अक्सर ही यह दृश्य दिखता रहता है कि सड़क पर या किसी भी अन्य सार्वजनिक स्थल पर कोई व्यक्ति नमाज पढ़ रहा है और उसे यदि हटाया जाए तो असहिष्णुता का शोर मच जाता है। मगर यह शोर क्यों होता है, क्योंकि यह मूल प्रश्न कोई नहीं उठाता कि आखिर सार्वजनिक स्थल पर नमाज पढ़ी ही कैसे जा सकती है? आखिर उस स्थान पर कोई अपनी मजहबी इबादत कैसे कर सकता है, जहां पर सार्वजनिक भूमि है?
विमर्श बनते हैं और विमर्श मे यही उभरकर आता है कि केवल मुस्लिमों को सड़क पर नमाज नहीं पढ़ने दी जा रही है? और यही कारण है कि ऐसे मामले सहज ही न्यायालय की चौखट पर पहुंचते हैं। और फिर इसे न्यायिक ठप्पा लगाने की कवायद की जाती है कि सड़क पर नमाज पढ़ी क्यों नहीं जा सकती है?
ऐसा ही एक मामला उत्तर प्रदेश के संभल से आया था, जब एक सरकारी जमीन पर एक आदमी ने नमाज पढ़ने का काम किया और यह दावा किया कि यह जमीन उसीकी है, इसलिए उस पर नमाज पढ़ने में कोई आपत्ति नहीं होनी चाहिए। हालांकि उत्तर प्रदेश सरकार ने यह दावा किया कि यह जमीन सार्वजनिक प्रयोग के लिए है और असीन के पास उस जमीन का कानूनी अधिकार नहीं है।
6 अप्रेल को अपने निर्णय में जस्टिस सरल श्रीवास्तव और गरिमा प्रशाद ने यह स्पष्ट किया कि धर्म के पालन का अधिकार असीमित नहीं है और यह भी कहा कि इस तरीके से धर्म का पालन कभी भी नहीं किया जा सकता है, कि वह दूसरे धर्म के लोगों के अधिकार में दखल दे।
यह बात महत्वपूर्ण है कि धर्म व्यक्तिगत होता है। और उसके पालन का अधिकार इतना व्यक्तिगत होता है कि उसका दखल दूसरे धर्म का पालन करने वालों के जीवन में नहीं होना चाहिए। न्यायालय ने जो एक और महत्वपूर्ण टिप्पणी की वह यह कि कानून लागू करने के लिए अधिकारियों को किसी विशेष घटना को होने का इंतजार नहीं करना है, अपितु राज्य सरकार के पास यह अधिकार है कि वह ऐसा कोई भी कदम पहले से उठा सके, जो आने वाली उस गतिविधि को रोक दे, जो आम जनता के जीवन को नकारात्मक रूप से प्रभावित कर सकती है।
उन्होनें साफ कहा कि “सार्वजनिक भूमि का अर्थ है कि वह सबके लिए है और कानून द्वारा नियंत्रित है। कोई भी व्यक्ति इसे अपने नियमित रिलीजियस कार्यक्रमों के लिए प्रयोग करने का दावा नहीं कर सकता है।“ परंतु भारत के कथित बुद्धिजीवी इस बात को समझते नहीं है, वे लगातार ही यह विमर्श गढ़ते हैं कि भारत में सड़क पर या सार्वजनिक स्थल पर नमाज पढ़ने का अधिकार नहीं है, जबकि यह कानून में पूरी तरह से स्पष्ट है कि निजी स्थान पर सभी को अपने-अपने धर्म का पालन करने की स्वतंत्रता है, हाँ, सार्वजनिक स्थल सभी के लिए हैं, इसे कोई अपने मजहब के कार्यक्रमों के लिए आरक्षित नहीं कर सकता है।

सोनाली मिश्रा