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पाकिस्तान की नई समुद्री महत्वाकांक्षा

चीन की पनडुब्बियां, पाकिस्तान की महत्वाकांक्षा और भारत की समुद्री तैयारी

1971 की हार के 55 वर्ष बाद पाकिस्तान ने दिखाई नई समुद्री महत्वाकांक्षा, लेकिन क्या वह वास्तव में भारत की रणनीतिक बढ़त को चुनौती दे पाएगा?


चीन की पनडुब्बियां पाकिस्तान की महत्वाकांक्षा और भारत की समुद्री तैयारी

अनुराग तागड़े

इंदौर।  विश्व राजनीति में समुद्रों का महत्व लगातार बढ़ रहा है। कभी भू-सीमाओं और जमीनी युद्धों पर केंद्रित रहने वाली महाशक्तियां आज समुद्री मार्गों, बंदरगाहों, जलडमरूमध्यों और नौसैनिक अड्डों को अपनी शक्ति का सबसे बड़ा आधार मान रही हैं। रूस-यूक्रेन युद्ध, इजराइल-हमास संघर्ष, लाल सागर में हूती विद्रोहियों के हमले, ईरान-अमेरिका तनाव और दक्षिण चीन सागर में बढ़ती प्रतिस्पर्धा ने यह स्पष्ट कर दिया है कि 21वीं सदी का वास्तविक शक्ति संतुलन समुद्रों पर तय होगा।
ऐसे समय में पाकिस्तान की ओर से आया एक बयान भारत सहित पूरे हिंद महासागर क्षेत्र के रणनीतिक विशेषज्ञों का ध्यान आकर्षित कर रहा है। चीन में निर्मित अपनी पहली अत्याधुनिक हैंगोर श्रेणी की पनडुब्बी को नौसेना में शामिल करने के बाद पाकिस्तान ने पहली बार खुले तौर पर बंगाल की खाड़ी में अपनी उपस्थिति दर्ज कराने की इच्छा व्यक्त की है। यह केवल एक सैन्य बयान नहीं है, बल्कि हिंद महासागर क्षेत्र में बदलते शक्ति संतुलन का संकेत भी है।

1971 की हार का समुद्री अध्याय

1971 के भारत-पाकिस्तान युद्ध को सामान्यतः बांग्लादेश के निर्माण और पाकिस्तान की सैन्य पराजय के संदर्भ में याद किया जाता है, लेकिन इस युद्ध का एक महत्वपूर्ण अध्याय समुद्र में भी लिखा गया था।भारतीय नौसेना ने ऑपरेशन ट्राइडेंट और ऑपरेशन पाइथन के माध्यम से कराची बंदरगाह पर अभूतपूर्व हमला किया था। पाकिस्तान की नौसैनिक क्षमता को ऐसा नुकसान पहुंचा कि आने वाले दशकों तक उसकी समुद्री रणनीति मुख्यतः अपनी तटीय सुरक्षा और अरब सागर तक सीमित रही।
दूसरी ओर भारत ने उसी अवधि में अपनी नौसैनिक शक्ति को निरंतर विस्तार दिया। आज स्थिति यह है कि भारतीय नौसेना विश्व की प्रमुख ब्लू-वॉटर नौसेनाओं में गिनी जाती है, जबकि पाकिस्तान अभी भी अपने अधिकांश आधुनिक नौसैनिक प्लेटफॉर्म के लिए विदेशी सहायता पर निर्भर है।

आखिर पाकिस्तान क्यों देख रहा है बंगाल की खाड़ी की ओर?

श्रीलंका के कोलंबो में पाकिस्तान नौसेना के कमोडोर उमर फारूक का बयान साधारण नहीं था। उन्होंने स्पष्ट रूप से कहा कि नई हैंगोर श्रेणी की पनडुब्बियां पाकिस्तान को बंगाल की खाड़ी तक अपनी उपस्थिति बनाए रखने की क्षमता प्रदान करेंगी।प्रश्न यह है कि पाकिस्तान को बंगाल की खाड़ी में रुचि क्यों है?इसका उत्तर केवल सैन्य नहीं बल्कि आर्थिक और भू-राजनीतिक भी है। बंगाल की खाड़ी आज हिंद-प्रशांत क्षेत्र का सबसे तेजी से उभरता हुआ समुद्री क्षेत्र बन चुकी है। भारत, बांग्लादेश, म्यांमार, थाईलैंड और इंडोनेशिया जैसे देशों के बीच बढ़ता व्यापार इसी मार्ग से संचालित होता है। पूर्वी भारत के औद्योगिक विकास, पूर्वोत्तर राज्यों की कनेक्टिविटी, ऊर्जा आपूर्ति तथा अंतरराष्ट्रीय व्यापार के लिए यह क्षेत्र अत्यंत महत्वपूर्ण है।पाकिस्तान जानता है कि यदि भविष्य में किसी भी प्रकार का सामरिक दबाव बनाना है तो केवल अरब सागर में सक्रिय रहना पर्याप्त नहीं होगा। उसे उन क्षेत्रों तक भी पहुंच बनानी होगी जहां भारत स्वयं को स्वाभाविक रूप से सबसे मजबूत मानता है।

