राजनीतिक संवाद में अशिष्टता और अवमानना का व्यापक इस्तेमाल कांग्रेस के नए अभियान की पहचान बनती जा रही है, जो मतदाताओं को दूर कर सकता है।
राष्ट्र के उन प्रतीकों और परंपराओं के प्रति, जिनसे देश भावनात्मक रूप से जुड़ा हुआ है, इस प्रकार की खुली 'अवमानना' का प्रदर्शन अधिक से अधिक लोगों का ध्यान आकर्षित करने और लोगों को सांप्रदायिक आधार पर ध्रुवीकृत करने के उद्देश्य से किया गया प्रतीत होता है। यदि 'वंदे मातरम्' सांप्रदायिक है, तो इसके दो अंतरे भी क्यों गाए जाएं? लेकिन उद्देश्य देश की धर्मनिरपेक्ष लोकतांत्रिक संरचना को एकजुट रखना नहीं, बल्कि ऐसी भावनाओं को उकसाना प्रतीत होता है, जो बार-बार गहरी होती सांप्रदायिक खाइयों को जन्म देती हैं। केवल पहले दो अंतरे गाना भी एक तरह का पाखंड है, क्योंकि 'वंदे मातरम्' का मूल अर्थ ही मातृभूमि को नमन करना है और भारत में इस प्रकार का भाव हिंदू सांस्कृतिक चेतना की अभिव्यक्ति से जुड़ा हुआ है। या तो इसे स्वीकार किया जाए या पूरी तरह छोड़ दिया जाए।
लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष और सांसद राहुल गांधी एक बार फिर चर्चाओं में हैं। लेकिन क्या यह देश का दुर्भाग्य नहीं कि सौ साल से अधिक पुरानी कांग्रेस पार्टी के प्रमुख नेता के बयान और उनकी हाल की राजनीतिक गतिविधियां भारतीय राजनीतिक विमर्श के गिरते स्तर की ओर संकेत कर रही हैं। ऐसा प्रतीत होता है कि नाम लेकर अपमान करने, गाली-गलौज, लैंगिक टिप्पणियों और अश्लीलता को उन्होंने अपने राजनीतिक अभियान की पहचान के रूप में अपना लिया है।
ऐसा लगता है कि इसका उद्देश्य ध्रुवीकरण करना और एक अलोकतांत्रिक राजनीतिक विमर्श को विकसित करना है, जिसे समर्थकों को आकर्षित करने के प्रयास में सुनियोजित ढंग से तैयार किया गया है। राजनीतिक संवाद की इस नई शैली में 'अशिष्टता' और 'अवमानना की भावना' को केंद्रीय स्थान दिया गया है। पश्चिमी राजनीतिक चिंतकों से लिए गए इन विचारों को कांग्रेस के रणनीतिकार 'रचनात्मक' और 'प्रगतिशील' राजनीतिक अभिव्यक्ति के रूप में प्रस्तुत कर रहे हैं।
कुछ लोगों के लिए राजनीतिक संवाद में अशिष्टता केवल सौंदर्यबोध का विषय हो सकती है, लेकिन राहुल गांधी जिस तरह इसका इस्तेमाल कर रहे हैं, उससे राजनीतिक विमर्श की गुणवत्ता प्रभावित होती दिखाई देती है। उनकी भाषा और व्यवहार में दिखाई देने वाली आक्रामकता, नकारात्मकता और शत्रुता संसद की कार्यक्षमता को प्रभावित करने के साथ-साथ पार्टी और समर्थकों के बीच संघर्ष को बढ़ाने का काम कर रही है।
