राष्ट्र केवल सीमाओं से निर्मित भूखंड नहीं होते। वे केवल नक्शों पर खींची गई रेखाओं का संग्रह भी नहीं होते। किसी भी राष्ट्र की वास्तविक आत्मा उसके इतिहास, उसकी स्मृतियों, उसकी सांस्कृतिक चेतना और उसके सभ्यतागत आत्मविश्वास में निहित होती है। जो राष्ट्र अपने अतीत को स्वीकार करने का साहस खो देता है, वह वर्तमान में भ्रमित और भविष्य में दिशाहीन हो जाता है।इन दिनों पाकिस्तान के लाहौर में जो घटनाक्रम सामने आया है, वह केवल कुछ सड़कों और मोहल्लों के नामों के परिवर्तन अथवा पुनर्स्थापना का विषय नहीं है। यह उससे कहीं अधिक गंभीर प्रश्न है। यह प्रश्न है पहचान का, ऐतिहासिक स्वीकार्यता का, सभ्यतागत परिपक्वता का और वैचारिक आत्मविश्वास का।
पाकिस्तान की पंजाब सरकार ने कुछ समय पूर्व लाहौर के अनेक स्थानों के विभाजन-पूर्व नामों को पुनर्स्थापित करने का निर्णय लिया। इसमें कृष्ण नगर, राम गली, जैन मंदिर चौक, संत नगर, धरमपुरा और अन्य अनेक स्थान शामिल थे। इस पहल को लाहौर की ऐतिहासिक पहचान को पुनर्जीवित करने और उसकी बहुसांस्कृतिक विरासत को संरक्षित करने के प्रयास के रूप में प्रस्तुत किया गया। वास्तव में देखा जाए तो यह निर्णय अपने मूल स्वरूप में कोई राजनीतिक निर्णय नहीं था। यह एक सांस्कृतिक और ऐतिहासिक स्वीकार्यता का विषय था। लाहौर केवल पाकिस्तान का शहर नहीं है; वह सदियों की सांस्कृतिक परतों का जीवंत इतिहास है। वहां मुगल स्थापत्य है, सिख इतिहास है, हिंदू परंपराएं हैं, जैन स्मृतियां हैं और औपनिवेशिक काल के चिन्ह भी मौजूद हैं। विभाजन से पहले लाहौर एक बहुआयामी सामाजिक संरचना का प्रतिनिधित्व करता था।
इस पूरे विवाद को समझने के लिए लाहौर के इतिहास को समझना भी आवश्यक है। लाहौर केवल पाकिस्तान का एक शहर नहीं है, बल्कि वह सदियों से पंजाब की सांस्कृतिक राजधानी के रूप में जाना जाता रहा है। मुगल शासन, सिख साम्राज्य, ब्रिटिश प्रशासन और उससे पहले की भारतीय सांस्कृतिक परंपराओं की परतें यहां स्पष्ट दिखाई देती हैं। लाहौर कभी केवल एक धार्मिक पहचान वाला शहर नहीं था बल्कि यह विविध सभ्यताओं और समुदायों का जीवंत संगम था।
विभाजन से पूर्व लाहौर में हिंदू, सिख, मुस्लिम और जैन समुदायों की बड़ी उपस्थिति थी। शहर के अनेक बाजारों, गलियों और मोहल्लों के नाम स्थानीय सामाजिक संरचना और समुदायों की पहचान से जुड़े हुए थे। कृष्ण नगर, राम गली, जैन मंदिर चौक, संत नगर और धरमपुरा जैसे नाम केवल शब्द नहीं थे, बल्कि वे उस सामाजिक इतिहास के जीवंत दस्तावेज थे जिन्हें समय और राजनीति की धूल ने धीरे-धीरे ढक दिया।विशेष बात यह है कि पाकिस्तान की पंजाब सरकार की विरासत पुनर्जीवन योजना के अंतर्गत केवल दो या चार नाम नहीं बदले जा रहे थे। रिपोर्टों के अनुसार लगभग एक दर्जन से अधिक स्थानों को उनकी ऐतिहासिक पहचान वापस देने की प्रक्रिया शुरू हुई थी।
