35 साल से कम उम्र के गैर-शराबी युवाओं में फैटी लिवर तेजी से बढ़ रहा है। डॉक्टरों के अनुसार खराब लाइफस्टाइल, तनाव और डाइट इसके मुख्य कारण हैं।
भारत में अब फैटी लिवर सिर्फ शराब पीने वालों या उम्रदराज लोगों की बीमारी नहीं रह गई है। तेजी से 20 से 35 साल की उम्र के युवा भी इसकी चपेट में आ रहे हैं, जिनमें कई लोग शराब का सेवन भी नहीं करते। डॉक्टरों के अनुसार यह एक “साइलेंट लेकिन खतरनाक” लाइफस्टाइल डिजीज बनती जा रही है।
चिंताजनक बात यह है कि यह बीमारी अक्सर बिना किसी लक्षण के सामने आती है और सामान्य हेल्थ चेकअप में अचानक पता चलती है। विशेषज्ञ इसे मेटाबॉलिक डिसफंक्शन-एसोसिएटेड स्टीटोटिक लिवर डिजीज (MASLD) से जोड़कर देख रहे हैं, जो तेजी से युवाओं में बढ़ रही है।
35 साल से कम उम्र में बढ़ता खतरा
डॉक्टरों का कहना है कि पिछले कुछ सालों में 35 साल से कम उम्र के मरीजों में फैटी लिवर के मामले तेजी से बढ़े हैं। शहरी जीवनशैली और बदलती खाने-पीने की आदतें इसके बड़े कारण माने जा रहे हैं। लंबे समय तक बैठकर काम करना, कम फिजिकल एक्टिविटी और स्क्रीन टाइम का बढ़ना लिवर पर सीधा असर डाल रहा है
खराब डाइट और शुगर सबसे बड़ा कारण
विशेषज्ञों के अनुसार प्रोसेस्ड फूड, जंक फूड और मीठे पेय पदार्थ फैटी लिवर के सबसे बड़े कारण हैं। ज्यादा शुगर और रिफाइंड कार्बोहाइड्रेट शरीर में इंसुलिन रेजिस्टेंस बढ़ाते हैं, जिससे लिवर में फैट जमा होने लगता है आजकल युवाओं में मोटापा और पेट की चर्बी भी तेजी से बढ़ रही है, जो इस बीमारी को और गंभीर बना रही है।
तनाव और नींद की कमी भी जिम्मेदार
आधुनिक जीवनशैली में तनाव और नींद की कमी भी बड़ा कारण बनकर उभर रहे हैं। डॉक्टर बताते हैं कि अनियमित नींद और लगातार मानसिक दबाव हार्मोनल बैलेंस को बिगाड़ देता है, जिससे लिवर पर असर पड़ता है। वर्क कल्चर और नाइट शिफ्ट की वजह से युवा इस जोखिम के दायरे में ज्यादा आ रहे हैं।
बिना लक्षण के बढ़ रही बीमारी
फैटी लिवर की सबसे बड़ी चुनौती यह है कि यह शुरुआत में कोई संकेत नहीं देता। कई मरीजों को तब पता चलता है जब बीमारी काफी आगे बढ़ चुकी होती है, डॉक्टरों का कहना है कि अगर समय रहते ध्यान न दिया जाए तो यह समस्या आगे चलकर लिवर फाइब्रोसिस, सिरोसिस और हार्ट डिजीज का कारण बन सकती है।
रोकथाम ही सबसे बड़ा इलाज
विशेषज्ञों के मुताबिक इस बीमारी से बचने के लिए लाइफस्टाइल में बदलाव बेहद जरूरी है. नियमित एक्सरसाइज, हेल्दी डाइट, कम शुगर और पर्याप्त नींद इसके खतरे को काफी हद तक कम कर सकते हैं। शुरुआती स्टेज में जांच कराना भी बेहद जरूरी है, खासकर उन लोगों के लिए जो डेस्क जॉब करते हैं।