राजनीतिक भाषा में अशिष्टता और अवमानना ध्रुवीकरण को बढ़ाती है, समझौते की संभावनाओं को कठिन बनाती है और राजनीतिक विरोधियों को शत्रु के रूप में देखने की प्रवृत्ति पैदा करती है। स्पष्ट रूप से राहुल गांधी का राजनीतिक अभियान इन्हीं सिद्धांतों पर आधारित दिखाई देता है, जिसमें प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को उनके एकमात्र राजनीतिक शत्रु के रूप में प्रस्तुत करने का प्रयास किया जा रहा है। राजनीतिक अशिष्टता के एक प्रमुख हथियार के रूप में 'शर्म' का इस्तेमाल करते हुए यह रणनीति प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और उनकी टीम के प्रति वैधता के संकट तथा जनता के विश्वास में कमी की धारणा पैदा करने के साथ-साथ, जहां संभव हो, राजनीतिक गतिरोध उत्पन्न करने की दिशा में काम करती दिखाई देती है।
पिछले कुछ दिनों में कांग्रेस का राजनीतिक संवाद इसी रणनीति को उजागर करता है। इसलिए राष्ट्रीय गीत 'वंदे मातरम्' के प्रति दिखाई गई अवमानना भी आश्चर्यजनक नहीं होनी चाहिए। स्वतंत्रता दिवस समारोह के दौरान सोनिया गांधी और राहुल गांधी द्वारा इसके गायन में व्यवधान उत्पन्न किया जाना भी इसी सुनियोजित रणनीति का हिस्सा प्रतीत होता है। मुद्दा यह नहीं था कि 'वंदे मातरम्' के दो अंतरे गाए जाएं या चार। वास्तविक प्रश्न यह था कि संसद द्वारा राष्ट्रीय गीत के संबंध में पारित कानून के प्रति लोगों में 'अवमानना की भावना' किस प्रकार पैदा की जाए। व्यवधान पैदा करके पार्टी के शीर्ष नेतृत्व ने कानून के प्रति असहमति और अवज्ञा का प्रदर्शन किया।
राष्ट्र के उन प्रतीकों और परंपराओं के प्रति, जिनसे देश भावनात्मक रूप से जुड़ा हुआ है, इस प्रकार की खुली 'अवमानना' का प्रदर्शन अधिक से अधिक लोगों का ध्यान आकर्षित करने और लोगों को सांप्रदायिक आधार पर ध्रुवीकृत करने के उद्देश्य से किया गया प्रतीत होता है। यदि 'वंदे मातरम्' सांप्रदायिक है, तो इसके दो अंतरे भी क्यों गाए जाएं? लेकिन उद्देश्य देश की धर्मनिरपेक्ष लोकतांत्रिक संरचना को एकजुट रखना नहीं, बल्कि ऐसी भावनाओं को उकसाना प्रतीत होता है, जो बार-बार गहरी होती सांप्रदायिक खाइयों को जन्म देती हैं। केवल पहले दो अंतरे गाना भी एक तरह का पाखंड है, क्योंकि 'वंदे मातरम्' का मूल अर्थ ही मातृभूमि को नमन करना है और भारत में इस प्रकार का भाव हिंदू सांस्कृतिक चेतना की अभिव्यक्ति से जुड़ा हुआ है। या तो इसे स्वीकार किया जाए या पूरी तरह छोड़ दिया जाए।
इसके बजाय 'वंदे मातरम्' के गायन में व्यवधान डालने की पूरी कवायद का उद्देश्य गीत को एक बार फिर 'सांप्रदायिक' और 'धर्मनिरपेक्ष' संस्करणों में बांटना तथा 'हिंदू राष्ट्रवाद' और 'मुस्लिम राष्ट्रवाद' के बीच कृत्रिम विभाजन को मजबूत करना प्रतीत होता है। इसके बाद वही परिणाम सामने आया, जिसकी अपेक्षा की गई थी राष्ट्रवादी बनाम राष्ट्रविरोधी जैसे राजनीतिक विमर्श को लेकर तीखी बयानबाजी। इससे केवल दो दिन पहले, 13 अगस्त को, कांग्रेस ने जन्तर-मन्तर पर जैन जी के विरोध के एक माध्यम के रूप में लोकप्रिय हुए व्यंग्य और कटाक्ष की शैली को अपनाते हुए अपनी 'रचनात्मकता और प्रगतिशीलता' में 'अशिष्टता' और 'अवमानना' को आवश्यक तत्व के रूप में शामिल करने का प्रयास किया।
