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अटल जी की लखनऊ जन्मभूमि तो नहीं थी लेकिन कर्मभूमि जरूर थी

स्व. अटल बिहारी वाजपेयी की स्मृतियों को सूबे में संजोएगी योगी सरकार

अटल जी की लखनऊ जन्मभूमि तो नहीं थी लेकिन कर्मभूमि जरूर थी
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अजय श्रीवास्तव/लखनऊ। पूर्व प्रधानमंत्री तथा बलरामपुर के बाद लखनऊ से भारतीय जनता पार्टी के सांसद रहे स्वर्गीय अटल बिहारी वाजपेयी की स्मृतियों को प्रदेश में संजोने का काम योगी आदित्यनाथ सरकार करेगी। उनका प्रदेश की राजधानी से रिश्ता काफी लंबा तथा बेहद करीबी था। स्व. अटल जी ने 25 अप्रैल 2007 को राजधानी लखनऊ के कपूरथला चौराहे पर भाजपा उम्मीदवारों के समर्थन में एक चुनावी सभा को संबोधित किया था और उसके बाद उनका लखनऊ से नाता टूट गया था। वर्ष 2007 के विधानसभा चुनाव में वह वोट डालने भी लखनऊ नहीं आ पाए थे।

बताते चलेंकि पूर्व प्रधानमंत्री भारत रत्न स्व. अटल बिहारी वाजपेयी के निधन पर पूरा देश शोकाकुल है। वैसे तो अटल बिहारी वाजपेयी देश के सर्वमान्य नेता रहे लेकिन उनका उत्तर प्रदेश से खासा ही लगाव। उनका जन्म 25 दिसंबर 1924 को भले ही ग्वालियर में हुआ था लेकिन उनका पैतृक घर आगरा के बटेश्वर में है। अटल बिहारी वाजपेयी के निधन के बाद से उत्तर प्रदेश की योगी आदित्यनाथ सरकार ने उत्तर प्रदेश से जुड़ी उनकी सभी स्मृतियों को संजोने का एेलान किया है। मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने उन्हें श्रद्धांजलि देते हुए कहा अटलजी का गांव आगरा के बटेश्वर में है इसके साथ ही वह कानपुर के डीएवी कॉलेज में पढ़े। प्रदेश के बलरामपुर से पहली बार सांसद बने और लखनऊ से बतौर सांसद प्रधानमंत्री बने। उत्तर प्रदेश सरकार उनकी उप्र से जुड़ी हर स्मृतियों को सदा के लिए संजोकर रखेगी। सनद रहे कि स्वर्गीय अटल बिहारी वाजपेयी ने 1942 में कानपुर से राजनीति शास्त्र में एमए की डिग्री हासिल की और यहीं से संघ के संपर्क में आए। इसी के बाद 1947 में वह लखनऊ और उत्तर प्रदेश के होकर रह गए। जनसंघ की स्थापना के बाद 1957 में बलरामपुर से लोकसभा का चुनाव लड़ा। पहली बार संसद पहुंचे। इसके बाद उन्होंने यहां से तीन बार चुनाव लड़ा। 1962 में उन्हें हार का सामना करना पड़ा। 1967 में एक बार फिर लोकसभा के लिए चुने गए। इमरजेंसी के बाद अटलजी ने राजधानी लखनऊ को अपनी कर्मभूमि बनाया और 2004 तक लगातार यहां से सांसद रहे। नवाबी शहर लखनऊ से स्वर्गीय अटल बिहारी वाजपेयी से रिश्ता सात दशक पुराना रहा। यहां की गलियां, चौराहे, सत्ता के गलियारे अटल की सभाओं, बैठक, आवाजाही के गवाह रहे हैं। कहीं माइक लेकर अकेले ही अमीनाबाद के झंडे वाले पार्क में भीड़ को संबोधित करते दिखते थे अटल तो कभी चौक की प्रसिद्ध राजा ठंडई की दुकान पर साथियों के साथ देर शाम बैठक करते। कभी गोमती नदी में नाव पर सैर करते दिखते तो कभी साइकिल से सैर करते दिखते। अटल बिहारी वाजपेयी 1947 में ग्वालियर से लखनऊ आए। यहीं से वह पत्रकार और फिर आगे चलकर राजनेता बने। इसी बीच कविता लेखन तथा पाठ का दौर भी जारी रहा। उन्हें लखनऊ से ही प्रकाशित राष्ट्रधर्म पत्रिका के संपादन की जिम्मेदारी मिली। लखनऊ में कोई ठिकाना नहीं था। अटल कुछ समय अपने सहयोगी बजरंग शरण तिवारी के घर पर रहे। इसके बाद कुछ वक्त वह किसान संघ भवन में भी रुके। अपने मित्र कृष्ण गोपाल के घर पर गन्ने वाली गली में रहे। लखनऊ से सांसद बनने के बाद अटल जी काफी वक्त मीराबाई मार्ग के विधायक गेस्ट हाउस में रहे। इसके बाद में उन्हें ला प्लास कॉलोनी में आवास आवंटित हो गया। अब सूबे की योगी आदित्यनाथ सरकार अटल जी से जुड़ी इन सभी स्मृतियों को सदा के लिए संजोने की तैयारी में लगी है।

