Top
Home > राज्य > उत्तरप्रदेश > लखनऊ > शब्द ब्रह्म को साकार कर काल के कपाल पर शाश्वत होने की नियति लिखी

शब्द ब्रह्म को साकार कर काल के कपाल पर शाश्वत होने की नियति लिखी

अमित श्रीवास्तव

शब्द ब्रह्म को साकार कर काल के कपाल पर शाश्वत होने की नियति लिखी
X

लखनऊ। नियति जब इतिहास के कालजयी व्यक्तित्वों को गढ़ती है तो वह परीक्षा लेती है, प्रवाहमयी बनाकर, थपेड़े खिलाकर और कुंदन बनाने वाली जलने की पीड़ा पहुंचाकर। कुछ राह से भटकते हैं, कुछ अटकते हैं और कुछ कहते हैं, पथ के आवर्तों से थककर जो बैठ गया आधे पथ पर, उस नर को राह दिखाना मेरा दृढ़ निश्चय। ये पंक्तियां कहने वाला व्यक्तित्व ही परीक्षा में उत्तीर्ण होकर अटल बिहारी बाजपेयी कहलाता है।

भारत रत्न अटल जी के विषय में राजनीतिक फलक व्योम सा जितना विशाल है, एक कवि, लेखक और पत्रकार के रूप में उनके आकाश की ऊंचाई उससे भी अधिक है। चंबल के आंचल च्वालियर की धरा पर जन्म लेने वाले अटल जी चंबल के पानी के उस आग को अपने सीने में रखकर बड़े हुये। यह आग जो आज भी जमीन पर खड़ा होकर शीर्ष के उस सिंहासन को चुनौती देने की ऊर्जा भरती है, जिसकी चूलें जनता की आह, अत्याचार, अनाचार पर बनायी गयी हों। चंबल के पानी की वह तासीर लिये जब वे कानपुर अध्ययन के लिए आये और गंगा के शीतल जल को पिया तो वह आग धीरता, वीरता और संवेदनशीलता में परिवर्तित होकर भारत माता की सेवा का जीवन लक्ष्य बन गयीं।

यह लक्ष्य लिये अटल जी लखनऊ की धरा पर आये। लखनऊ की वो गलियां उनकी छाया का आज भी अनुभव करती हैं, जहां उन्होंने शब्द ब्रह्म को साकार कर काल के कपाल पर शाश्वत होने की नियति लिखी। शब्द ब्रह्म की साधना का उनका उद्देश्य मां भारती को परम वैभव के शिखर पर बिठाने के लाखों स्वयंसेवकों, करोड़ों देशवासियों के स्वर को शब्द देना, उनके शब्दों को लय देना और उनकी संवेदनाओं का शब्द चित्र बनाकर राष्ट्र निर्माण के पथ पर सेवाव्रती तैयार करना, प्रेरणा देना। महामनीषी पंडित दीन दयाल उपाध्याय जी ने 1952 में लखनऊ के ऐशबाग स्थित उस पुराने भवन में जब स्वदेश का प्रकाशन प्रारंभ किया तो उनकी इस यात्रा के साथी अटल जी बन गये और राष्ट्र प्रेम और सनातन राष्ट्र के पुनरुत्थान के ध्वज वाहक के रूप में स्वदेश के माध्यम से वैचारिक ज्योति पुंज को सकल जगत में पहुंचाने का अहर्निश कार्य को गति दी। इस ज्योति पुंज का प्रकाश सत्ता के अहंकारी प्रतीकों, अंधेरा पूजक व्यक्तियों को इस तरह जलाने लगा कि वे तिलमिला उठे। इसीलिए जब इंदिरा गांधी ने आपात काल लगाया तो स्वदेश पर प्रहार किया। पर शब्दों में गुंथे विचार ब्रह्मा होते हैं, अजर-अमर होते हैं। यह विचार यात्रा बढ़ती गयी और अटल जी ने राष्ट्रधर्म मासिक के संपादक के रूप में आधुनिक भारत के पुनर्जागरण के लिए असंख्य मशाल तैयार कर दिये।

