एक ऐसी स्वर-साधिका, जिनकी आवाज़ ने पीढ़ियों को मंत्रमुग्ध किया, लेकिन जिन्हें उनका पूरा श्रेय कभी नहीं मिला।
अनुराग तागड़े
इंदौर। भारतीय संगीत जगत में कुछ स्वर ऐसे होते हैं जो केवल कानों तक नहीं पहुंचते, बल्कि सीधे आत्मा में उतर जाते हैं। वे स्वर किसी परिचय के मोहताज नहीं होते, बल्कि स्वयं अपनी पहचान बन जाते हैं। ऐसी ही एक स्वर-साधिका थीं सुमन कल्याणपुर।उनका नाम लेते ही एक शांत, सौम्य, सात्विक और निर्मल व्यक्तित्व आंखों के सामने साकार हो उठता है। चेहरे पर अद्भुत सरलता, स्वभाव में विनम्रता और कंठ में ईश्वर प्रदत्त मधुरता। लेकिन विडंबना यह रही कि जितनी ख्याति उनके गीतों को मिली, उतनी पहचान स्वयं उन्हें नहीं मिल सकी।अक्सर लोग उनका कोई गीत सुनते और सहज ही कह उठते"अरे... ये तो लता जी ही गा रही हैं!"यही वाक्य उनके असाधारण सामर्थ्य का प्रमाण भी था और उनके साथ हुए सबसे बड़े अन्याय का प्रतीक भी।
ढाका से मुंबई तक का सफर
28 जनवरी 1938 को तत्कालीन पूर्वी बंगाल (वर्तमान बांग्लादेश) के ढाका नगर में जन्मी सुमन हेमाड़ी का जीवन प्रारंभ से ही कला-संस्कारों से अनुप्राणित था।पिता शंकरराव हेमाड़ी सेंट्रल बैंक ऑफ इंडिया में वरिष्ठ पद पर कार्यरत थे। स्थानांतरण के कारण परिवार मुंबई आकर बस गया और यहीं से सुमनजी के संगीत जीवन की वास्तविक यात्रा आरंभ हुई।प्रारंभिक रुचि चित्रकला में थी, किंतु प्रकृति ने उनके कंठ में ऐसा मधुर स्वर दिया था कि नियति उन्हें संगीत की ओर खींच लाई। उन्होंने पंडित लक्ष्मणराव अमृते से शास्त्रीय संगीत की शिक्षा ग्रहण की और कम आयु में ही संगीत की दुनिया में अपनी पहचान बनानी शुरू कर दी।बाद में रामानंद कल्याणपुर से विवाह के पश्चात वे सुमन कल्याणपुर के नाम से संपूर्ण देश में प्रसिद्ध हुईं।
जब तलत महमूद ने पहचाना हीरा
एक संगीत समारोह में महान गायक तलत महमूद उनके स्वर से इतने प्रभावित हुए कि उन्होंने स्वयं एचएमवी कंपनी को उनके नाम की अनुशंसा की। महज 17 वर्ष की आयु में उन्होंने फिल्म मंगू के लिए अपना पहला चर्चित पार्श्वगायन किया। गीत था
"कोई पुकारे धीरे से तुझे..."और फिर शुरू हुआ एक ऐसा संगीत सफर जिसने आने वाले कई दशकों तक श्रोताओं को मंत्रमुग्ध रखा।
स्वर इतना मधुर कि लोग भ्रमित हो जाते थे
भारतीय फिल्म संगीत के इतिहास में शायद ही कोई दूसरी गायिका रही होगी जिसकी आवाज़ को लेकर इतना बड़ा भ्रम पैदा हुआ हो।
रेडियो पर गीत बजता...लोग सुनते..और लगभग निश्चित भाव से कहते"यह तो लता मंगेशकर का ही गीत होगा।"
लेकिन जब उद्घोषक गीत समाप्त होने पर नाम बताते, तब पता चलता कि यह स्वर सुमन कल्याणपुर का है।
दरअसल उनके स्वर में अद्भुत कोमलता, पारदर्शिता और माधुर्य था।लेकिन उन्होंने कभी इस तुलना को लेकर कटुता नहीं दिखाई।
न कोई शिकायत न कोई विवाद न कोई प्रचार।उन्होंने केवल अपने संगीत को ही अपनी पहचान बनने दिया।
जब रफी और लता के मतभेदों ने बदली दिशा
हिंदी फिल्म संगीत के इतिहास में एक समय ऐसा भी आया जब कुछ कारणों से मोहम्मद रफी और लता मंगेशकर साथ गाना बंद कर चुके थे।
उसी दौर में अनेक युगल गीत सुमन कल्याणपुर के हिस्से आए।लेकिन उन्होंने केवल अवसर का लाभ नहीं उठाया, बल्कि उन गीतों को अमरता प्रदान कर दी।
"न तुम हमें जानो..."