इस दौरान इस्लामपुरा को कृष्ण नगर, सुन्नत नगर को संत नगर, मुस्तफाबाद को धरमपुरा, बाबरी मस्जिद चौक को जैन मंदिर चौक और कुछ प्रमुख मार्गों को उनके पुराने नामों से पुनः जोड़ा गया।यह भी कम रोचक तथ्य नहीं है कि लाहौर के अनेक पुराने निवासी और इतिहासकार इन नामों का अनौपचारिक उपयोग वर्षों से करते रहे हैं। अर्थात सरकारी बोर्ड बदल गए थे, लेकिन जनस्मृति से ये नाम कभी पूरी तरह समाप्त नहीं हुए। यह इस बात का प्रमाण है कि राजनीतिक निर्णय स्मृतियों को नियंत्रित कर सकते हैं, किंतु उन्हें समाप्त नहीं कर सकते।1947 का विभाजन केवल भौगोलिक विभाजन नहीं था। इतिहासकारों के अनुसार लगभग 1.2 से 2 करोड़ लोगों का विस्थापन हुआ और लाखों लोगों ने अपने घर, अपनी पहचान और अपनी पीढ़ियों की स्मृतियां खो दीं। विभाजन की त्रासदी ने लाहौर जैसे शहरों की सामाजिक संरचना को पूरी तरह बदल दिया।विडंबना यह है कि जिस लाहौर ने कभी भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन की राजनीतिक चेतना को भी जन्म दिया था, वही लाहौर आज अपने ही अतीत को लेकर असमंजस में दिखाई देता है। यह वही शहर है जहां एक ओर पाकिस्तान प्रस्ताव का इतिहास जुड़ा है, वहीं दूसरी ओर यह शहर बहुधार्मिक सांस्कृतिक स्मृतियों का भी केंद्र रहा है।
सबसे गंभीर प्रश्न यह है कि यदि इतिहास संरक्षण का उद्देश्य केवल उन तथ्यों को बचाना है जो वर्तमान राजनीतिक विचारधारा के अनुकूल हों, तो फिर उसे संरक्षण नहीं बल्कि चयनात्मक इतिहास लेखन कहा जाएगा। सभ्यताएं स्मृतियों को मिटाकर नहीं बल्कि उन्हें स्वीकार कर आगे बढ़ती हैं।यही कारण है कि यह बहस केवल सड़क और मोहल्लों के नामों की नहीं है। यह उस मानसिकता की बहस है जो तय करती है कि कोई राष्ट्र अपने अतीत से संवाद करेगा या उससे भय खाएगा।लेकिन समस्या वहीं उत्पन्न हुई जहां पाकिस्तान दशकों से उलझा हुआ है। जैसे ही पुराने नामों की वापसी की चर्चा शुरू हुई, सामाजिक मीडिया और कट्टरपंथी समूहों की ओर से विरोध प्रारंभ हो गया। विरोध का तर्क यह था कि गैर-इस्लामी या हिंदू-सिख पहचान वाले नामों को वापस लाना पाकिस्तान की विचारधारा के विपरीत है। परिणामस्वरूप सरकार ने अपने कदम पीछे खींचने प्रारंभ कर दिए।
यहीं से सबसे बड़ा प्रश्न उत्पन्न होता है।
क्या इतिहास भी अब धार्मिक पहचान के आधार पर स्वीकार किया जाएगा? क्या किसी नगर की स्मृतियां भी अब विचारधारात्मक अनुमति लेकर जीवित रहेंगी?
यदि किसी स्थान का नाम कृष्ण नगर था तो वह केवल एक शब्द नहीं था वह उस स्थान के सामाजिक इतिहास का दस्तावेज था। यदि किसी मार्ग का नाम राम गली था तो वह केवल नामकरण नहीं बल्कि उस समय की सामाजिक संरचना का साक्ष्य था। इतिहास को बदलने से इतिहास समाप्त नहीं होता। इतिहास को दबाने से इतिहास मरता नहीं वह केवल प्रतीक्षा करता है।दुनिया के अनेक राष्ट्रों ने अपने अतीत के जटिल अध्यायों को स्वीकार किया है। जर्मनी ने अपने इतिहास के काले अध्यायों को छिपाया नहीं। दक्षिण अफ्रीका ने अपने नस्लीय संघर्षों को मिटाने का प्रयास नहीं किया। अनेक यूरोपीय देशों ने अपने पुराने स्थापत्य, नामों और सांस्कृतिक प्रतीकों को सुरक्षित रखा क्योंकि वे समझते हैं कि इतिहास राष्ट्र की स्मृति है।
लेकिन पाकिस्तान की त्रासदी यह है कि वह इतिहास को स्मृति नहीं बल्कि वैचारिक उपकरण के रूप में देखने लगा।विभाजन के बाद पाकिस्तान ने एक ऐसी राष्ट्रीय पहचान निर्मित करने का प्रयास किया जिसमें उसके पूर्ववर्ती सांस्कृतिक तत्वों को क्रमशः कम किया जाता गया। अनेक स्थानों के नाम बदले गए। अनेक स्मृतियां हाशिये पर चली गईं। लेकिन प्रश्न यह है कि क्या नाम बदल देने से इतिहास बदल जाता है?
