भारत में बढ़ती खाद्य संबंधी बीमारियों के बीच, सुप्रीम कोर्ट ने खाद्य पदार्थों पर चेतावनी लेबल की अनिवार्यता पर जोर दिया है।
आज जब देश में बच्चों और युवाओं में मोटापा, मधुमेह और जीवनशैली से जुड़ी बीमारियों का खतरा लगातार बढ़ रहा है, तब पैकेज्ड और प्रोसेस्ड खाद्य पदार्थों पर उनकी वास्तविक पोषण-सामग्री की स्पष्ट जानकारी देना महज उपभोक्ता अधिकार नहीं, बल्कि सार्वजनिक स्वास्थ्य की अनिवार्यता है। इसी गंभीर मुद्दे पर पिछले दिनों सुप्रीम कोर्ट ने भारतीय खाद्य सुरक्षा एवं मानक प्राधिकरण (एफएसएसएआई) की कार्यप्रणाली पर सवाल उठाते हुए पूछा कि सरकार ऐसे कदम उठाने से क्यों हिचक रही है, जो नागरिकों, खासकर बच्चों को अधिक फैट वाले खाद्य पदार्थों के नुकसान के प्रति सचेत कर सकें। अदालत ने पैकेज के सामने स्पष्ट ‘फ्रंट-ऑफ-पैक वार्निंग लेबल’ की जरूरत पर जोर देते हुए केंद्र को इस संबंध में गंभीरता से विचार कर दो सप्ताह में जवाब देने का अंतिम अवसर दिया है। गौरतलब है कि अतिरिक्त सॉलिसिटर जनरल बृजेंद्र चाहर ने सरकार की चिंताओं का उल्लेख करते हुए कहा कि सख्त चेतावनी लेबल लागू होने पर नमकीन जैसे पारंपरिक भारतीय खाद्य पदार्थों पर भी अधिक वसा या नमक होने के कारण लाल चेतावनी चिह्न लग सकता है। उन्होंने यह भी तर्क दिया कि अंतरराष्ट्रीय पोषण मानकों को भारतीय खान-पान पर सीधे लागू करना उचित नहीं होगा और यहां तक कि दो अंडे भी दैनिक वसा सीमा से अधिक हो सकते हैं। हालांकि, सुप्रीम कोर्ट ने इस तर्क को खारिज करते हुए कहा कि ऐसी चिंताएं उपभोक्ताओं को उनके भोजन के पोषण संबंधी जोखिमों से जागरूक करने में बाधा नहीं बन सकतीं। पीठ ने कहा कि उपभोक्ता जानते हैं कि पैकेज्ड खाद्य पदार्थों में चीनी, वसा और कार्बोहाइड्रेट होते हैं, लेकिन फ्रंट-ऑफ-पैक चेतावनी लेबल उन्हें उत्पाद खरीदने से पहले उसके पोषण संबंधी जोखिमों की सरल और स्पष्ट जानकारी देंगे। निर्माताओं के व्यावसायिक हित सार्वजनिक स्वास्थ्य से ऊपर नहीं हो सकते।
मिलावट का जाल:भारत में खाद्य पदार्थों में मिलावट गंभीर सार्वजनिक स्वास्थ्य चुनौती बन चुकी है, जिससे लाखों लोगों का जीवन प्रभावित हो रहा है और खाद्य उद्योग पर भरोसा कम हो रहा है। मजबूत नियामक ढांचे के बावजूद मिलावट का पैमाना लगातार बढ़ रहा है। खाद्य पदार्थों में मिलावट का तात्पर्य खाद्य उत्पादों में जानबूझकर या अनजाने में घटिया, हानिकारक या प्रतिबंधित पदार्थों की मिलावट से है। यह अक्सर मात्रा बढ़ाने, दिखावट निखारने या शेल्फ लाइफ बढ़ाने के लिए की जाती है, जो सुरक्षा और पोषण मूल्य की कीमत पर होती है। आम मिलावटों में अखाद्य रंग, स्टार्च, पत्थर, साबुन का पत्थर, यूरिया और फॉर्मेलिन तथा कैल्शियम कार्बाइड जैसे खतरनाक रसायन शामिल हैं। एफएसएसएआई खाद्य पदार्थों में मिलावट को किसी ऐसे पदार्थ को मिलाने या हटाने के रूप में परिभाषित करता है, जिससे खाद्य पदार्थ निम्न गुणवत्ता का, स्वास्थ्य के लिए हानिकारक या प्रस्तुति में भ्रामक हो जाता है।
