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इस मेले का इतिहास है 900 साल पुराना, 27 से होगा आगाज

-रानी मल्हना के कजलियों के डोले रक्षाबंधन के दिन लूटे जाने पर हुआ था भीषण युद्ध

इस मेले का इतिहास है 900 साल पुराना, 27 से होगा आगाज
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महोबा। उत्तर प्रदेश के महोबा जिले में कजली महोत्सव की ख्याति पूरे देश में है। इसका इतिहास भी नौ सौ साल पुराना है। बुन्देलखण्ड की भूमि में तीन दिवसीय कजली मेला पुरानी सभ्यता और संस्कृति का प्रतीक है जिसका आगाज रक्षाबंधन के पर्व पर होगा। पहले दिन बांदा, हमीरपुर, चित्रकूट, छतरपुर, टीकमगढ़, पन्ना, दतिया व ग्वालियर सहित कई इलाकों से भारी भीड़ जुटेगी। इस एतिहासिक मेले की तैयारी पूरी कर ली गयी है।

जिले में तीन दिवसीय कजली मेले का आगाज रक्षाबंधन पर्व के अगले दिन भादों मास की प्रतिपदा को कीरत सागर के तट पर होगा। यह कजलियों व भुजरियों का मेला नाम से भी विख्यात है। यह मेला चंदेल शासक परमाल और इनके वीर सामंत आल्हा ऊदल से सम्बन्ध रखता है। जगननिक कत लोकप्रिय काव्य आल्हा खण्ड में भी कीरत सागर पर भुजरियों के विसर्जन के दौरान पृथ्वीराज चौहान से हुये भीषण संग्राम का अनोखा वर्णन है। महोबा के राजा परमाल ने अपने वीर योद्धा आल्हा ऊदल को राज्य से निष्कासित कर दिया था। दोनों वीर योद्धा कन्नौज चले गये थे। एतिहासिक पन्ने पलटने पर पता चलता है कि वर्ष 1182-83 में बुन्देलखण्ड के महोबा के चंदेल राजा परमाल से दिल्ली पति पृथ्वीराज चौहान से मतभेद होने और उरई के नरेश माहिल के उकसाने के कारण पृथ्वीराज चौहान ने उस समय महोबा को चारों ओर से घेराबंदी कर हमला कर दिया था। जब रक्षाबंधन पर्व की लोग तैयारी कर रहे थे। पृथ्वीराज चौहान के युद्ध के खतरे की चिंता न करती हुयी रानी मल्हना व राजकुमारी चन्द्रावल ने कीरत सागर पर रक्षाबंधन पर्व मनाने का फैसला किया। 1800 डोलों में कजलियों के समूहों के साथ रानी मल्हना अपने महल से वीरांगना सखियों के साथ कजली खोटनें कीरत सागर तट पहुंची तभी दिल्ली पति पृथ्वीराज चौहान के सेनापति चामुण्डायराय ने एक सैन्य टुकड़ी को लेकर कजली के तमाम डोले लूट लिये तथा वह डोले महोबा के पश्चिम छोर पचपहरा गांव में अपने शिविर ले गया। रानी के डोले लूटने की खबर पाते ही कन्नौज से वीर योद्धा आल्हा ऊदल महोबा आये और अभई, रंजित, सैय्यद व लाखन ढेबा के साथ मिलकर पृथ्वीराज चौहान के सेनापति चामुण्डाराय को चारों ओर से घेरकर आक्रमण कर दिया था। इन वीर योद्धाओं ने कसम भी खायी थी कि जब तक रानी के लूटे गये डोले वापस नहीं लायेंगे तब तक रक्षाबंधन पर्व नहीं मनाया जायेगा। पूरे दिन पचपहरा गांव में भीषण संग्राम हुआ जिसमें वीर योद्धा आल्हा ऊदल के हाथों सेनापति चामुण्डाराय पराजित हुआ। वीर योद्धा लूटे गये कजली के डोले वापस लाये। रक्षाबंधन पर्व के अगले दिन रानी मल्हना ने कजली के डोलों का कीरत सागर में विसर्जन कर धूमधाम से पर्व मनाया। इस एतिहासिक घटना के बाद से ही कजली खोटने के त्यौहार को रक्षाबंधन पर्व के अगले दिन मनाने की परम्परा शुरू हुई जो नौ साल बाद भी जारी है।

Updated : 2018-08-24T21:17:51+05:30
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Swadesh Digital

स्वदेश वेब डेस्क www.swadeshnews.in


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