क्या राम गली को किसी अन्य नाम से पुकार देने से वहां कभी राम गली नहीं थी?क्या जैन मंदिर चौक का नाम बदल देने से वहां की ऐतिहासिक वास्तविकता समाप्त हो गई? उत्तर स्पष्ट है नहीं। इतिहास किसी सरकार का निजी दस्तावेज नहीं होता जिसे मनचाहे समय पर संशोधित कर दिया जाए। इतिहास समय की सामूहिक संपत्ति होता है।
विडंबना यह है कि पाकिस्तान आज विश्व मंच पर स्वयं को आधुनिक, प्रगतिशील और उदार राष्ट्र के रूप में प्रस्तुत करना चाहता है। वह पर्यटन बढ़ाना चाहता है, सांस्कृतिक धरोहरों को विकसित करना चाहता है और अपनी ऐतिहासिक विरासत को विश्व के सामने प्रदर्शित करना चाहता है। इसी उद्देश्य से लाहौर विरासत पुनर्जीवन परियोजना भी प्रारंभ की गई थी। इस परियोजना का उद्देश्य शहर की ऐतिहासिक पहचान को संरक्षित करना था।लेकिन जब वही विरासत अपने वास्तविक स्वरूप में सामने आने लगी, तब विरोध प्रारंभ हो गया।यह केवल पाकिस्तान की राजनीतिक कमजोरी नहीं दर्शाता बल्कि वैचारिक असुरक्षा को भी उजागर करता है।
आत्मविश्वासी समाज अपने अतीत से भयभीत नहीं होते।जो राष्ट्र मजबूत होते हैं, वे इतिहास को स्वीकार करते हैं।जो राष्ट्र असुरक्षित होते हैं, वे इतिहास को छिपाते हैं।भारत की सबसे बड़ी शक्ति उसकी विविधता रही है। यहां विभिन्न परंपराएं, अनेक भाषाएं, अनेक आस्थाएं और अनेक सांस्कृतिक प्रवाह एक साथ अस्तित्व में रहे। यही कारण है कि भारत का इतिहास बहसों के बावजूद जीवित और व्यापक दिखाई देता है।
लेकिन पाकिस्तान आज भी अपने मूल प्रश्न से संघर्ष कर रहा है वह क्या है? उसकी सांस्कृतिक पहचान क्या है? क्या वह केवल धार्मिक पहचान पर आधारित राज्य है, या वह उस व्यापक सभ्यतागत परंपरा का भी हिस्सा है जिसने हजारों वर्षों तक इस भूभाग को आकार दिया?जब कोई राष्ट्र अपने ही अतीत के एक हिस्से को देखकर असहज होने लगे, तब यह सांस्कृतिक संकट का संकेत होता है और इसलिए यह पूरा घटनाक्रम केवल नाम परिवर्तन का विषय नहीं है। यह एक मानसिकता का प्रतिबिंब है। यह उस असमंजस का प्रतिबिंब है जिसमें पाकिस्तान दशकों से फंसा हुआ दिखाई देता है।इतिहास मिटाने से इतिहास नहीं मिटता।सभ्यता को नकारने से सभ्यता समाप्त नहीं होती।स्मृतियों पर प्रतिबंध लगाने से स्मृतियां नहीं मरतीं।और शायद इसलिए आज यह वाक्य केवल व्यंग्य नहीं बल्कि एक गंभीर राजनीतिक और सांस्कृतिक टिप्पणी बन गया है पाकिस्तान, तुमसे यह नहीं हो पाएगा।