स्वामी विवेकानंद की शिक्षाएँ और उनकी जीवनी आज भी भारतीय युवाओं को प्रेरित करती हैं। उनकी आदर्श छवि और विचार युवाओं को सशक्त बनाने में मदद करते हैं।
'कोई चलता पदचिह्नों पर, कोई पदचिह्न बनाता है, बस वही सूरमा वीर पुरुष, जग में पूजा जाता है।'
पढ़कर लगता है मानो ये पंक्तियां वीर संन्यासी पूज्य स्वामी विवेकानंद जी के स्मरण के लिए ही बनी हों। जब-जब समाज को सही दिशा में ले जाने का चिंतन होता है और भारत की युवा पीढ़ी की चिंता सताने लगती है, स्वामी विवेकानंद जी का जीवन-चरित्र हमारे समक्ष मार्गदर्शन के लिए आकर खड़ा हो जाता है। 11 अप्रैल 2026 को स्वामी विवेकानंद जी की आदमकद कांस्य प्रतिमा का अनावरण अमेरिका के सिएटल शहर के व्यस्त वेस्टलेक स्क्वायर में यूं ही नहीं हुआ। वास्तव में, वह शिकागो 1893 से उठी आवाज का ही विस्तार है, जो अब सिएटल के हृदय में भी गहराई से उतर गई है।
उनकी सिंह-गर्जना मेमनों और भेड़ों को भी सिंह बनाने का सामर्थ्य रखती थी। वे आह्वान करते थे, 'आओ, मेरे सिंहो और इस भ्रामक कथन को मिटा दो कि तुम भेड़ों के समान हो, क्योंकि तुम्हारी आत्मा शाश्वत, उन्मुक्त और अमरत्व से परिपूर्ण है।' पश्चिमी देशों में लंबे समय तक भारत को 'सपेरों और जादूगरों का देश' माना और चित्रित किया गया, लेकिन युवा मन के इस नायक ने पूरे विश्व को भाइयों-बहनों कहकर परिवार का सदस्य बना लिया और विश्व बंधुत्व का संदेश दिया। उनके ओजस्वी उद्बोधन से भारत की संस्कृति और विचार को वैश्विक स्तर पर नई पहचान मिली। वहां पहुंचने तक की कहानी भी सीधी नहीं थी; उसमें संघर्ष और बड़ी जिजीविषा थी।
किसी भी राष्ट्र की असली शक्ति उसकी युवा शक्ति के सामर्थ्य और निष्ठा में छिपी होती है। युवा नए विचारों की स्वीकार्यता, कठिन परिस्थितियों से लड़ने का साहस, सक्रियता और महत्वाकांक्षा जैसे गुणों के कारण पहचाने जाते हैं। इसके बावजूद, पुरानी पीढ़ी से उन्हें मार्गदर्शन और निरंतर संवाद की आवश्यकता होती है। युगदृष्टा स्वामी विवेकानंद ने इसी कारण लक्ष्य की स्पष्टता, आत्मविश्वास और विचारों की पवित्रता पर जोर दिया तथा युवाओं को प्राथमिकता पर रखा। जैसे बीज से वृक्ष बनता है, वैसे ही हमारे विचार हमारे शब्द, कर्म और भाग्य को तय करते हैं। आज के युवा में लगन और साहस है, वह अनुभव भी प्राप्त कर लेगा, किंतु चरित्र एकाएक नहीं गढ़ा जा सकता। समाज के विविध क्षेत्रों में हजारों-लाखों युवा जाएंगे, किंतु अपने कार्य को सेवा कार्य और ईश्वरीय कार्य मानकर काम करने वाला युवा ही समाज को कुछ दे पाएगा। लगन काम करने की इच्छा और ऊर्जा देती है, साहस बाधाओं से लड़ने की शक्ति और अनुभव कार्य को सही ढंग से पूर्ण करने की समझ देता है। इन सब से ऊपर नैतिकता हमारे कार्य को पूर्णता और सार्थकता देती है। यही नैतिकता तो चाहिए।
नरेंद्र से विवेकानंद होने की कहानी भी निराली है। उसमें यात्राएं हैं और स्मृतियां भी। संपूर्ण भारत की गहन यात्रा करते समय उन्होंने देखा कि अनेक गांवों में पीने का पानी नहीं था, बच्चों के लिए स्कूल नहीं थे और चिकित्सा सुविधा उपलब्ध नहीं थी। छोटे-छोटे बच्चे बाल श्रमिक बनने को बाध्य थे और लोग बिना छत, बिना रोटी के सोने को विवश थे। बीमारी के इलाज और साधनों के अभाव में लोगों को तड़पते देखकर उन्होंने कहा कि भारत के पतन का मूल कारण यहां की 'जनता की घोर उपेक्षा और तिरस्कार' है।
