घाव हमेशा दिखाई दे ऐसा आवश्यक नहीं होता-कुछ प्रहार ऐसे होते हैं जो त्वचा को नही बल्कि आत्मा को चीरते है-वे खून नहीं बहाते परंतु भीतर की शांति को रिसने पर विवश कर देते है-शब्द जब संयम खो देते है तब वे मात्र ध्वनि नहीं रहते-वे अस्त्र बन जाते है और विचित्र ये है कि इन्हें उठाने वाला प्रायः स्वयं को निर्दोष मानता है क्युँकि उसके हाथ में कोई कुल्हाड़ी नहीं होती केवल वाक्य होते है! किन्तु वही वाक्य जब उपेक्षा तिरस्कार या अहं के आवरण में लिपटे होते है तब वे मन पर ऐसे प्रहार करते हैं जिनकी प्रतिध्वनि वर्षों तक सुनाई देती रहती है-शरीर के घाव समय के साथ भर जाते है पर शब्दों से उपजे आघात स्मृति की दीवारों पर अंकित रह जाते है-वे बार-बार स्मरण में आकर मन को उसी क्षण में लौटा देते है जहाँ आत्मसम्मान पहली बार आहत हुआ था!
कभी-कभी सोचता हूँ-यदि मन पर पड़े घाव भी दृश्य होते, तो लोग बोलने से पूर्व ठहरते क्या? क्या वे अपने वचनों को तौलते जैसे कोई धारदार औज़ार को सावधानी से रखता है? क्युँकि शब्दों की धार दिखाई नहीं देती, इसलिए लोग उन्हें बिना सोच-समझ के चला देते है!
पर सत्य यही है-कुल्हाड़ी वृक्ष को गिराती है-शब्द संबंधों को-कुल्हाड़ी लकड़ी को काटती है, शब्द विश्वास को-और विश्वास जब एक बार टूट जाए तो उसका पुनर्निर्माण केवल मौन, संवेदना और समय के तप से ही संभव होता है-इसलिए अब मैं वचनों को हल्के में नहीं लेता न अपने, न किसी और के क्युँकि समझ आ गया है कि मानसिक आघात की ध्वनि भले ही क्षीण हो पर उसकी पीड़ा अत्यंत गहन होती है और जो इसे सह लेता है, वो बाहर से शांत दिखते हुए भी भीतर एक लंबी लड़ाई लड़ रहा होता है!

▪️सतीश शर्मा