आपातकाल के समय सुदर्शनजी ने इंदौर जेल में सभी विचारधाराओं के बीच समन्वय स्थापित किया और उन्हें एक सूत्र में पिरोया। उनका यह योगदान भावी राजनीतिक धाराओं को प्रभावित करने वाला साबित हुआ।
विचारों की भिन्नता के बावजूद आपातकाल में सबको एक सूत्र में पिरोया, इंदौर जेल बनी संवाद और लोकतांत्रिक संघर्ष की मिसाल
आपातकाल के बाद 27 जून की सुबह इंदौर के रामबाग स्थित संघ कार्यालय 'अर्चना' से सुदर्शनजी को दत्ताजी उननगांवकर, गोविंदजी सारंगज, मधुकररावजी चितलेज, कृष्ण कुमारजी अष्ठाना
27 जून की गिरफ्तारी, बैरक नंबर 10 बनी कर्मभूमि सहित अन्य वरिष्ठ पदाधिकारियों के साथ हिरासत में लिया गया, उन्हें इंदौर जिला जेल की बैरक नंबर 10 में रखा गया। करीब 100 किशोर और तरुण स्वयंसेवक भी वहां निरुद्ध थे। सुदर्शनजी ने कारावास को निष्क्रिय प्रतीक्षा का समय न बनाकर अनुशासन, अध्ययन और संस्कार का अवसर बनाया। प्रातः और सायंकाल की शाखा, व्यायाम और प्रशिक्षण में वे स्वयं सक्रिय रहते।
'कप्तान साहब' नाम से मिली सर्वस्वीकृति
जेल में समाजवादी, मार्क्सवादी, जनसंघ, सर्वोदय और संघ से जुड़े नेता, सांसद, विधायक, प्रचारक तथा सामाजिक कार्यकर्ता एक साथ बंद थे। विचारों की यह विविधता कभी-कभी मतभेद भी पैदा करती थी, लेकिन लोकतंत्र की रक्षा का साझा उद्देश्य सबको जोड़ता था। इसी वातावरण में समाजवादी नेता मामा बालेश्वर दयाल सुदर्शनजी को स्नेहपूर्वक 'कप्तान साहब' कहने लगे। दादाभाई नाईक, बालेश्वर दयाल, रतन दादा पाटौदी, गंगाप्रसादजी, वीरेंद्र कुमार सकलेचा, डॉ. लक्ष्मीनारायण पांडे, सुंदरलाल पटवा, कैलाश जोशी, बैरिस्टर उमाशंकर त्रिवेदी, बसंतराव प्रधान और कन्हैयालाल डूंगरवाल सहित विभिन्न विचारधाराओं के नेताओं से उनके आत्मीय संबंध बने। वे सामूहिक बैठकों के साथ व्यक्तिगत संवाद को भी महत्व देते थे। उनके लिए मतभेद दीवार नहीं, संवाद का निमंत्रण थे।
स्वर्ण पदक देखने फांसीधर की सेल तक पहुंचे
त्रिवेदी के अनुसार जयप्रकाश नारायण के संपूर्ण क्रांति आंदोलन से जुड़े कुछ युवा बंदी प्रतिदिन नारे लगाते हुए बैरकों में जाते थे। कई बार सुदर्शनजी भी उनके साथ शामिल होते। जब मनोविज्ञान विषय में विश्वविद्यालय में प्रथम आने पर त्रिवेदी को स्वर्ण पदक मिला और वह जेल में उनके पास पहुंचा, तब सुदर्शनजी स्वयं उसे देखने फांसीधर की सेल तक गए। उन्होंने त्रिवेदी का उत्साहवर्धन किया और वहीं मनोविज्ञान पर लंबी तथा गहरी चर्चा की। त्रिवेदी के लिए यह क्षण आज भी अविस्मरणीय है। वे कहते हैं कि मीसाकाल में सुदर्शनजी के साथ हुए विभिन्न विषयों पर विचार-विमर्श की स्मृतियां पांच दशक बाद भी उनके मन में ताजा है।
इंदौर जेल में पड़ी जनता पार्टी की वैचारिक नींव