उन्होंने देखा कि सदियों के उत्पीड़न और उपेक्षा के शिकार लोग अपनी स्थिति सुधारने और अपनी क्षमताओं के प्रति विश्वास खो चुके हैं। इस खोए विश्वास को उन्होंने 'सिंह शावक की कहानी' सुनाकर जगाया। उन्होंने कहा कि तुम्हें मिमियाना शोभा नहीं देता; तुम्हारे भीतर कोई रोग या दुर्बलता नहीं है। तुम उस अनंत आकाश की तरह हो, जहां रंगीन बादल आते-जाते हैं, पर आकाश वही अनंत नीलवर्णीय बना रहता है। उन्होंने जन-जन में आत्मविश्वास जगाया। आत्मविश्वास की अनंत सीमा से परिचय कराने वाले ऐसे स्वामी विवेकानंद ही भारतवर्ष के युवाओं के नायक हो सकते हैं।
एक शिशु जिस परिवेश में रखा जाता है, वह वहां के स्वभाव, आदतों और गुणों को आत्मसात करता है। यदि हम चाहते हैं कि पौधा सुंदर वृक्ष बनकर सुरभित पुष्प और स्वादिष्ट फल दे, तो उसे उचित खाद, जल और प्राकृतिक वातावरण देना होगा। यही बात शिशु के विकास पर भी लागू होती है। प्राचीन गुरुकुल और आचार्य पद्धति अब नहीं रही, किंतु आधुनिक शिक्षा के साथ आध्यात्मिक गतिविधियां आयोजित कर युवाओं के समक्ष राष्ट्रीय आदर्श रखा जा सकता है। ऐसा वातावरण हो, जिसमें विद्यार्थी आचार्य को अपना मित्र, सलाहकार और कठिनाइयों में रक्षा करने वाले गुरु के रूप में देखें। स्वामी विवेकानंद का विचार आगे बढ़ेगा, तो युवा अपने मन में कोई न कोई संकल्प भी लाएगा। हमने युवाओं को संकल्प-विहीन कर दिया है, लेकिन उन्हें भौतिकता का गुलाम बनाने में कोई कसर नहीं छोड़ रहे।
आज राष्ट्रीय दृष्टि और स्वामी विवेकानंद के विचारों को स्पष्टता के साथ युवाओं के समक्ष रखना पड़ेगा। वे भारतभूमि को केवल भौगोलिक भूखंड नहीं, बल्कि 'पुण्यभूमि' और 'अध्यात्म का केंद्र' मानते थे। उनके अनुसार, भारत वह पवित्र देश है, जहां मानवता, त्याग, करुणा और ईश्वर-प्राप्ति का मार्ग विकसित हुआ और यहीं से पूरी दुनिया को आध्यात्मिक प्रकाश मिलेगा। वे भूखे और अज्ञानी गरीबों की सेवा को सबसे बड़ा धर्म मानते थे। भारतीयों को दुर्बलता और हीनभावना त्यागकर गर्व से कहना चाहिए, 'मैं भारतवासी हूँ और हर भारतवासी मेरा भाई है।' उन्हें युवाओं पर अटूट विश्वास था और वे चाहते थे कि भारतीय युवा सिंह की तरह निडर होकर राष्ट्र के पुनरुत्थान में जुटें। 'क्रियासिद्धिः सत्त्वे भवति महतां नोपकरणे।' किसी भी कार्य की सफलता आत्मबल, आंतरिक साहस और प्रतिबद्धता से प्राप्त होती है। यह आत्मबल संस्कारों से मिलेगा। आज भारत के पास विशाल युवा शक्ति और जनसांख्यिकीय लाभांश है। 15 से 29 वर्ष की आयु वर्ग में करोड़ों युवा हैं। यदि यह शक्ति सेवा भाव और मानव कल्याण के उद्देश्य से लगे, तो भारत बहुत कुछ कर सकता है। विश्वगुरु की परिकल्पना सैन्य या आर्थिक शक्ति पर नहीं, बल्कि नैतिक, आध्यात्मिक और सार्वभौमिक ज्ञान के प्रसार पर आधारित है। यह भौतिक प्रभुत्व के बजाय मानवता के कल्याण, शांति और वसुधैव कुटुंबकम् की भावना को सर्वोच्च मानती है।
हम सब उस परम अमर परमात्मा की संतान हैं और इस पृथ्वी पर उनके कार्यों को पूरा करने के लिए उत्पन्न हुए हैं—'वयं सुपुत्रा अमृतस्य नूनं, तवैव कार्यार्थमिहोपजाताः।' स्वामी विवेकानंद को अपना नायक मानने वाला युवा ही ऐसा विचार कर सकता है। भारत ने सदैव मानवता और शरणागत की रक्षा का संदेश दिया है। जब रोमन तानाशाहों ने यहूदियों के पवित्र मंदिरों को तहस-नहस किया, तब भारतभूमि ने उन्हें आश्रय दिया। यही भारत की आत्मा है और यही स्वामी विवेकानंद के विचारों का मूल संदेश मानवता, सेवा, आत्मविश्वास और विश्वबंधुत्व।

डॉ. हरिशंकर कंसाना
(लेखक राष्ट्रीय सेवा योजना, जीवाजी विश्वविद्यालय में समन्वयक हैं।)