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Open Letter to Justice Ujjal Bhuyan Debate

न्यायमूर्ति उज्ज्वल भुइयां के नाम खुला पत्र

न्यायमूर्ति उज्ज्वल भुइयां की सामाजिक दरारों वाली टिप्पणी पर लेखक बलबीर पुंज का खुला पत्र। इसमें चयनात्मक संवेदनशीलता, न्यायिक विमर्श और समाज में भेदभाव पर सवाल उठाए गए।


न्यायमूर्ति उज्ज्वल भुइयां के नाम खुला पत्र

बलबीर पुंज

माननीय न्यायमूर्ति उज्ज्वल भुइयांजी, गत 21 फरवरी को हैदराबाद में एक संगोष्ठी के दौरान आपने भारत के सामाजिक ढांचे में मौजूद 'गहरी दरारों' की चर्चा की। इस बात को स्पष्ट करने के लिए आपने दो घटनाओं का सहसा उल्लेख किया। पहलादिल्ली में एक मुस्लिम शोधार्थी को कथित रूप से उसकी पहचान उजागर होने के बाद आवास न मिलना। और दूसरा ओडिशा में एक दलित द्वारा बनाए गए मध्याह्न भोजन को कुछ बच्चों द्वारा अभिभावकों के दबाव में नहीं खाना।बेशक, किसी भी समाज में मजहब या जाति के आधार पर किसी भी प्रकार का भेदभाव न केवल अस्वीकार्य है, बल्कि संवैधानिक नैतिकता के खिलाफ भी है। सामाजिक पूर्वाग्रहों के प्रति सजगता संविधान में निहित बंधुत्व की अवधारणा का एक अनिवार्य तत्व है। इसलिए न्यायिक विमर्श में इन मुद्दों को स्थान देना निस्संदेह स्वागतयोग्य है।

परंतु सवाल उठता है कि क्या इन 'गहरी' सामाजिक 'दरारों' को देखने-समझने का नजरिया चयनात्मक हो सकता है? जिस समय आपका विचार मीडिया की सुर्खियों में था, लगभग उसी दौरान उत्तर प्रदेश के बुलंदशहर में दलितों पर हमला करने का मामला सामने आया। इस घटनाक्रम में शिकायतकर्ता आकाश कुमार के अनुसार, उनके एक आयोजन में तेज आवाज में डीजे और नाच-गाना चल रहा था, जिसे स्थानीय मुस्लिमों की नमाज हेतु रोक दिया गया था। इसके बाद जैसे ही कार्यक्रम पुनः आरंभ हुआ, 15-20 स्थानीय मुस्लिमों ने लाठी-डंडों के साथ जलसे में उपस्थित लोगों (महिला-बच्चों सहित) पर हमला कर दिया और उन्हें जातिसूचक अपशब्द भी कहे।इस मामले में मोईन खान, मतलूच अली, मोहम्मद आदिल, अकरम खान आदि के खिलाफ प्राथमिकी दर्ज की गई है। अक्सर दलित-उत्पीड़न के मामलों में 'बुद्धिजीवियों' का एक विशेष वर्ग आंदोलित रहता है। वह बुलंदशहर प्रकरण पर ऐसे चुप है, मानो जैसे कुछ हुआ ही न हो।क्या जातिगत अत्याचारों के प्रति हमारी संवेदनशीलता आरोपित पीड़ित की मजहबी पहचान के अनुसार बदल जाना उचित है? यदि यहां आरोपी सवर्ण हिंदू होता, तो क्या इस तरह की खामोशी दिखती? संभवतः नहीं। परंतु इस मामले में आरोपी अल्पसंख्यक है, इसलिए वही 'प्रबुद्धजन' इसका विरोध तो दूर, इसकी मुखर निंदा तक करने का साहस नहीं दिखा पा रहे हैं। यही दोहरा मापदंड अखरता है, जो संवैधानिक नैतिकता को आघात पहुंचाता है।

