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युवा आंदोलनों का विश्लेषण

युवा आंदोलनों की दिशा और वैचारिक परिप्रेक्ष्य

अतुल लिमये के अनुसार, युवा आंदोलनों की वैचारिक दिशा और उनके संगठनात्मक समर्थन का गहन अध्ययन जरूरी है। इसमें वामपंथी विचारधारा और सांस्कृतिक वर्चस्व का भी उल्लेख है।


युवा आंदोलनों की दिशा और वैचारिक परिप्रेक्ष्य 

आज के समय में जब सीजेपी से संबंधित आंदोलन सामने आया, तब यह बात और अधिक स्पष्ट होकर उभरी कि युवाओं के बीच कार्य करने वाले तथा राष्ट्रीय दृष्टिकोण के साथ सक्रिय संगठनों की प्रासंगिकता कितनी अधिक है।हाल में हुए इस आंदोलन का गंभीर अध्ययन किया जाना चाहिए। यह कोई अचानक घटित घटना नहीं है, बल्कि पिछले कई वर्षों से चल रही एक सतत प्रक्रिया का परिणाम प्रतीत होता है। यदि इसका सम्यक् अध्ययन करना है, तो इसके कालक्रम, कार्यप्रणाली, समर्थन तंत्र, अपनाए गए नवाचारों तथा इसके पीछे सक्रिय वैचारिक आधार का विश्लेषण आवश्यक है।

यदि इसके कालक्रम पर दृष्टि डालें, तो अभिजीत दिपके ने ऑनलाइन माध्यम से सीजेपी की शुरुआत की। प्रारंभिक दो-तीन दिनों में उसे व्यापक समर्थन मिला। इसके बाद वे भारत आए। 6 जून को भारत पहुंचे और 7 जून से आंदोलन प्रारंभ किया, किंतु उस समय अपेक्षित जनसमर्थन नहीं मिला। इसके बाद 7 जून से 19 जून तक वे देश के विभिन्न नगरों में गए और आंदोलन खड़ा करने का प्रयास किया, परंतु वहाँ भी विशेष प्रतिसाद नहीं मिला। अंततः 20 जून से जंतर-मंतर पर धरना आरंभ हुआ और उसके बाद धीरे-धीरे आंदोलन का स्वरूप बदलने लगा।

यह परिवर्तन क्यों आया? कौन-सा समर्थन तंत्र इससे जुड़ा? इसे समझने के लिए उन संस्थाओं और संगठनों का अध्ययन आवश्यक है, जिन्होंने इस आंदोलन का समर्थन किया। इससे उनके पारस्परिक नेटवर्क और समन्वय का अनुमान लगाया जा सकता है।

चूँकि यह मुख्यतः युवाओं और विद्यार्थियों से जुड़ा आंदोलन था, इसलिए अनेक छात्र संगठन इससे जुड़े। प्रमुख रूप से मंच का संचालन ऑल इंडिया स्टूडेंट्स एसोसिएशन (एआईएसए) ने किया। इसके अतिरिक्त स्टूडेंट्स फेडरेशन ऑफ इंडिया (एसएफआई) सहित अनेक छात्र संगठन सक्रिय रहे। मानवाधिकार के क्षेत्र में कार्य करने वाली संस्थाएँ भी इससे जुड़ीं। इनमें एमनेस्टी इंटरनेशनल, ह्यूमन राइट्स वॉच, पीपुल्स यूनियन फॉर सिविल लिबर्टीज तथा सिटीजन्स फॉर जस्टिस एंड पीस जैसी संस्थाओं का उल्लेख किया गया।

आदिवासी संगठनों में ऑल इंडिया यूनियन ऑफ फॉरेस्ट वर्किंग पीपल, बिरसा-आंबेडकर-फुले स्टूडेंट्स एसोसिएशन तथा ऑल ट्राइबल असम स्टूडेंट्स यूनियन सक्रिय रहे।महिला संगठनों में पिंजरा तोड़ कलेक्टिव, नेशनल फेडरेशन ऑफ इंडियन वीमेन, वीमेन अगेंस्ट सेक्सुअल वायलेंस एंड स्टेट रिप्रेशन तथा जेंडर जस्टिस कलेक्टिव ने सहभागिता की।

मुस्लिम संगठनों में स्टूडेंट्स इस्लामिक ऑर्गनाइजेशन, मुस्लिम स्टूडेंट्स कलेक्टिव तथा माइनॉरिटी एंड बहुजन राइट्स फोरम जुड़े। ईसाई संगठनों में यूनाइटेड क्रिश्चियन फोरम, ऑल इंडिया कैथोलिक यूनियन तथा नेशनल काउंसिल ऑफ चर्चेस इन इंडिया ने भागीदारी की।

इसके अतिरिक्त विधिक सहायता, पर्यावरण, पत्रकारिता, किसान तथा श्रमिक संगठनों ने भी समर्थन दिया। एडिटर्स गिल्ड ऑफ इंडिया, रिपोर्टर्स विदाउट बॉर्डर्स, संयुक्त किसान मोर्चा, भारतीय किसान यूनियन, ऑल इंडिया ट्रेड यूनियन काउंसिल तथा सेंटर ऑफ इंडियन ट्रेड यूनियन्स जैसी संस्थाओं का भी उल्लेख किया गया। कुछ अंतरराष्ट्रीय मानवाधिकार संगठनों, जैसे इंटरनेशनल फेडरेशन फॉर ह्यूमन राइट्स, का नाम भी सामने आया।

