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पिता की गिरफ्तारी, बेटे की पढ़ाई छूटी

आपातकाल की आपबीती:डबरा के जगन्नाथ सिंह रावत के परिवार ने झेला बिछोह, भय और संघर्ष

ग्वालियर में आपातकाल के दौरान जगन्नाथ सिंह रावत की गिरफ्तारी से उनके बेटे महेंद्र सिंह को पढ़ाई छोड़ घर लौटना पड़ा।


आपातकाल की आपबीतीडबरा के जगन्नाथ सिंह रावत के परिवार ने झेला बिछोह भय और संघर्ष

18 महीने जेल में रहे पिता, 15 साल के बेटे की छूट गई पढ़ाई

ग्वालियर। आपातकाल लागू होने के दूसरे-तीसरे दिन ही जगन्नाथ सिंह रावत ने साथियों के साथ डबरा शुगर मिल गेट पर सत्याग्रह जुलूस निकाला। जुलूस में 'बंदी नेता रिहा करो' और 'जुल्म किया तो और लड़ेंगे' जैसे नारे लगाए गए। पुलिस ने प्रदर्शनकारियों को गिरफ्तार कर लिया। उसी शाम जगन्नाथ सिंह रावत को डबरा थाने से ग्वालियर केंद्रीय जेल भेज दिया गया।

परिवार को शुरुआत में लगा कि राजनीतिक गिरफ्तारी है, कुछ दिनों में रिहाई हो जाएगी। लेकिन दिन सप्ताह और सप्ताह महीने में बदलते गए। देखते ही देखते यह बिछोह 18 महीने लंबा हो गया। देशभर में गिरफ्तारियों और कार्रवाई की खबरों के बीच परिवार की चिंता भी बढ़ती रही। जगन्नाथ सिंह के भतीजे मायाराम सिंह रावत उनसे मिलने जेल पहुंचे। परिवार की चिंता बताने पर जगन्नाथ सिंह ने उन्हें ही ढांढस बंधाते हुए कहा, 'चिंता मत करो, समय एक सा नहीं रहता। आगे सब ठीक हो जाएगा।' जेल में रहते हुए उनके ये शब्द परिवार के लिए लंबे इंतजार में संबल बने रहे। घर में उनके पिता वृंदावन सिंह रावत, मां ज्ञाना देवी तथा दोनों पत्नियां सावित्री देवी और रामप्यारी उनकी रिहाई की प्रतीक्षा करती रहीं। बच्चों के लिए पिता की अनुपस्थिति सबसे कठिन थी। महेंद्र सिंह उस समय इंदौर में कक्षा नौवीं में पढ़ रहे थे। पिता के जेल जाने और घर की परिस्थितियां बदलने के बाद उन्होंने पढ़ाई छोड़कर डबरा लौटने का निर्णय लिया। खेती-बाड़ी और परिवार की जिम्मेदारियां संभालने में जुटे महेंद्र सिंह का एक वर्ष पढ़ाई से दूर रहा।

वे बताते हैं कि उस समय समझ नहीं आता था कि क्या करें। पिता के जेल में होने से खेती प्रभावित हुई और आर्थिक स्थिति संभालना कठिन हो गया। सरकारी कार्रवाई के भय से कई परिचित और रिश्तेदार भी परिवार से दूरी बनाने लगे। घर में छोटे बच्चे नरेंद्र, हनुमंत और नरोत्तम बार-बार मां से पूछते 'पिताजी कब लौटकर आएंगे?' मां के पास इसका कोई उत्तर नहीं था। रक्षाबंधन और दीपावली जैसे त्योहार भी फीके रहे। घर में दीपक तो जले, लेकिन उत्सव का उल्लास नहीं था। पिता की प्रतीक्षा ने बच्चों की खुशियों को भी जैसे रोक दिया था। 18 महीने बाद जगन्नाथ सिंह रावत जेल से रिहा होकर घर लौटे तो परिवार में फिर से उल्लास लौटा। बच्चों के लिए उनकी वापसी किसी पर्व से कम नहीं थी। हालांकि खेती-बाड़ी प्रभावित होने और आर्थिक कठिनाइयों का असर परिवार को अगले दो-तीन वर्ष तक झेलना पड़ा।

महेंद्र सिंह रावत के लिए आपातकाल की वह अवधि केवल पिता की गिरफ्तारी की स्मृति नहीं, बल्कि किशोरावस्था में अचानक जिम्मेदारियों के बीच आ जाने का अनुभव है। पढ़ाई छूटना, पिता की प्रतीक्षा और अपनों का भयवश दूर हो जाना-ये स्मृतियां आज भी उनके मन में जीवित हैं। जगन्नाथ सिंह रावत 1967 और 1980 में दो बार डबरा से विधायक रहे तथा कृषि उपज मंडी डबरा के प्रथम अध्यक्ष भी रहे। आपातकाल बीत गया, लेकिन रावत परिवार के लिए वे 18 महीने आज भी बिछोह, संघर्ष और धैर्य की अमिट स्मृति हैं।

आपातकाल का इतिहास केवल राजनीतिक घटनाओं और जेल गए नेताओं की कहानी नहीं है, बल्कि उन परिवारों की पीड़ा का भी दस्तावेज है, जिन्होंने अपने किसी सदस्य की गिरफ्तारी के बाद भय, अनिश्चितता और संघर्ष के बीच जीवन बिताया। डबरा के पूर्व विधायक, जनसंघ नेता एवं राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के कार्यकर्ता जगन्नाथ सिंह रावत के परिवार ने भी ऐसा ही दौर देखा। पिता की गिरफ्तारी के बाद उनके 15 वर्षीय बेटे महेंद्र सिंह को पढ़ाई छोड़कर इंदौर से डबरा लौटना पड़ा। किशोरावस्था में ही परिवार की जिम्मेदारियां उनके कंधों पर आ गई।

प्रस्तुति : अभिषेक शर्मा

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