। जबकि जरूरत पड़ने पर उन्हें दूसरे स्थानों पर भी तैनात करने नौबत आती है।

गृह मंत्री ने यह भी स्पष्ट किया कि अगर कोई राज्य सरकार अपने अंदरुनी हिस्से में सीमा सुरक्षा बल की तैनाती नहीं चाहेगी तो केंद्र उसे वहां नहीं भेजेगा। इससे राज्यों के अधिकारों का कोई हनन नहीं होगा।

गृह मंत्री को सुनने के बाद भी नेता विपक्ष अरुण जेटली, माकपा के प्रशांत चटर्जी, तृणमूल कांग्रेस के सुखेंदु शेखर रॉय, सपा के प्रो. रामगोपाल यादव, बसपा के सतीशचंद्र मिश्र, माकपा के आरसी सिंह और जदयू के शिवानंद तिवारी समेत दूसरे सदस्य भी मुख्यमंत्रियों की राय जानने के बाद ही इस पर चर्चा कराने पर जोर देते रहे। सदस्यों के अडिग रुख को देखते हुए गृह मंत्री ने कहा कि वह सदन का फैसला मानने को तैयार हैं। उसके बाद उप सभापति ने विधेयक को आगे के लिए टाल दिया।

Updated : 2012-03-30T05:30:00+05:30
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