आपने अपने भाषण में यह भी कहा कि लोकतांत्रिक संस्थाएं संख्या या शक्ति के बल पर नहीं, बल्कि मूल्यों के आधार पर चलनी चाहिए। क्या वाकई ऐसा है? क्या यह आवश्यक नहीं कि समाज के सभी वर्ग बिना किसी वैचारिक या राजनीतिक पूर्वाग्रह के प्रत्येक छल, दबाव, हिंसा और शोषणकारी प्रवृत्तियों को पहचानने और स्वीकारने में ईमानदारी दिखाएं?हाल ही में फिल्म 'द केरल स्टोरी 2: गोज बियॉन्ड' पर उठे विवाद ने 'लव जिहाद' विषय को फिर से चर्चा में ला दिया। इस संदर्भ में 23 फरवरी को दिल्ली में इस फिल्म के निर्माताओं ने प्रेसवार्ता का आयोजन किया। इसमें देश के विभिन्न हिस्सों से आईं और जबरन मजहबी मतांतरण की शिकार 33 महिलाओं ने अपना-अपना दर्द बयां किया।इस फिल्म का एक विकृत वर्ग द्वारा इसलिए भी विरोध किया जा रहा है कि प्रेसवार्ता में शामिल पीड़ितों में एक भी महिला केरल से नहीं थी। यदि इस कुतर्क को आधार बनाया जाए, तो क्या हमें यह जांचना होगा कि फिल्म 'कश्मीर की कली' का हर पात्र सचमुच कश्मीरी था? क्या 'द ग्रेट इंडियन किचन' भारत के हर रसोईघर की तरह है? दरअसल, इस प्रकार के नैरेटिव का असली मकसद 'लव जिहाद' की गंभीरता को गौण करना है।ऐसी ही एक पीड़िता राष्ट्रीय स्तर की निशानेबाज तारा शाहदेव हैं। उन्होंने जुलाई 2014 में 'रंजीत' नामक व्यक्ति से विवाह किया था, जो बाद में 'रकीबुल हसन' निकला। तारा के अनुसार, विवाह के कुछ ही दिनों में उन पर मतांतरण करने और गौमांस खाने का दबाव डाला गया। विरोध करने पर उनके साथ शारीरिक और मानसिक प्रताड़ना शुरू हो गई।

अक्टूबर 2023 में जांच एजेंसी सीबीआई की विशेष अदालत ने इस मामले में रकीबुल को आजीवन कारावास, उनकी मां कौसर रानी को दस वर्ष और झारखंड उच्च न्यायालय के तत्कालीन रजिस्ट्रार मुश्ताक अहमद को पंद्रह वर्ष की सजा सुनाई थी।यह कोई एक व्यक्ति द्वारा अपनी पहचान छिपाकर अपराध करने का मामला नहीं है। यह ठीक है कि समाज में हर वर्ग के अपराधियों की भरमार है। परंतु इस प्रकार के मामले इसलिए अधिक चिंताजनक हैं, क्योंकि प्रेम के नाम पर ऐसा छल-कपट संगठित समूहों द्वारा और मुल्ला-मौलवियों के साथ परिजनों (माता-पिता सहित) की सहमति और समर्थन से अंजाम दिया जाता है।ऐसे मामलों की एक लंबी सूची है, जिसमें लखनऊ के पिता-पुत्र सलीमुद्दीन और रमीज पर प्रेमजाल में फंसाकर गैर-मुस्लिम महिलाओं से दुष्कर्म, जबरन गर्भपात और मतांतरण का दबाव बनाने का मामला दर्ज हुआ है।भारत में अंतर-मजहबी विवाह न तो नए हैं, न ही अवैध। दो वयस्कों के प्रेम-संबंध में मजहब या जाति बाधा नहीं बननी चाहिए। लेकिन यदि विवाह छल पर आधारित हो और उसका उद्देश्य केवल मतांतरण के लिए दबाव बनाना हो, तो वह स्वतंत्रता नहीं, बल्कि अपराध है। उसमें प्रेम नहीं, बल्कि मजहब विशेष के प्रसार की प्रतिबद्धता होती है, जिसमें 'सवाब' मिलने की अवधारणा जुड़ी रहती है।

इस संदर्भ में अन्याय के खिलाफ हमारी एकजुटता पीड़ित या आरोपी की पहचान से तय नहीं होनी चाहिए। यदि हर अपराध, भेदभाव और हिंसा को समान दृष्टि से नहीं देखा जाएगा, तो संवैधानिक नैतिकता और न्यायिक निष्पक्षता पर प्रश्न उठते ही रहेंगे।मान्यवर, उपदेश देना सबसे सरल है, लेकिन आत्ममंथन कठिन। 'सामाजिक दरारों' पर चर्चा करते समय संस्थागत चुनौतियों की भी चर्चा आवश्यक है। गत 13 फरवरी को केंद्रीय विधि मंत्री अर्जुन राम मेघवाल ने संसद में बताया था कि पिछले दस वर्षों में भारत के मुख्य न्यायाधीश के कार्यालय को न्यायाधीशों के विरुद्ध 8,630 शिकायतें मिली हैं, जिनका निस्तारण अदालती आंतरिक प्रणाली से किया जाता है।इससे पहले वर्ष 2007 में 'ट्रांसपेरेंसी इंटरनेशनल' के एक सर्वेक्षण में 77 प्रतिशत भारतीयों ने तब 'न्यायपालिका को भ्रष्ट' माना था।निस्संदेह, न्यायाधीश अपने निर्णयों के साथ सार्वजनिक मंचों पर व्यक्त विचारों से भी समाज को दिशा देते हैं। जब हम सिद्धांतों की चर्चा करते हैं, तो न्यायिक दायरे के भीतर भी आत्ममंथन जरूरी हो जाता है। प्रत्येक अन्याय और चुनौती का संज्ञान लेकर उसका समाधान करना भारतीय संविधान का ध्येय है।