भारत में मिलावट का कारोबार आज एक संगठित आर्थिक अपराध का रूप ले चुका है। दूध में डिटर्जेंट, यूरिया और सिंथेटिक रसायन, मावे में स्टार्च और रासायनिक पदार्थ, मसालों में रंग और धूल, शहद में चीनी सिरप, खाद्य तेलों में सस्ते तेलों का मिश्रण तथा फलों-सब्जियों को कृत्रिम रसायनों से पकाना आम बात हो गई है। बाजार में बिकने वाले अनेक उत्पाद देखने में आकर्षक होते हैं, लेकिन भीतर से विषैले सिद्ध हो सकते हैं। खाद्य पदार्थों में मिलावट से जन स्वास्थ्य पर गंभीर प्रभाव पड़ता है। लंबे समय तक संपर्क में रहने से लीवर और किडनी को नुकसान, कैंसर, बांझपन और तंत्रिका संबंधी विकार हो सकते हैं। बच्चे, गर्भवती महिलाएं और बुजुर्ग विशेष रूप से संवेदनशील होते हैं। विश्व स्वास्थ्य संगठन के अनुसार, हानिकारक बैक्टीरिया, वायरस, परजीवी या रसायनों से दूषित भोजन दो सौ से अधिक बीमारियों का कारण बन सकता है। डब्ल्यूएचओ के 2026 के आकलन के अनुसार, दुनियाभर में असुरक्षित भोजन से हर साल करीब 86.6 करोड़ लोग बीमार पड़ते हैं और 15.2 लाख लोगों की मौत होती है। पांच वर्ष से कम उम्र के बच्चों पर इसका जोखिम विशेष रूप से अधिक है। एफएसएसएआई की 2023-24 की रिपोर्ट के अनुसार, भारत में परीक्षण किए गए खाद्य नमूनों में लगभग 28 फीसदी मिलावटी या गलत लेबल वाले पाए गए, जो 2018-19 के 23 फीसदी से अधिक है। दुग्ध उत्पाद, खाद्य तेल और मसाले विशेष रूप से प्रभावित श्रेणियां रहीं। मिलावट के पीछे भ्रष्टाचार, कमजोर निगरानी और उपभोक्ताओं में जागरूकता की कमी भी बड़ी वजह है।
कानून बेअसर क्यों? सरकारों ने समय-समय पर खाद्य सुरक्षा और मानक कानून बनाए हैं। एफएसएसएआई सहित अनेक संस्थाएं निगरानी और परीक्षण का कार्य करती हैं। फिर भी जमीनी स्तर पर भ्रष्टाचार, रिश्वतखोरी, निरीक्षण तंत्र की कमजोरी और कानूनी प्रक्रियाओं की धीमी गति मिलावट के विरुद्ध अभियान को प्रभावी नहीं बनने देती। अनेक मामलों में दोषियों को दंड मिलने में वर्षों लग जाते हैं, जिससे अपराधियों के हौसले बढ़ते हैं। खाद्य पदार्थों के प्रबंधन में साफ-सफाई का अभाव और जागरूकता की कमी भी समस्या को गंभीर बनाती है। छोटे विक्रेताओं और गली-मुहल्लों में खाने-पीने का सामान बेचने वालों को सुरक्षा मानकों की सही जानकारी नहीं होती। अनौपचारिक बाजारों में स्वच्छता के मूल मानकों का पालन भी नहीं किया जाता। स्ट्रीट फूड लोकप्रिय जरूर हैं, लेकिन कई जगह इन्हें तैयार करने में लापरवाही बरती जाती है, जिससे बीमारियों का खतरा बढ़ता है।
इस अभिशाप से निपटने के लिए केवल कानून बनाना पर्याप्त नहीं है। खाद्य पदार्थों की नियमित जांच, आधुनिक प्रयोगशालाओं का विस्तार, डिजिटल ट्रैकिंग प्रणाली, त्वरित न्याय व्यवस्था और दोषियों के लिए कठोर दंड आवश्यक हैं। मिलावट को सामान्य आर्थिक अपराध नहीं, बल्कि जनस्वास्थ्य के विरुद्ध गंभीर अपराध माना जाना चाहिए। कानूनों का क्रियान्वयन पारदर्शी और प्रभावी हो तथा निरीक्षण व्यवस्था को राजनीतिक और आर्थिक दबाव से मुक्त किया जाए। तकनीक के माध्यम से खाद्य पदार्थों की गुणवत्ता और स्रोत की निगरानी की जा सकती है। डिजिटल ट्रैकिंग से यह पता लगाया जा सकता है कि कोई उत्पाद खेत या कारखाने से बाजार तक किस प्रक्रिया से पहुंचा। साथ ही, खाद्य परीक्षण प्रयोगशालाओं की संख्या और क्षमता बढ़ाना जरूरी है, ताकि संदिग्ध खाद्य पदार्थों की जांच में लंबा समय न लगे और दोषियों के खिलाफ समय पर कार्रवाई हो सके।

लालजी जायसवाल
(लेखक एवं स्तंभकार हैं)