सुवेंदु अधिकारी की सरकार ने रोजगार, स्वास्थ्य, महिला सशक्तीकरण और सीमा सुरक्षा पर महत्वपूर्ण फैसले लिए हैं। बंगाल में नई दिशा और विकास की आशा जगी है।
पश्चिम बंगाल में मुख्यमंत्री सुवेंदु अधिकारी के नेतृत्व वाली सरकार के पहले 100 दिन नई शासन-शैली और विकास की प्राथमिकताओं को रेखांकित करते हैं। इस अवधि में रोजगार, स्वास्थ्य, महिला सशक्तीकरण, सीमा सुरक्षा और केंद्र-राज्य समन्वय को प्रमुख आधार बनाकर कई महत्वपूर्ण फैसले लिए गए। सरकार ने भर्ती में आयु सीमा बढ़ाने, आयुष्मान भारत लागू करने और छात्राओं के लिए आर्थिक सहायता बढ़ाने जैसे कदमों के जरिए लोगों तक सीधे लाभ पहुंचाने का प्रयास किया है।
भारतीय जनता पार्टी की सरकार ने मुख्यमंत्री सुवेंदु अधिकारी के नेतृत्व में पश्चिम बंगाल में अपने पहले 100 दिन पूरे कर लिए हैं। इस दौरान सरकार ने स्वास्थ्य, रोजगार, महिला कल्याण, सीमा सुरक्षा और केंद्र-राज्य सहयोग के क्षेत्र में कई महत्वपूर्ण फैसलों को अपनी उपलब्धियों के रूप में सामने रखा है। सुवेंदु अधिकारी के लिए ये पहले 100 दिन शासन की नई दिशा तय करने और वर्षों से लोगों को प्रभावित कर रहे मुद्दों को संबोधित करने की कोशिश के रहे हैं।
बंगाल में ही अवसरों का निर्माण
सुवेंदु अधिकारी के दृष्टिकोण के केंद्र में एक सरल विचार है बंगाल में ही अवसर पैदा किए जाएं, ताकि युवाओं को रोजगार की तलाश में राज्य से बाहर जाने के लिए मजबूर न होना पड़े। दशकों से पश्चिम बंगाल के युवा बेहतर अवसरों की तलाश में डिग्रियां, सपने और उम्मीदें लेकर बेंगलुरु, मुंबई, दिल्ली और हैदराबाद जैसे शहरों का रुख करते रहे हैं। सुवेंदु अधिकारी सरकार ने स्थानीय रोजगार, निवेश और आर्थिक विकास को अपनी प्रमुख प्राथमिकताओं में रखा है। इसका बड़ा उद्देश्य ऐसा पश्चिम बंगाल बनाना है, जहां युवा राज्य के भीतर ही अपना भविष्य बना सकें।
सुवेंदु अधिकारी के नेतृत्व में लिए गए सबसे महत्वपूर्ण फैसलों में से एक राज्य सरकार की नौकरियों में भर्ती के लिए अधिकतम आयु सीमा में बदलाव है। नई व्यवस्था के तहत ग्रुप ए के लिए अधिकतम आयु सीमा 41 वर्ष, ग्रुप बी के लिए 44 वर्ष और ग्रुप सी तथा ग्रुप डी के पदों के लिए 45 वर्ष कर दी गई है। ये बदलाव 11 मई 2026 से लागू हुए। इस फैसले का उद्देश्य उन उम्मीदवारों को एक और अवसर देना है, जो भर्ती प्रक्रिया में देरी के कारण पहले निर्धारित आयु सीमा पार कर चुके थे। हजारों नौकरी के इच्छुक युवाओं के लिए यह केवल एक प्रशासनिक बदलाव नहीं, बल्कि सरकारी नौकरी हासिल करने की अपनी कोशिश को एक बार फिर आगे बढ़ाने का अवसर है।
स्वास्थ्य सुरक्षा की नई पहल