चीन का समुद्री विस्तार और पाकिस्तान की भूमिका

इस पूरे घटनाक्रम का सबसे महत्वपूर्ण पक्ष चीन है।पाकिस्तान की नई हैंगोर श्रेणी की पनडुब्बियां चीन की तकनीक पर आधारित हैं। बीजिंग केवल हथियार नहीं बेच रहा, बल्कि हिंद महासागर क्षेत्र में अपनी रणनीतिक पहुंच भी बढ़ा रहा है।पिछले एक दशक में चीन ने जिस गति से अपनी नौसेना का विस्तार किया है, वह अभूतपूर्व है। आज चीन के पास दुनिया का सबसे बड़ा नौसैनिक बेड़ा है। उसके युद्धपोतों, विध्वंसकों, फ्रिगेटों और पनडुब्बियों की संख्या अमेरिकी नौसेना से भी अधिक हो चुकी है।
चीन पहले ही जिबूती में अपना सैन्य अड्डा स्थापित कर चुका है। पाकिस्तान के ग्वादर बंदरगाह में उसका भारी निवेश है। श्रीलंका के हम्बनटोटा बंदरगाह पर उसका प्रभाव जगजाहिर है। मालदीव, म्यांमार और अफ्रीका के पूर्वी तट पर भी वह अपनी रणनीतिक उपस्थिति लगातार मजबूत कर रहा है।रक्षा विशेषज्ञ इसे "स्ट्रिंग ऑफ पर्ल्स" रणनीति कहते हैं, जिसके तहत चीन भारत के चारों ओर समुद्री संपर्क बिंदुओं का ऐसा नेटवर्क विकसित कर रहा है जिससे संकट की स्थिति में उसे सामरिक लाभ मिल सके।

भारत की ताकत: भूगोल, तकनीक और अनुभव

पाकिस्तान की नई महत्वाकांक्षाओं के बावजूद वास्तविकता यह है कि बंगाल की खाड़ी भारत के लिए केवल एक समुद्री क्षेत्र नहीं बल्कि रणनीतिक रूप से सुरक्षित क्षेत्र है। विशाखापट्टनम में स्थित पूर्वी नौसेना कमान भारत की सबसे शक्तिशाली नौसैनिक संरचनाओं में से एक है। यहां से भारतीय नौसेना बंगाल की खाड़ी से लेकर मलक्का जलडमरूमध्य तक की गतिविधियों पर नजर रख सकती है।इसके अतिरिक्त अंडमान एवं निकोबार द्वीप समूह भारत को वह सामरिक लाभ प्रदान करते हैं जो पाकिस्तान तो क्या, चीन के लिए भी चुनौती बना हुआ है।दुनिया के सबसे व्यस्त समुद्री मार्गों में से एक मलक्का जलडमरूमध्य अंडमान-निकोबार के बेहद निकट स्थित है। चीन के तेल और व्यापारिक जहाजों का बड़ा हिस्सा इसी मार्ग से गुजरता है। किसी भी संभावित संघर्ष की स्थिति में यह क्षेत्र भारत के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण रणनीतिक संपत्ति साबित हो सकता है।