"तुमने पुकारा और हम चले आए..."
"दिल ने फिर याद किया..."
"मेरे महबूब न जा..."
"परबतों के पेड़ों पर शाम का बसेरा है..."
"आज हूं ना आए बालमा..."
जैसे गीत आज भी श्रोताओं के हृदय में उसी ताजगी के साथ जीवित हैं।
मराठी संगीत की अमूल्य धरोहर
यदि हिंदी फिल्म संगीत ने उन्हें लोकप्रियता दी, तो मराठी संगीत ने उन्हें अमरत्व प्रदान किया।उनकी आवाज़ में भावनाओं का ऐसा जादू था कि प्रत्येक गीत जीवंत हो उठता था।
"जिथे सागरा धरणी मिळते" में विरह की व्यथा थी।
"घाल घाल पिंगा वार्या माझ्या परसात" में मायके की स्मृतियों की सुगंध थी।
"निंबोणीच्या झाडामागे चंद्र झोपला गं बाई" में वात्सल्य का अथाह सागर था।
"कशी गवळण राधा बावरली" में कृष्णभक्ति का माधुर्य था।
"केशवा माधवा तुझ्या नामात रे गोडवा" में अध्यात्म की अनुभूति थी।
"जगी ज्यास कोणी नाही त्यास देव आहे" में जीवन-दर्शन था।
ऐसा लगता था मानो गीत नहीं, स्वयं भावनाएं स्वर बनकर बह रही हों।
सात भाषाएं, हजारों गीत और फिर भी अद्भुत विनम्रता
सुमन कल्याणपुर ने केवल हिंदी और मराठी में ही नहीं, बल्कि बंगाली, उड़िया, पंजाबी, राजस्थानी, कन्नड़ और भोजपुरी सहित अनेक भाषाओं में हजारों गीत गाए। ग़ज़ल, ठुमरी, भजन, भावगीत, लोरी, लोकगीत और फिल्मी गीत हर विधा में उन्होंने अपनी विशिष्ट छाप छोड़ी।उन्होंने लगभग 740 फिल्मों के लिए पार्श्वगायन किया। यह उपलब्धि किसी भी दृष्टि से असाधारण है।
प्रसिद्धि के शिखर से स्वेच्छा का मौन
संगीत जगत में जहां कलाकार अधिकाधिक लोकप्रियता और चर्चा चाहते हैं, वहीं सुमन कल्याणपुर एक अलग ही मिट्टी की बनी थीं।लोकप्रियता के शिखर पर पहुंचकर उन्होंने स्वयं को धीरे-धीरे सार्वजनिक जीवन से अलग कर लिया।मानो वे केवल संगीत के लिए आई थीं और संगीत को अपना सर्वस्व देकर शांतिपूर्वक पीछे हट गईं।
स्वर जो आज भी जीवित है
आज जब भारतीय संगीत के स्वर्णिम युग की चर्चा होती है, तब लता मंगेशकर, आशा भोसले, मोहम्मद रफी, मन्ना डे और तलत महमूद के साथ सुमन कल्याणपुर का नाम भी उतने ही आदर के साथ लिया जाना चाहिए।क्योंकि उन्होंने केवल गीत नहीं गाए, बल्कि एक युग की संवेदनाओं को स्वर दिया। शायद यही कारण है कि आज भी जब रेडियो पर उनका कोई गीत बजता है, तो अनायास ही मन ठहर जाता है। और फिर कोई मुस्कुराकर कह देता है"अरे... ये तो लता जी ही गा रही हैं!" लेकिन संगीत का जानकार तुरंत सुधार करता है"नहीं... यह सुमन कल्याणपुर हैं। वह स्वर-साधिका, जिन्हें भारतीय संगीत जगत ने जितना सुना, उतना पहचाना नहीं।"