जेल में युवा अपने दैनिक कार्यक्रमों में व्यस्त थे, वहीं वरिष्ठ नेताओं के बीच देश की भावी राजनीतिक दिशा पर गंभीर मंथन चलता था। भूमिगत कार्यकर्ताओं के माध्यम से विभिन्न जेलों में बंद नेताओं के बीच संपर्क और विचार-विनिमय भी जारी था। भावी राजनीतिक संगठन की संरचना, संविधान और कार्यपद्धति जैसे विषयों पर चर्चा होने लगी थी। इसी कारण इंदौर की जेलों को जनता पार्टी के निर्माण की वैचारिक पृष्ठभूमि तैयार करने वाले महत्वपूर्ण केंद्रों में माना गया। अटल बिहारी वाजपेयी, लालकृष्ण आडवाणी, मधु दंडवते, श्यामनंदन मिश्र और जॉर्ज फर्नाडिस जैसे नेताओं तक गतिविधियों और रणनीति की सूचनाएं पहुंचने की बात भी सामने आती रही।
जेल में बनी अनुशासन-आत्मीयता की दिनचर्या
धीरे-धीरे जेल में ऐसी दिनचर्या विकसित हुई, मानो बंदीगृह के भीतर कोई शिक्षा वर्ग चल रहा हो। प्रार्थना के बाद मैदान में संधि व्यायाम होता, जिसमें विभिन्न विचारधाराओं के बंदी भी स्वेच्छा से शामिल होते। चाय-नाश्ते के बाद युवाओं के लिए वॉलीबाल जैसे खेल और वरिष्ठों के लिए सामाजिक एवं धार्मिक विषयों पर चर्चा होती। पं. रामनारायणजी शास्त्री के प्रवचन और गोविंदजी सारंग के सहयोग से गतिविधियों को व्यवस्थित स्वरूप मिला। खास बात यह थी कि किसी पर किसी गतिविधि में शामिल होने का दबाव नहीं था। संघ से अलग विचार रखने वाले बंदी भी अपनी स्वतंत्रता के साथ रहते थे। यही सहजता सुदर्शनजी की नेतृत्व शैली की विशेष पहचान बनी।
बौद्धिक वर्ग बना विचार-विनिमय का मंच
दोपहर के विश्राम के बाद तीन बजे चाय और चार बजे सामूहिक चिंतन अथवा बौद्धिक वर्ग होता। समसामयिक घटनाक्रम, त्योहार, महापुरुषों की जयंती और देश की राजनीतिक परिस्थितियां चर्चा के केंद्र में रहतीं। प्रत्येक व्यक्ति को अपनी बात रखने का अवसर मिलता। सर्वोदय, समाजवाद, संघ विचार और जयप्रकाश नारायण के संपूर्ण क्रांति आंदोलन पर खुलकर विचार-विमर्श होता। यह किसी एक विचारधारा को दूसरे पर थोपने का मंच नहीं था। जेल की चारदीवारी के भीतर विचारों का यह आदान-प्रदान लोकतांत्रिक सहमति की छोटी-सी प्रयोगशाला जैसा था। सुदर्शनजी अध्ययनशील थे और विषयों को गहराई से समझने तथा सरल ढंग से समझाने के लिए जाने जाते थे।
'जयप्रकाश का बिगुल' बना संघर्ष का स्वर
जेल के कार्यक्रम अक्सर देशभक्ति गीतों से शुरू होते। सर्वोदय कार्यकर्ता किशोरभाई गुप्ता मधुर स्वर में गीत गाते और सभी उनके साथ स्वर मिलाते। 'जयप्रकाश का बिगुल बजा, तो जाग उठी तरुणाई हैं' जैसे गीत उस दौर की संघर्षशील मनोदशा को आवाज देते थे। धीरे-धीरे यह गीत लगभग हर मीसाबंदी की जुबान पर आ गया। गीत, व्यायाम और विचार-विमर्श ने जेल के वातावरण में निराशा के बजाय जीवंतता भर दी।
चरखे से मनोविज्ञान तक
इंदौर के वरिष्ठ अभिभाषक और तत्कालीन मीसाबंदी अनिल त्रिवेदी का संस्मरण सुदर्शनजी के व्यक्तित्व के आत्मीय पक्ष को सामने लाता है। त्रिवेदी बताते हैं कि उस समय सुदर्शनजी लगभग 40-42 वर्ष के रहे होंगे और वे स्वयं महाविद्यालयीन छात्र थे। जेल में रहते हुए भी सुदर्शनजी ने अपनी दिनचर्या निश्चित कर रखी थी। वे प्रातः सभी बैरकों में जाकर मीसाबंदियों को प्रार्थना में शामिल होने का स्मरण कराते। शाम को कबड्डी और खो-खो