इतने व्यापक स्तर पर इन सभी संगठनों को जोड़ने का कार्य किसने किया? यदि इस आंदोलन की कार्यप्रणाली और समर्थन तंत्र को समझना है, तो इस प्रश्न का अध्ययन भी आवश्यक होगा।

यदि आंदोलन के मंच से दिए गए भाषणों, लगाए गए नारों तथा वहाँ उपस्थित व्यक्तियों का अध्ययन किया जाए, तो कुछ प्रश्न सामने आते हैं। मंच पर हिंदू-विरोधी स्वर क्यों उभरे? 'भारत तेरे टुकड़े होंगे' जैसे नारे लगाने अथवा उनका समर्थन करने वाले लोग वहाँ क्यों उपस्थित थे? वामपंथी विचारधारा का प्रभाव मंच पर कैसे बढ़ा? विभिन्न राजनीतिक दल इस आंदोलन से किस प्रकार जुड़े? एक छात्र आंदोलन धीरे-धीरे राजनीतिक आंदोलन में कैसे परिवर्तित हो गया? दिल्ली के साथ-साथ देश के अनेक राज्यों और जिलों में समान प्रकार के आंदोलनों का समन्वय किसने किया? विदेशों तक इसका विस्तार कैसे हुआ? इसी संदर्भ में योगेंद्र यादव के एक वक्तव्य का उल्लेख किया जाता है। उन्होंने कहा था 'लोकतंत्र का भविष्य अब संसद तय नहीं करेगी, सड़कों से तय होगा। चुनाव तय नहीं करेंगे, प्रतिरोध तय करेगा।'

इस कथन के पीछे निहित वैचारिक दृष्टि को समझने का प्रयास किया जाता है। इस दृष्टिकोण के अनुसार, आंदोलन का मूल कारण उचित हो सकता है, किंतु समय के साथ उसका नियंत्रण किन शक्तियों के हाथों में चला गया, इसका विश्लेषण आवश्यक है। वामपंथी विचारधारा इस प्रकार के आंदोलनों कोवैकल्पिक राजनीति का एक सफल प्रयोग मानती है। इसके अंतर्गत लोकतांत्रिक साधनों का उपयोग करते हुए लोकतांत्रिक व्यवस्था को भीतर से चुनौती देने की अवधारणा प्रस्तुत की जाती है।

इतालवी विचारक अंतोनियो ग्राम्शी की 'सांस्कृतिक वर्चस्व' की अवधारणा का उल्लेख करते हुए कहा जाता है कि केवल आर्थिक संघर्ष से परिवर्तन संभव नहीं माना जाता, बल्कि समाज को जोड़ने वाली सांस्कृतिक धारा को भी कमजोर करने का प्रयास किया जाता है। इसी संदर्भ में 'विखंडन' जैसी अवधारणाओं का उल्लेख किया जाता है, जिनके माध्यम से पारंपरिक आदर्शों और सांस्कृतिक प्रतीकों पर प्रश्न उठाए जाते हैं।

इस दृष्टिकोण के अनुसार पहले संसदीय लोकतंत्र की संस्थाओं को चुनौती दी जाती है। जब चुनावी मार्ग से अपेक्षित सफलता नहीं मिलती, तब लोकतंत्र द्वारा प्रदत्त अधिकारों -जैसे अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और आंदोलन के अधिकार का उपयोग करते हुए व्यवस्था के विरुद्ध व्यापक जन-अभियान खड़ा किया जाता है।इस प्रक्रिया के कुछ चरण बताए जाते हैं संस्थाओं में प्रवेश, उनकी विश्वसनीयता को कमजोर करना, वैचारिक आख्यान का संघर्ष, शिक्षा, साहित्य, सिनेमा और विश्वविद्यालयों के माध्यम से वैकल्पिक सांस्कृतिक वातावरण तैयार करना तथा अंततः व्यापक जन-आंदोलनों के माध्यम से दबाव बनाना।इस मत के अनुसार, इस प्रक्रिया का प्रभाव सामाजिक और सांस्कृतिक व्यवहार पर भी पड़ता है। यह भी कहा जाता है कि भारतीय संस्कृति स्त्री को मातृभाव से देखने की शिक्षा देती है, जबकि कुछ आंदोलनों में इसके विपरीत आचरण और भाषा का प्रदर्शन देखने को मिला।

भारत के संविधान निर्माण के समय डॉ. भीमराव रामजी आंबेडकर ने 25 नवंबर 1949 को संविधान सभा में दिए अपने अंतिम भाषण में स्वतंत्र भारत के लिए संवैधानिक मार्ग अपनाने तथा हिंसक अथवा असंवैधानिक आंदोलनों से बचने की आवश्यकता पर बल दिया था। उन्होंने इसे 'अराजकता का व्याकरण' कहा था।

यदि भारत को विकसित राष्ट्र बनाना है, तो युवा शक्ति की सकारात्मक भूमिका अत्यंत आवश्यक है। युवाओं में राष्ट्रभक्ति, सेवा, सामाजिक उत्तरदायित्व और रचनात्मक नेतृत्व की भावना विकसित करनी होगी। ऐसे आंदोलनों को केवल दलगत राजनीति के दृष्टिकोण से नहीं, बल्कि व्यापक राष्ट्रीय और संवैधानिक संदर्भ में समझने की आवश्यकता है। साथ ही, इसका उत्तर केवल आलोचना नहीं, बल्कि युवाओं के बीच सकारात्मक संपर्क, राष्ट्रभावना और सेवा के संस्कारों का व्यापक विस्तार भी होना चाहिए।

अतुल लिमये 

(लेखक राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सह सरकार्यवाह हैं)

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