दिल्ली में कांग्रेस पार्टी के 'Creative and Progressive Cell' के शुभारंभ के अवसर पर राहुल गांधी ने अपने समर्थक पार्टी कार्यकर्ताओं के सामने ऐसा राजनीतिक प्रदर्शन किया, जिस पर वे लगातार तालियां बजाते रहे। इस प्रदर्शन में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और इटली की प्रधानमंत्री मेलोनी को निशाना बनाने के लिए स्त्री-विरोधी तथा जानबूझकर की गई लैंगिक टिप्पणियों का इस्तेमाल किया गया। यह किसी घटिया हास्य नाटक जैसा प्रतीत हुआ, जो लोगों का ध्यान आकर्षित करने के लिए बेताबी से प्रयास कर रहा हो। यहां तक कि कांग्रेस के कुछ निष्ठावान वरिष्ठ पत्रकारों ने भी उनके प्रदर्शन को 'स्वादहीन' और अनुचित बताया।
उनका यह प्रदर्शन एक बार फिर राजनीतिक संवाद में 'अशिष्टता' को एक औजार के रूप में इस्तेमाल करने के लिए तैयार किया गया प्रतीत हुआ ताकि मतदाताओं को उनके एकमात्र शत्रु अर्थात राजनीतिक प्रतिद्वंद्वी के प्रति अवमानना की भावना पैदा करके आकर्षित किया जा सके। यह सुनियोजित रणनीति उस समय और स्पष्ट हो गई, जब उन्होंने मंच से प्रधानमंत्री को निशाना बनाते हुए कहा 'हमारा काम सरल है... पागल बना दूंगा।'
हर गुजरते दिन के साथ ऐसा प्रतीत हो रहा है कि सोनिया गांधी और राहुल गांधी की कांग्रेस अपनी राजनीतिक भाषा का स्तर अवमानना की ओर और अधिक ले जा रही है। राहुल गांधी की उम्र, बयानबाजी, निंदा, अपमानजनक टिप्पणियों और आपत्तिजनक इशारों के प्रति उनका झुकाव आने वाले समय में और अधिक स्पष्ट दिखाई दे सकता है। लेकिन इसमें एक बड़ा जोखिम भी है। राजनीतिक संवाद की रणनीति में अशिष्टता और अवमानना का अत्यधिक इस्तेमाल उलटा पड़ सकता है। समर्थन हासिल करने के बजाय यह मतदाताओं को दूर कर सकता है। इसके पीछे यह धारणा है कि कांग्रेस के अभियान से उत्पन्न राजनीतिक संकेतों के प्रति सभी लोग एक जैसी भावनात्मक प्रतिक्रिया देंगे। इसके विपरीत, राजनीतिक संवाद में इस प्रकार की अपमानजनक भाषा का बार-बार और अत्यधिक इस्तेमाल लोगों को अंततः उसके प्रति उदासीन या अभ्यस्त बना सकता है।
'Creative and Progressive Cell' की आड़ में साधारण आक्रामकता, नकारात्मकता और शत्रुता से भरे अलोकतांत्रिक राजनीतिक विमर्श का निर्माण दीर्घकाल में विनाशकारी साबित हो सकता है। नकारात्मक राजनीतिक अभियान अपेक्षित राजनीतिक लाभ नहीं दे सकता। इसके बजाय, वह मतदाताओं को दूर कर सकता है और जिस वोट बैंक को मजबूत करने का प्रयास किया जा रहा है, उसे भी कमजोर कर सकता है। इसका कारण यह है कि ऐसी राजनीति बहिष्कारी प्रकृति की होती है जिसका उद्देश्य लोगों के मन में जानबूझकर भय और अलगाव की भावना पैदा करना तथा उन्हें जाति, वर्ग और धार्मिक आधार पर ध्रुवीकृत करना होता है।
राजनीतिक संवाद लोकतंत्र की शक्ति है; यदि उसमें तर्क की जगह अवमानना, असहमति की जगह शत्रुता और संवाद की जगह अपमान ले ले, तो उसका नुकसान केवल किसी एक दल या नेता को नहीं, बल्कि पूरे लोकतांत्रिक विमर्श को उठाना पड़ता है।

डॉ. शुचि यादव
(लेखिका जेएनयू में सेंटर फॉर मीडिया स्टडीज की चेयरपर्सन और प्रोफेसर हैं।)