ऐशबाग के उस प्राचीन भवन की दीवारें आज भी पंडित दीन दयाल उपाध्याय और अटल जी की तपस्या, साधना और निर्विकार लक्ष्य के प्रति समर्पण की साक्षी हैं। उस भवन के निकट ही एक बुजुर्ग दीवारों को देखकर कहते हैं, ये भवन नहीं, युग निर्माण की साधना स्थली है, जहां तपस्वियों ने अपने जीवन की आहुति दी है, राष्ट्र धर्म की पुनस्र्थापना के लिए। उनकी आंखें उस समय को याद कर अश्रुपूरित हो जाती हैं और कहने लगती हैं, हां हमने देखा है भारत माता के स्वर्णिम युग के निर्माण के लिए नींव के पत्थर बनते हुए दीन दयाल जी को, अटल जी को। कहते हैं, पांच बार लखनऊ के सांसद रहने के दौरान अटल जी से कई बार भेंट हुयी, एक बार तो तब भी भेंट हुयी जब वे प्रधानमंत्री थे। पर हर बार अटल जी की आंखों में, बातों में, भारत माता को परम वैभव के शिखर पर पहुंचाने का वही लक्ष्य, अंत्योदय के मंत्र को साकार करने का वही स्वप्र और इनकी प्राप्ति के लिए वही बेचैनी दिखी, जो स्वदेश में शब्द साधना करते समय दिखता था।

बात अटल जी की हो और लखनऊ के निराला नगर स्थित सरस्वती शिशु मंदिर का उल्लेख न हो, यह संभव नहीं। भला कौन भूल सकता है कि यहीं घंटों बैठकर राष्ट्र की उन्नति और भारत की जनता का दुर्दिन दूर करने के लिए घंटों उनका चिंतन-मनन करना, राष्ट्र की समस्याओं को देखकर बेचैन हो उठना और फिर दोगुनी ऊर्जा व उत्साह से संघर्ष करने के लिए स्वयं भी तैयार होना और सामने वाले को भी प्रेरित करते थे। वे स्वयं सिद्धांतवादी थे, पर प्रयोगधर्मी भी। उनके प्रधानमंत्रित्व काल में सिद्धांत और प्रयोगधर्मिता के मिश्रण का परिणाम पूरे विश्व ने देखा और माना कि कैसे पांच-सात वर्षों में ही एक उपेक्षित, गरीब, कमजोर और पिछड़ा कहा जाने वाला देश विश्व के शक्तिशाली देशों की आंख में आंख डालकर न केवल बात करने लगा, बल्कि विश्व भारत की शक्ति, सामथ्र्य और संभावना को मान्यता देने को विवश हुआ। यह अटल जी जैसा कालजयी व्यक्तित्व ही कर सकता है कि एक ओर लोकतंत्र को बचाने के लिए आपात काल में सामंतवाद के विरुद्ध संघर्ष छेड़ दे और दूसरी ओर राजशाही प्रजा पालक दिखे तो उसके लिए सबकुछ समर्पित कर दे। लोकतंत्र की हत्या करने वाली इंदिरा गांधी के विरुद्ध जहां अटल जी चट्टान की तरह न केवल अडिग रहे, बल्कि संघर्ष को उस स्तर तक ले जाने वाले वीरों की पहली पंक्ति में अति सक्रिय रहे, जहां इंदिरा के अत्याचार और अहंकार को खंड-खंड होना पड़ा। तो वहीं दूसरी ओर प्रजापालक ममतामयी राजमाता विजयाराजे सिंधिया की राजशाही को प्रणाम कर उन्हें ही लोकतंत्र का संरक्षक बना लिया। ऐसी सिद्धांतवादी प्रयोगधर्मिता तो अटल जी ही कर सकते हैं।

लखनऊ शहर की हर गली अपने लोकप्रिय सांसद रहे अटल जी की कोई न कोई यादें संजोये हुए है। हृदयस्थल हजरतगंज के हनुमान मंदिर में प्रधानमंत्री के रूप में दर्शन करने वाले अटल जी की सादगी वहां के पुजारी की आंखों में आज भी बसी है। प्रधानमंत्री बनने के बाद भी किसी पुराने परिचित के यहां जाकर हंसी-ठहाके का दौर चलाना, भला कैसे भूलेगा यह शहर। राजनीति के शिखर पुरुष की वो स्मृतियां फिजाओं में महकती रहेंगी, सदियों, युगों तक। स्मृति पटल पर सदा अंकित रहेगा, भारत माता के ममता के आंचल में पूरे विश्व को आनंद व समृद्धि दिलाने के उनके सपने, उनके व्यक्तित्व और कृतित्व सदा अनुप्राणित करते रहेंगे।


Updated : 2018-08-17T07:39:44+05:30
Tags:    

Swadesh Digital

स्वदेश वेब डेस्क www.swadeshnews.in


Next Story
Share it
Top