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Supreme Court ICU Rules Big Relief

चिकित्सा के क्षेत्र में सर्वोच्च न्यायालय का फैसला वरदान

सुप्रीम कोर्ट ने ICU मरीजों को लेकर अहम दिशा-निर्देश जारी किए हैं। फैसले से निजी अस्पतालों की मनमानी पर रोक और महंगे इलाज से मरीजों को राहत मिलने की उम्मीद बढ़ी है।


चिकित्सा के क्षेत्र में सर्वोच्च न्यायालय का फैसला वरदान

AI इमेज |

हाल ही में सर्वोच्च न्यायालय ने अपने एक निर्णय में एक समान गहन चिकित्सा इकाई दिशा-निर्देशों की जरूरत पर जोर दिया है। निश्चिततौर पर यह निर्णय विसंगतियों से जूझती आईसीयू प्रणाली के लिए एक आशा की किरण लेकर आई है। सर्वोच्च न्यायालय ने अपने दिशा-निर्देशों में चिकित्सकीय रूप से स्थिर हो चुके या जिन मरीजों के अंगों को बाहरी सहायता अथवा शारीरिक निगरानी की आवश्यकता नहीं होती, उन्हें अस्पताल से छुट्टी दे दी जानी चाहिए के निर्देश देते हुए ऐसे मरीजों को अन्य सामान्य वाडों में स्थानांतरित करने को कहा है।

सर्वोच्च न्यायालय का यह निर्णय महंगी होती चिकित्सा प्रणाली के लिए वरदान साबित हो सकती है। प्रायः देखा गया है कि निजी अस्पतालों में आईसीयू में भर्ती मरीजों के ठीक होने या ठीक होने की सभावना के बावजूद उसे डिस्चार्ज नहीं किया जाता है। इसका मूल कारण यह है कि मरीज के ठीक होने के बाद भी उन्हें आईसीयू से से शायद इसलिए डिस्वार्ज नहीं किया जाता है ताकि अस्पताल प्रबंधन मरीज के परिजनों लंबे समय तक पैसा ऐंठता रहे। इसमें कोई संदेह नहीं है कि आधुनिक चिकित्सा प्रणाली चिकित्सा के क्षेत्र में सर्वोच्च न्यायालय का फैसला वरदान खचौली हो गई और बेहतर सुविधाओं के लिए बड़ी रकम चुकानी होती है। 

लेकिन इस व्यवस्था का मानवीय व संवेदनशील होना अपरिहार्य है। होना तो यह चाहिए था कि इसके लिए नियम कानून देश के नीति नियंताओं को बनाने चाहिए लेकिन विडंबना यह है कि अदालत को ऐसे मामलों में पहल करनी पड़ रही है। निश्चित रूप से न्यायालय के ये निर्देश चिकित्सकीय और नैतिक दोनों ही हैं। जो बताते हैं कि जरूरी न होने के बावजूद मरीज को लंबे समय तक आईसीयू में रखना अनुचित है। यह एक हकीकत है कि मानकीकृत आईसीयू प्रोटोकॉल के अभाव में एक अस्पष्ट स्थिति पैदा हो जाती है, जिसकी वजह से मरीज से जुड़े निर्णय असमंजस का शिकार होकर रह जाते हैं। 

वास्तव में आईसीयू में भतीं मरीजों के तिमारदारों को चिकित्सा प्रक्रिया की गहन जानकारी अक्सर नहीं होती है। वे केवल चिकित्सक के दिशा निर्देशों पर ही निर्भर होकर रह जाते हैं। यही वजह है कि अस्पताल प्रबंधन के रहमो-करम पर मरीज को महंगे आईसीयू में लंबे समय तक बार में भर्ती रहने को मजबूर होना पड़ता है। कई ऐसा भी होता है कि गहन चिकित्सा कक्ष रहने के बावजूद मरीज को उपचारीय लाभ नहीं मिल रहा होता है। सही मायनों में भर्ती सुप्रीम कोर्ट के ये दिशा-निर्देश एक सरल व सामान्य सिद्धांत की पुष्टि करते हुए इस विसंगति को दूर करने का प्रयास करते है कि किसी भी अस्पताल का आईसीयू मरीज की अनिश्चितकालीन देखभाल के लिए नहीं होता है। 

इससे भी महत्वपूर्ण बात यह है कि शीर्ष अदालत ने समस्या के यथाशीघ्र समाधान की जरूरत पर बल दिया है। अदालत ने डॉक्टरों की प्रतिष्ठा को संरक्षित करते हुए चिकित्सा संस्थानों व अस्पतालों की जवाबदेही सुनिश्चित करने पर बल दिया है। इस दिशा में व्यवस्थागत मुद्दों पर जोर दिया गया है, जिसमें नर्स द मरीज के अनुपात, विशेषज्ञ पर्यवेक्षण, मानक बुनियादी ढांचा और प्रशिक्षण पर ध्यान केंद्रित कराना एक सराहनीय पहल कही जाएगी। निश्चित रूप से भारत जैसे देश में जहां स्वास्थ्य सेवा की गुणवत्ता में भारी असमानता है, ये न्यूनतम मानदंड अधिक न्यायसंगत देखभाल के लिए आधार बन सकते हैं। 

सही मायनों में राज्यों और केंद्रशासित प्रदेशों को प्राथमिकता वाले क्षेत्रों की पहचान करने और समयबद्ध कार्य योजना तैयार करनी चाहिए। साथ ही निर्देश नीति के क्रियान्वयन हेतु तत्परता दिखानी चाहिए। लेकिन विगत के अनुभव बताते है कि एक अच्छे इरादे वाली कार्ययोजना तब अपने लक्ष्य पाने में विफल हो जाती है जब उसका क्रियान्वयन आधे-अधूरे ढंग से किया जाता रहा है। निश्चित रूप से निगरानी ढांचे और समन्वित राष्ट्रीय स्तर की कार्रवाई पर अदालत की पहल सही दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम है। लेकिन इसकी अनुपालन की सफलता राजनीतिक इच्छाशक्ति, वित्त पोषण और प्रशासनिक क्षमता पर निर्भर करेगी। बहरहाल महंगी होती चिकित्सा पद्धति को लेकर सर्वोच्च न्यायालय के दिशा निर्देशों पर यदि पालन किया जाता है तो काफी हद तक पीड़ितों को राहत मिल सकती है।