समाज के विकास में अधिकारों के साथ कर्तव्यों की अहमियत पर चर्चा करते हुए, लेख में पीढ़ीगत जिम्मेदारियों और संवेदनशीलता पर प्रकाश डाला गया है।
समाज केवल विरोध से नहीं चलता। समाज को स्वतंत्रता के साथ जिम्मेदारी, अधिकारों के साथ कर्तव्य और अभिव्यक्ति के साथ संवेदनशीलता भी चाहिए। पिछली पीढ़ियाँ मूर्ख नहीं थीं और नई पीढ़ी सर्वज्ञ नहीं है। हर पीढ़ी के पास कुछ सीखने और कुछ सिखाने लायक होता है।
हर पीढ़ी की अपनी ताकत होती है, लेकिन समाज केवल विद्रोह से नहीं चलता।जेन-जी के बारे में यह कहना कि उनके पास कोई फिल्टर नहीं है और यही उनकी सबसे बड़ी ताकत है, मुझे पूरी तरह सही नहीं लगता। सभ्यता इसलिए विकसित हुई क्योंकि मनुष्य ने सीखा कि हर बात, हर गुस्से और हर भावना को बिना सोचे-समझे व्यक्त नहीं करना चाहिए। संयम, शिष्टाचार और आत्म-नियंत्रण कमजोरी नहीं, बल्कि सामाजिक जीवन की बुनियादी शर्तें हैं।
यह भी सही नहीं है कि पिछली पीढ़ियों के इतिहास-बोध, संस्कार और संकोच को केवल बोझ मान लिया जाए। उन्हें कम जानकार या कायर मान लिया जाए। इतिहास हमें पीछे नहीं खींचता, बल्कि यह बताता है कि समाज किन गलतियों की कीमत पहले ही चुका चुका है। अनुभव और मूल्य किसी भी समाज की सामूहिक सीख होते हैं।
अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता निश्चित रूप से आवश्यक है, लेकिन स्वतंत्रता और उद्दंडता में अंतर होता है। किसी को गालियाँ देना, यौन टिप्पणियाँ करना, मीम बनाकर अपमानित करना या सार्वजनिक रूप से बेइज्जत करना अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता नहीं है। इसी प्रकार, सार्वजनिक या निजी संपत्ति का विरोध के नाम पर नुकसान करना सामाजिक उत्तरदायित्व से बचना है। यह समझना होगा कि अधिकारों के साथ कर्तव्य भी आते हैं।
एक और बात ध्यान देने योग्य है। आज की पीढ़ी यौन सहमति, निजता और गरिमा की बात करती है, जो बिल्कुल उचित है। लेकिन उसी समय सामान्य बातचीत में यौन अपशब्दों, अश्लील स्लैंग और यौन टिप्पणियों को हास्य या ट्रोलिंग का हिस्सा बना दिया जाए, तो यह एक स्पष्ट विरोधाभास पैदा करता है। एक तरफ जिस यौन उत्पीड़न से बचना चाहती है, उसी प्रकार की भाषा के माध्यम से अनजाने में उसी संस्कृति को बढ़ावा भी देती है। यदि हम सम्मानजनक समाज चाहते हैं, तो उसकी शुरुआत हमारी भाषा और व्यवहार से भी होनी चाहिए।
यह मान लेना भी उचित नहीं कि नई पीढ़ी धर्म, जाति, राष्ट्रवाद या प्रचार से पूरी तरह मुक्त है। आज सोशल मीडिया के एल्गोरिद्म, वायरल कंटेंट और मीम संस्कृति भी लोगों की सोच को प्रभावित करते हैं। इसलिए यह कहना कि केवल एक ही पीढ़ी धर्म, जाति और नस्ल से परे होकर स्वतंत्र रूप से सोचती है, नासमझी से भरा सरलीकरण होगा।
यह भी याद रखना चाहिए कि जीवन के हर चरण की अपनी सोच होती है। युवावस्था में विद्रोह सहज है, लेकिन जैसे-जैसे व्यक्ति परिवार, बच्चों, माता-पिता और सामाजिक जिम्मेदारियों से जुड़ता है, उसे स्वयं कानून, मर्यादा, अनुशासन और सामाजिक मूल्यों की आवश्यकता महसूस होने लगती है। कोई भी माता-पिता यह नहीं चाहेंगे कि उनके बच्चों के लिए गाली-गलौज, यौन अपमान और सार्वजनिक उपहास सामान्य सामाजिक व्यवहार बन जाए।
समाज केवल विरोध से नहीं चलता। समाज को स्वतंत्रता के साथ जिम्मेदारी, अधिकारों के साथ कर्तव्य और अभिव्यक्ति के साथ संवेदनशीलता भी चाहिए। पिछली पीढ़ियाँ मूर्ख नहीं थीं और नई पीढ़ी सर्वज्ञ नहीं है। हर पीढ़ी के पास कुछ सीखने और कुछ सिखाने लायक होता है।
आखिरकार, किसी भी पीढ़ी का मूल्यांकन उसकी भाषा, मीम्स या ट्रोलिंग से नहीं, बल्कि इस बात से होगा कि वह अपने बाद आने वाली पीढ़ी के लिए कैसा समाज छोड़कर जाती है—ऐसा समाज, जहाँ स्वतंत्रता और मर्यादा साथ-साथ चलें, या ऐसा, जहाँ हर व्यक्ति केवल अधिकार चाहता हो, लेकिन अपने शब्दों और व्यवहार की जिम्मेदारी लेने को तैयार न हो।
समाज-द्रोही लोग हर पीढ़ी में कंधे ढूँढ़ते आए हैं, ताकि उस कंधे पर रखकर अपना मंसूबा पूरा कर सकें। हर पीढ़ी को वह कंधा बनने से बचना चाहिए। अपने अधिकारों से दूर न रहिए, लेकिन अपने कर्तव्यों को भी मत भूलिए। व्यक्ति और समाज के कल्याण के लिए यही आवश्यक है, क्योंकि व्यक्ति से ही समाज बनता है।

कपिल शर्मा
(लेखक भारत निर्वाचन आयोग में अधिकारी हैं।)