सनद रहे कि स्व. अटल जी की लखनऊ जन्मभूमि तो नहीं थी लेकिन कर्मभूमि जरूर थी। मलिन बस्तियों तक विकास की गंगा बहाने वाले अटल जी ने पुराने शहर को भी नहीं भूला था। पुराने लखनऊ से उनका खासा नाता था। भाजपा से गुरेज रखने वाले मुसलमानों को अटल जी नहीं चुभते थे। यह अटल जी का ही जादू था कि लोकसभा चुनाव की वैतरिणी पार करने के लिए वर्ष 2009 के लोकसभा चुनाव में लालजी टंडन को उनकी खड़ाऊ संदेश का सहारा लेना पड़ा था। यह संदेश भी भाजपा के लिए जादूई करिश्मा साबित हुआ था। चुनावी सभा में भाजपा को हवा देने वाले अटल बिहारी वाजपेयी और लखनऊ के बीच खासा नाता हो गया था। मुस्लिम परिवारों तक उनकी छाप थी। जनसंघ के समय से लखनऊ को अपनी कर्मभूमि बनाने वाले अटल बिहारी वाजपेयी के नवाबी शहर में कई ठिकाने भी बन गए थे। 40 कैंट रोड पर विश्व हिन्दू परिषद के नेता पुरूषोत्तम दास भार्गव के घर उनका खास आना जाना था। वहां वह कार्यकर्ताओं से भी मिलते थे। अपना पहला चुनाव भी उन्होंने भार्गव के घर से लड़ा था। दीनदयाल उपाध्याय के साथ जब अटल बिहारी वाजपेयी ने अखबार निकाला तो कागज के व्यवसायी पुरूषोत्तम दास भार्गव ही उन्हें कागज उपलब्ध कराते थे। पुराना किला में स्मृति भवन में भी अटल जी प्रवास करते थे और निकाय चुनाव की मतदाता सूची में आज भी उनका नाम इसी पते पर दर्ज है। अटल जी ने 25 अप्रैल 2007 को कपूरथला चौराहे पर भाजपा उम्मीदवारों के समर्थन में एक चुनावी सभा को संबोधित किया था और उसके बाद उनका लखनऊ से नाता टूट गया था। वर्ष 2007 के विधानसभा चुनाव में वह वोट डालने भी लखनऊ नहीं आ पाए थे। नवल किशोर रोड पर विष्णु नारायण इंटर कॉलेज उनका मतदान केंद्र था। स्वास्थ्य ठीक न होने के कारण अटल बिहारी वाजपेयी ने वर्ष 2009 का लोकसभा चुनाव नहीं लड़ा था। लोकसभा चुनाव में देश में कमल खिलाने में अटल बिहारी वाजपेयी इतने व्यस्त हो जाते थे कि उन्हें अपनी लोकसभा याद ही नहीं रहती थी। उनका चुनाव तो असल में कार्यकर्ता ही लड़ते थे। चुनाव में दो दिन ही वह लखनऊ को देते थे।

Updated : 2018-08-18T17:57:41+05:30
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Swadesh Digital

स्वदेश वेब डेस्क www.swadeshnews.in


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