सुवेंदु अधिकारी सरकार के लिए स्वास्थ्य भी एक महत्वपूर्ण प्राथमिकता रही है। जून में राष्ट्रीय स्वास्थ्य प्राधिकरण के साथ समझौता ज्ञापन पर हस्ताक्षर करने के बाद पश्चिम बंगाल आयुष्मान भारत पीएम-जेएवाई में शामिल हुआ और इस योजना को लागू करने वाला 36वां राज्य/केंद्रशासित प्रदेश बना। पात्र परिवारों को अस्पताल में भर्ती होने की स्थिति में हर साल 5 लाख रुपये तक का स्वास्थ्य बीमा कवर मिल सकता है। इसकी पोर्टेबिलिटी सुविधा के कारण लाभार्थी देशभर के सूचीबद्ध अस्पतालों में इलाज करा सकते हैं। सुवेंदु अधिकारी सरकार ने इस कदम को स्वास्थ्य सेवाओं की पहुंच बढ़ाने और गंभीर बीमारी के इलाज का आर्थिक बोझ परिवारों पर कम करने की दिशा में एक प्रयास के रूप में प्रस्तुत किया है।
महिला और बालिका सशक्तीकरण
महिलाओं और बालिकाओं को भी कल्याणकारी योजनाओं के केंद्र में रखा गया है। कन्याश्री योजना का नाम बदलकर कन्या रत्न किया गया है और पात्र छात्राओं को मिलने वाली वार्षिक आर्थिक सहायता अगले शैक्षणिक वर्ष से 1,000 रुपये से बढ़ाकर 2,000 रुपये कर दी गई है। उच्च शिक्षा के लिए अतिरिक्त सहायता और राज्य में बेटी बचाओ, बेटी पढ़ाओ योजना की शुरुआत भी सरकार के इसी दृष्टिकोण का हिस्सा है। व्यापक उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि किसी लड़की की शिक्षा और उसके सपने उसके परिवार की आर्थिक स्थिति के कारण सीमित न हों।
सीमा सुरक्षा को प्राथमिकता
सुवेंदु अधिकारी के लिए सीमा सुरक्षा भी शुरुआती प्राथमिकताओं में शामिल रही है। पहली कैबिनेट बैठक में राज्य सरकार ने बांग्लादेश सीमा पर सीमा सुरक्षा बल के लिए आवश्यक लंबित जमीन के हस्तांतरण को मंजूरी दी। इस प्रक्रिया को 45 दिनों के भीतर पूरा करने का लक्ष्य रखा गया है। यह फैसला केंद्रीय सुरक्षा एजेंसियों के साथ बेहतर समन्वय पर जोर को दर्शाता है। बंगाल के सीमावर्ती क्षेत्रों में यह मुद्दा केवल प्रशासनिक नहीं है। यह अंतरराष्ट्रीय सीमा के पास रहने वाले परिवारों और सीमा की सुरक्षा में तैनात जवानों की सुरक्षा से भी जुड़ा हुआ है।
केंद्र-राज्य सहयोग की नई दिशा
सुवेंदु अधिकारी ने राज्य सरकार के केंद्र के साथ संबंधों को भी एक नई दिशा देने की कोशिश की है। उनकी सरकार ने केंद्र सरकार, नीति आयोग और केंद्रीय संस्थानों के साथ समन्वय पर अधिक जोर दिया है। इसके पीछे यह सोच है कि पश्चिम बंगाल को निवेश, इन्फ्रास्ट्रक्चर, उद्योग और रोजगार के अवसरों की आवश्यकता है और विकास के रास्ते में राजनीतिक मतभेद बाधा नहीं बनने चाहिए।
निवेश और रोजगार का व्यापक दृष्टिकोण