भारतीय नौसेना: संख्या से अधिक गुणवत्ता की ताकत

भारतीय नौसेना आज लगभग डेढ़ सौ युद्धपोतों और पनडुब्बियों का संचालन कर रही है। उसके पास दो विमानवाहक पोत हैं—आईएनएस विक्रमादित्य और स्वदेश निर्मित आईएनएस विक्रांत।भारत उन चुनिंदा देशों में शामिल है जिनके पास परमाणु पनडुब्बियों का संचालन करने की क्षमता है। आईएनएस अरिहंत और आईएनएस अरिघात जैसे प्लेटफॉर्म भारत की परमाणु प्रतिरोधक क्षमता को नई मजबूती प्रदान करते हैं।इसके अतिरिक्त ब्रह्मोस मिसाइलों से लैस विध्वंसक, आधुनिक स्टील्थ फ्रिगेट, लंबी दूरी के P-8I पोसाइडन विमान, समुद्री ड्रोन और अत्याधुनिक निगरानी प्रणाली भारतीय नौसेना को क्षेत्र की सबसे सक्षम नौसेनाओं में शामिल करते हैं। सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि वर्तमान में 50 से अधिक युद्धपोत और नौसैनिक प्लेटफॉर्म भारतीय शिपयार्डों में निर्माणाधीन हैं। यह आत्मनिर्भर भारत की दिशा में नौसेना के सबसे बड़े परिवर्तन का संकेत है।

क्या विमानवाहक पोत आज भी प्रासंगिक हैं?

पिछले कुछ वर्षों में यह तर्क दिया जाता रहा कि ड्रोन और लंबी दूरी की मिसाइलों के युग में विमानवाहक पोत अप्रासंगिक हो चुके हैं। लेकिन हालिया वैश्विक घटनाओं ने इस धारणा को कमजोर कर दिया है।ईरान-अमेरिका तनाव, लाल सागर संकट और पश्चिम एशिया में अमेरिकी नौसैनिक तैनाती ने दिखाया है कि विमानवाहक पोत आज भी समुद्र में शक्ति प्रदर्शन का सबसे प्रभावी साधन हैं।भारत के पास वर्तमान में दो विमानवाहक पोत हैं, लेकिन विशेषज्ञ लंबे समय से तीसरे विमानवाहक पोत की आवश्यकता पर जोर दे रहे हैं। यदि भारत को हिंद महासागर और हिंद-प्रशांत क्षेत्र में अपनी रणनीतिक बढ़त बनाए रखनी है तो उसे अपने विमानवाहक बेड़े और पनडुब्बी क्षमता दोनों को समान रूप से मजबूत करना होगा।

पाकिस्तान के लिए अवसर या भ्रम?

निश्चित रूप से हैंगोर श्रेणी की पनडुब्बियां पाकिस्तान की नौसैनिक क्षमता को पहले से अधिक मजबूत बनाएंगी। अरब सागर में भारतीय नौसेना के लिए वे अतिरिक्त चुनौती उत्पन्न कर सकती हैं।लेकिन बंगाल की खाड़ी में स्थायी और प्रभावी उपस्थिति स्थापित करना केवल एक-दो आधुनिक पनडुब्बियों से संभव नहीं है। इसके लिए विशाल लॉजिस्टिक नेटवर्क, समुद्री निगरानी तंत्र, मित्र देशों का सहयोग, वायु शक्ति और दीर्घकालिक नौसैनिक अवसंरचना की आवश्यकता होती है।
यही वह क्षेत्र है जहां भारत की बढ़त अत्यंत स्पष्ट दिखाई देती है।

समुद्र में बढ़ रही प्रतिस्पर्धा का नया दौर

पाकिस्तान की नई समुद्री महत्वाकांक्षा को हल्के में नहीं लिया जा सकता। इसके पीछे चीन की दीर्घकालिक रणनीतिक सोच और हिंद महासागर क्षेत्र में बढ़ती प्रतिस्पर्धा की छाया स्पष्ट दिखाई देती है।फिर भी वर्तमान परिस्थितियों में बंगाल की खाड़ी और हिंद महासागर क्षेत्र में शक्ति संतुलन भारत के पक्ष में है। भारत के पास बेहतर भूगोल, मजबूत नौसेना, विकसित समुद्री अवसंरचना, परमाणु प्रतिरोधक क्षमता और बढ़ती स्वदेशी रक्षा उत्पादन क्षमता है।लेकिन आने वाले वर्षों में समुद्रों पर प्रतिस्पर्धा और तीव्र होगी। यह केवल भारत और पाकिस्तान के बीच मुकाबला नहीं होगा, बल्कि हिंद महासागर में चीन की बढ़ती महत्वाकांक्षाओं और भारत की समुद्री सुरक्षा रणनीति के बीच भी एक निर्णायक संघर्ष होगा।संभवतः आने वाला दशक यह तय करेगा कि हिंद महासागर वास्तव में "भारतीय महासागर" बना रहेगा या फिर वह महाशक्तियों की प्रतिस्पर्धा का नया रणक्षेत्र बन जाएगा।

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