जैसे खेलों में शामिल होते तथा सुबह-शाम व्यायाम में भी सक्रिय रहते। इस कारण वे शीघ्र ही सभी के साथ घुल-मिल गए। त्रिवेदी बताते हैं कि दोपहर की सभाओं में सुदर्शनजी को सुनने का अवसर मिलता था। वे अच्छा गाते थे और बहुत अध्ययनशील थे। त्रिवेदी ने घर से जेल में सूत कातने के लिए अंबर चरखा मंगवाया था। सुदर्शनजी स्वयं उनके पास आए और चरखे, कताई तथा खादी के विषय में उनसे लंबी चर्चा की। यह प्रसंग बताता है कि उनका चिंतन केवल राजनीतिक विषयों तक सीमित नहीं था, बल्कि स्वदेशी, श्रम और ग्रामीण अर्थव्यवस्था जैसे विषयों में भी उनकी गहरी रुचि थी।
होली में घुल जाती थीं विचारधाराओं की दूरियां
सुदर्शनजी की आत्मीयता का एक सुंदर पक्ष होली के अवसर पर दिखाई देता था। वे मीसाबंदियों के साथ देशभक्ति के गीत गाते, हंसी-मजाक करते और कठिन परिस्थितियों में भी वातावरण को उल्लास से भर देते। किशोर और युवा बंदियों से उनकी सहज बातचीत और उनका मनोबल बढ़ाना उनके स्वभाव का हिस्सा था। जेल की दीवारों के भीतर खेली गई वह होली मानी स्वतंत्रता की आकांक्षा का रंग बन जाती। कुछ क्षणों के लिए विचारधाराओं की दूरियां मिट जातीं और सभी एक परिवार के सदस्य प्रतीत होते।
आपातकाल के बाद बढ़ा दायित्व
आपातकाल समाप्त होने के बाद सुदर्शनजी की पूर्वोत्तर भारत में संघ कार्य के विस्तार का दायित्व मिला। आगे उन्होंने शारीरिक और बैद्धिक प्रमुख जैसे महत्वपूर्ण दायित्व संभाले, सह सरकार्यवाह रहे और वर्ष 2000 में संघ के पांचवें सरसंघचालक बने। मार्च 2009 में उन्होंने यह दायित्व डॉ. मोहनजी भागवत को सौंपा। 15 सितंबर 2012 को रायपुर में उनका निधन हुआ। इंदौर की मौसा जेल में बिताया उनका समय उनके जीवन का ऐसा अध्याय है, जहां संगठन से अधिक समन्वय, मतभेद से अधिक संवाद और निराशा के बीच आशा दिखाई देती है। सुदर्शनजी ने अपने आचरण से बताया कि विचार अलग हो सकते हैं, लेकिन राष्ट्रीय सरोकार और लोकतंत्र की रक्षा का संकल्प साझा हो तो संवाद की एक डोर अनेक मनों को एक सूत्र में बांध सकती है। इंदौर की वह जेल आज भी उसी लोकतांत्रिक एकजुटता और संघर्षशील चेतना की उजली स्मृति है।
इंदौर। 1975 से 1977 के आपातकाल के 21 महीने भारतीय लोकतंत्र की स्मृति में दमन, गिरफ्तारी और नागरिक स्वतंत्रताओं के हनन के दौर के रूप में दर्ज हैं। लेकिन इसी अंधेरे समय में जेलों के भीतर लोकतंत्र की लौ भी जलती रही। इंदौर जिला जेल ऐसी ही एक ऐतिहासिक भूमि थी, जहां अलग-अलग विचारधाराओं के मीसाबंदियों ने मतभेदों के बावजूद लोकतंत्र की पुनर्स्थापना के लिए एकजुट होकर संघर्ष किया। इस एकजुटता के केंद्र में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के तत्कालीन मध्य भारत प्रांत प्रचारक कुप्प. सी. सुदर्शन थे। उनकी सहजता, अध्ययनशीलता और संवाद की क्षमता ने उन्हें सबका सर्वमान्य समन्वयक बना दिया था। आपातकाल में सुदर्शनजी इंदौर जेल में बंद रहे, यह तथ्य उनके जीवन की महत्वपूर्ण कड़ियों में दर्ज है।