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प्रचार की लड़ाई में भाजपा सबसे आगे, तीसरे पायदान पर गठबंधन

प्रचार की लड़ाई में भाजपा सबसे आगे, तीसरे पायदान पर गठबंधन
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लखनऊ। लोकसभा चुनाव को लेकर सियासी दलों के वरिष्ठ नेता जहां धुंआधार प्रचार में लगे हुए हैं। वहीं आरोप-प्रत्यारोप की लड़ाई भी दिनों-दिन तेज होती जा रही है। इन सबके बीच अगर प्रदेश में भाजपा, कांग्रेस और सपा-बसपा-रालोद गठबंधन के प्रचार की लड़ाई पर नजर डालें तो भाजपा शुरुआत से ही अपने विरोधियों से कहीं आगे है। कांग्रेस को चुनावी मोड पर आने में जहां वक्त लगा वहीं गठबंधन उससे भी पीछे नजर आया। ऐसे में प्रचार की शुरुआती लड़ाई में भगवा खेमा आगे निकलता नजर आ रहा है।

प्रदेश में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने नौ जनवरी को ही आगरा में रैली कर इसकी शुरुआत कर दी थी। उसके बाद से वे वाराणसी (19 फरवरी), मेरठ (28 मार्च) और सहारनपुर के नानौता में (5 अप्रैल) को जनसभाएं कर चुके हैं। मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ तो पूरे प्रदेश के अधिकांश लोक सभाओं में जा चुके हैं। कुछ जगहों पर तो वे दो से तीन बार जाकर जनसभा कर चुके हैं। आचार संहिता लागू होने से पहले भी वह बेहद प्रभावी तरीके से केन्द्र और प्रदेश सरकार की जनकल्याणकारी योजनाओं का हवाला देते हुए विपक्ष पर दबाव बनाने में सक्रिय रहे।

इसके अलावा पार्टी युवाओं को केन्द्रित करते हुए सोशल मीडिया पर भी काफी पहले से अपने पक्ष में माहौल बनानी दिखी। दरअसल भाजपा रणनीतिकार शुरूआत से ही उत्तर प्रदेश में 73 प्लस का नारा दे रहे थे। तभी से साफ हो गया कि यहां उसके सहयोगी दलों सुभासपा और अपना दल (सोनेलाल) की बहुत बड़ी भूमिका नहीं होगी। वह 2014 की तरह इस बार भी यूपी पर ध्यान केन्द्रित करेगी। वहीं प्रधानमंत्री के चेहरे के रूप में नरेन्द्र मोदी को लेकर किसी प्रकार का संशय नहीं था। इसलिए पार्टी कार्यकर्ता लगातार जनता के बीच जाकर सम्पर्क करते रहे।

उधर कांग्रेस का संगठन बेहद कमजोर होने के कारण उसे प्रदेश में बड़े नाम की दरकार थी। इसलिए जब प्रियंका गांधी को कांग्रेस महासचिव बनाया गया तो कार्यकर्ताओं में उत्साह नजर आया। इसके बाद प्रियंका कई जगह नुक्कड़ सभा, रोड शो कर चुकी हैं। इसे राजनीतिक विश्लेषक पार्टी की स्थिति में सुधार के तौर पर तो देख रहे हैं। लेकिन संगठन के बेहद कमजोर होने के कारण उनका कहना है कि कांग्रेस को इसका बहुत फायदा नहीं मिल पायेगा। इसीलिए प्रियंका ने भी लखनऊ में अपनी पहली बैठक में 2022 का लक्ष्य केन्द्रित करने की बात कही।

इन सबकी तुलना में सपा-बसपा और रालोद का गठबंधन प्रचार की इस दौड़ में काफी पिछड़ता दिख रहा है और यह तीसरे पायदान पर है। काफी समय तक कांग्रेस के गठबधंन में शामिल होने की अटकलें लगायी जाती रहीं। बाद में तस्वीर साफ हुई। हालांकि सीटों का बंटवारा होने के बाद भी अखिलेश अमेठी और रायबरेली संसदीय क्षेत्र का हवाला देते हुए शुरुआत में कांग्रेस को गठबंधन का साथी बताने के बयान देते नजर आये, लेकिन मायावती के कड़े रुख के बाद अब वह भी पार्टी पर हमलावर हैं। ऐसे में काफी समय तक असमंजस की स्थिति रही। वहीं अभी तक सपा-बसपा और रालोद की संयुक्त रैली सिर्फ एक स्थान पर सात अप्रैल को सहारनपुर में हुई है। यह स्थिति तब है, जबकि तीनों पार्टियां सिर्फ यूपी तक ही सीमित हैं।

राजनीतिक विश्लेषकों का कहना है कि जिस तरह से गठबंधन प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी को सत्ता से बाहर करने की बात करता है, उसकी तुलना में इनकी रणनीति धरातल पर नजर नहीं आयी। भाजपा प्रचार-प्रसार की लड़ाई में पहले दिन से ही सबसे आगे दिखी। जबकि ये काम गठबंधन को करना चाहिए था। उन्हे उत्तर प्रदेश में ही मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ से ज्यादा रैली करनी चाहिए थी, क्योंकि तीनों के सामने अपना खोए जनाधार को खड़ा की चुनौती है। लेकिन ऐसा नजर नहीं आया।

हालांकि सपा नेताओं का कहना है कि ज्यादा रैलियां वे लोग करते हैं, जिन्हें हारने का डर होता है। गठबंधन वैसे ही जीत रहा है। वहीं बसपा नेताओं का कहना है कि रैलियों से कोई ज्यादा प्रभाव नहीं पड़ता। हम घर-घर जाकर चुनाव प्रचार में लगे हुए हैं। सपा-बसपा के कुछ नेताओं का ये भी कहना है कि संयुक्त रैलियों के लिए आपसी सहमति नहीं बन पा रही है। हर चरण में एक संयुक्त रैली कराने की कोशिश है।

उधर भाजपा के प्रदेश प्रवक्ता मनीष शुक्ला का कहना है कि भाजपा हमेशा जनता के बीच रहती है। पार्टी ने हर वर्ग के लिए काम किया है। इस कारण हम जनता के बीच जाकर उसे बता रहे हैं। विपक्ष के पास कुछ भी गिनाने के लिए नहीं है। वह सिर्फ लोगों को बरगलाने का काम जानता है। इस कारण विपक्ष सभाओं क्या गिनाएगा, यह समस्या उसके सामने है। यही कारण है कि वे रैलियां करने से कतरा रहे हैं।

वहीं मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ कहते हैं कि एक सिरे से जनता ने प्रदेश में गठबंधन को खारिज किया है। गठबंधन अराजकता, भ्रष्टाचार और राजनीतिक अस्थिरता का प्रतीक है। यह प्रदेश के भविष्य के साथ खिलवाड़ करने वाला है। इसलिए राज्य की जनता इसे स्वीकार नहीं करेगी। योगी आदित्यनाथ कहते हैं कि इन दलों का भाजपा से अलग-अलग मुकाबला करने का सामर्थ्य नहीं है। वहीं जब इन्हें यकीन हो गया कि ये अपने परम्परागत वोट एक दूसरे को शिफ्ट नहीं कर सकेंगे, तो इन्होंने अब मुस्लिम कार्ड खेला है। इसका भी इन्हें कोई फायदा नहीं मिलेगा।

Updated : 9 April 2019 6:45 PM GMT
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Swadesh Digital

स्वदेश वेब डेस्क www.swadeshnews.in


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