समन्वय पर यह जोर व्यापक आर्थिक दृष्टिकोण से भी जुड़ा हुआ है। पश्चिम बंगाल में निवेश आकर्षित करना और राज्य के भीतर रोजगार पैदा करना उन युवाओं को रोकने के लिए जरूरी माना जा रहा है, जो लंबे समय से बेहतर अवसरों की तलाश में राज्य से बाहर जा रहे हैं। चुनौती केवल परियोजनाओं की घोषणा करना नहीं है, बल्कि ऐसा वातावरण तैयार करना है, जहां उद्योग निवेश कर सकें, व्यवसाय आगे बढ़ सकें और युवा पेशेवरों को बंगाल में अपना भविष्य दिखाई दे।
शुरुआती फैसलों का उद्देश्य
सुवेंदु अधिकारी के पहले 100 दिनों में कई महत्वपूर्ण फैसले लिए गए हैं। इन सभी फैसलों का उद्देश्य लोगों के जीवन में सीधा और सकारात्मक बदलाव लाना है।
शासन की प्राथमिकताओं का सार
रोजगार, सम्मान का माध्यम बने। शिक्षा, अवसर का माध्यम बने। स्वास्थ्य, सुरक्षा का आधार बने। सीमा सुरक्षा, राष्ट्रीय जिम्मेदारी बने। विकास, अपने घर में रहने और आगे बढ़ने की संभावना बने।
भविष्य के साथ संबंध बदलने की कोशिश
सुवेंदु अधिकारी के लिए यह अंततः बंगाल के अपने भविष्य के साथ संबंध को बदलने का प्रयास है। लक्ष्य केवल अलग-अलग योजनाओं के माध्यम से तत्काल राहत देना नहीं है, बल्कि ऐसी परिस्थितियां तैयार करना है, जिनमें लोग पश्चिम बंगाल में ही स्थिर और बेहतर जीवन का निर्माण कर सकें।
असली परीक्षा अभी बाकी
हालांकि, बड़े सवाल अभी भी सामने हैं। क्या कोलकाता केवल यादों का शहर नहीं, बल्कि अवसरों का शहर बन सकता है? क्या बंगाल के गांव अपने सबसे प्रतिभाशाली युवाओं को राज्य में रोक पाएंगे? क्या राज्य छोड़ चुके लोग उद्यमी, पेशेवर और रचनाकार बनकर वापस लौट सकते हैं?
आखिरकार, यही सवाल सुवेंदु अधिकारी के दौर की सफलता को परिभाषित करेंगे। पहले 100 दिन केवल एक शुरुआत हैं। बंगाल की समस्याएं खत्म नहीं हुई हैं और आगे की राह अब भी कठिन है। सुवेंदु अधिकारी के नेतृत्व की वास्तविक कसौटी यह होगी कि क्या ये शुरुआती फैसले रोजगार, निवेश, बेहतर सेवाओं, मजबूत सुरक्षा और लोगों के जीवन में दिखाई देने वाले सुधार में बदल पाते हैं।
बदलाव की शुरुआत का प्रतीक
यदि ऐसा होता है, तो ये पहले 100 दिन केवल एक प्रशासनिक पड़ाव बनकर नहीं रहेंगे। वे बंगाल के अपने भविष्य के साथ संबंध में बदलाव की शुरुआत का प्रतीक बन सकते हैं—पलायन से वापसी की ओर, निराशा से महत्वाकांक्षा की ओर और ठहराव से संभावनाओं की ओर।
बंगाल के सपनों का सबसे बड़ा वादा
एक ऐसे राज्य के लिए, जिसने अपनी कई पीढ़ियों के युवाओं को अवसरों की तलाश में बाहर जाते देखा है, सुवेंदु अधिकारी के नेतृत्व का सबसे बड़ा वादा सरल है—बंगाल को अपने सपनों को दूसरे राज्यों में भेजने की जरूरत नहीं होनी चाहिए। उसे ऐसे अवसर और परिस्थितियां पैदा करनी चाहिए, जहां उसके सपने उसी की धरती पर पूरे हो सकें।

के. के. उपाध्याय (लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं)